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आनंद मंत्रालय (1)

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प्रसिद्ध गणेश मंदिर के बरामदे में बैठकर बड़ा सुकून मिलता है। उस दिन पता नहीं क्या सूझा कि सुबह-सुबह मंदिर चला गया। दर्शन के बाद बरामदे की सीढ़ियों पर टिककर बैठ गया और आने-जाने वाले लोगों का मुआयना करने लगा। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अपनी पत्नी के साथ आए थे और बात कर रहे थे। गणेशजी की कृपा हुई, तो मनचाही पोस्टिंग मिल ही जाएगी। यहां  तो कमाई हो रही है और न ही शांति है। हे गणेशजी, मेरी प्रार्थना सुनना। चेहरे पर उदासी का भाव था।

कुछ ही देर में एक प्रसिद्ध अखबार के मालिक पधारते नजर आए। साष्टांग दण्डवत करते हुए। कुछ साल पहले तक वे सामान्य आदमी थे। उनका बचपन संघर्षों से बीता था, लेकिन अब उन्हें वह सब कहा जाता है, जो लोग भू-माफिया नामक प्राणियों को कहते है। वे सज्जन अपने साथ बहुत सारी फाइलें लेकर आए थे। उन्होंने वे फाइलें भगवान के चरणों में रखी, फिर पुजारी से कुछ कहा, फिर फाइलों को आरती की तरह भगवान के आमने-सामने घुमाया। मानो भगवान से कुछ मांग रहे हो। चेहरे पर तनाव और परेशानी की झलक।

कॉलेज जाने वाले दो विद्यार्थी आए। उनींदे-से। मानो रातभर सोये नहीं हों । पढ़ाई करते रहे हो। आपस में बात कर रहे थे कि इस बार अगर ‘निकले’ नहीं, तो बहुत परेशानी हो जाएगी।

एक नवविवाहित जोड़ा गोद में बच्चे को लेकर आया। जिम्मेदारी का एहसास लिए और परेशान सा। उनकी बात सुनी। वे बच्चे की सेहत के लिए भगवान से कुछ मांग रहे थे।

कॉलेज में जाने वाले एक लड़के और लड़की का आगमन हुआ। उनकी हावभाव से लग रहा था कि वे दोस्त होंगे और परिवार बनाने की राह पर चल पड़े होंगे। लड़की ने सिर पर पल्लू लिया और भगवान से मनचाहा वर मांगने लगी। यह नहीं पता कि वह मनचाहा वर उसके पास में खड़ा नौजवान ही था या कोई और।

एक बंदा नई कार लेकर आया था, कार-पूजा के लिए...एक बुजुर्ग विवाह-पत्रिका लेकर गणेश जी के चरणों में रखने आये थे.... एक दंपत्ति बच्चे को लेकर आये थे और उसके वज़न बराबर के लड्डू तुलवा रहे थे, कोई 'मानता' रही होगी शायद! एक मोटा-सा आदमी नई दुकान की शुभारम्भ के कार्ड और लड्डू का टोकना लेकर  था.. लोग भगवान के चरणों में नोट और सिक्के रख रहे थे, कोई-कोई भक्त दान-पेटी में भी कुछ मुद्राएं समर्पित कर रहे थे।    

मैंने देखा कि जो भी आता, ईश्वर के प्रति आशा का भाव लिए। सब कुछ यंत्रवत। मानो कोई परंपरा का निर्वाह कर रहे हो। या किसी अज्ञात भय के कारण या फिर किसी प्रत्याशा में। लेकिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ कृपा चाहिये थी। भगवान से आशीर्वाद और भौतिक वस्तुओं की चाह भी शायद हो।लोग उस विशाल मंदिर परिसर की अन्य प्रतिमाओं के सामने भी जाते, नतमस्तक होते, दुआएं मांगते, नाड़ा बंधवाते, इच्छा पूरी करने की आशा में मंदिर की जालियों में नाड़ा बांधते, धोक देते। ... तमाम उपक्रम करते, आगे बढ़ रहे थे।

मैं भगवान से कभी भी कुछ मांगता नहीं।  जो कुछ प्राप्त है, वही पर्याप्त है! कितना मांगोगे? अगर वह देने पर आ गया तो संभाल भी पाओगे? हाँ, भगवान को धन्यवाद देने के लिए कभी-कभी मंदिर अवश्य जाता हूँ, जबकि भगवान ने इसके लिए भी कभी इशारा नहीं किया। भगवान के साक्षात दीदार की भी कोई ज़रुरत मुझे नहीं, क्योंकि किसी न किसी बालक, मित्र, परिजन, पक्षी, सहकर्मी में और प्रकृति में उसके अनेक रूप मुझे मिल ही जाते हैं।   

दर्शन करने के बाद मैंने मंदिर से प्रस्थान किया। स्कूटर बाहर निकाला और थोड़ी दूर ही गया था कि स्कूटर पंक्चर निकला। मुझे लगा शायद भगवान मुझे कुछ देर और रोके रखना चाहते हों! फिर भी कुछ सोचकर रवानगी का मन बनाया और स्कूटर को घसीटकर ले जाने का निश्चय किया।  स्कूटर को कुछ दूर घसीटकर ले जाने के बाद मैकेनिक नजर आया। मैंने स्कूटर वहां खड़ा किया और कहा कि पंक्चर ठीक कर दीजिये। मैं जरा चाय पीकर आता हूं।

थोड़ा आगे बढ़ा, तो वहां चाय की दुकान तो नहीं थी, लेकिन देसी की दुकान जरूर थी। खुल गई थी।  सुबह-सुबह लोग वहां जमावड़ा लगा रहे थे। उसमें लोग मंडली के साथ भी आ रहे थे और अकेले भी। देसी लेकर कई लोग पास के अहाते में घुस रहे थे, तो कई सड़क पर ही आचमन में लगे थे। तभी मेरे पास एक बंदा आया और बाेला - “भाई साहब 18 रुपये दे सकते है क्या?”

''18 क्यों? 10, 15, 20 क्यों नहीं माँगते? यह क्या गणित है?''

वो बोला - ''अपना रोज का काम है पर आज कम पड़ गए।''

मैंने कहा - ''मैं ऐसे कामों के लिए किसी की मदद नहीं करता।''

उसने कहा - ''तुम नहीं पीते हो, तो मत दो। ये पैसे तुम्हें वापस तो मिलेंगे नहीं। 18 कम पड़ गए हैं, 18 ही तो मांग रहा हूँ.... वह अपनी ही अदा में मुस्कराया! उसके चहरे पर बेफ़िक्री, मस्ती और आनंद का भाव था। 

 

मैंने उससे कहा -''तुम्हें पैसे देने का सवाल ही नहीं उठता, लेकिन फिर भी मैं तुम्हें 50  का नोट दे रहा हूं, क्योंकि तुमने सच-सच बताया कि तुम्हें देसी के लिए 18 रूपए चाहिये। ये 50 रूपये तुम्हें सच बोलने की लिए दे रहा हूं, देसी पीने के लिए नहीं।''

वह मुस्कुराया। मैंने उसे 50 रूपए दिये तो बोला -''इत्ते की ज़रूरत ही नहीं है। 20 हो तो दे दो या फिर ये चिल्लर लो!''

''चिल्लर को कौन संभालेगा? रख भी लो।''

मैंने देसी ठेके के सामने खड़े सभी लोगों के चेहरे देखे, हर चेहरा प्रफुल्लित, उत्साहित, मस्ती और  'ओज' से ओत-प्रोत। फिर मुझे मंदिर आने वाले उन लोगों के चेहरे याद आए, जो अच्छे खासे खाते-पीते घरों के होंगे। लेकिन मंदिर में भी कैसे दीन-हीन और कातर भाव लिये आते हैं। मंदिर में आनेवाला हर चेहरा खुशियों, आशाओं, उमंग और उत्साह से लबरेज क्यों नज़र नहीं आया?

उन्हें मंदिर में आकर भी शांति नहीं और इन्हें इस गंदे से ठेके पर भी चैन और सुकून है।

यही है आनंद मंत्रालय।

02.12.2018

 
 
 

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