manto2

अगर मंटो को पढ़ा है तब तो इसे देखना बनता ही है। और ये नवाज़ुद्दीन भी गज़ब है! मांझी में पूरा दशरथ मांझी लगा और मंटो में वह मंटो लगता है जब बोलता है - आखिर में तो अफ़साने ही रह जाते हैं और रह जाते हैं किरदार ! मुंबई (तब के बम्बई) के फारस रोड की रेड लाइट बस्तियों में जाने पर सवाल उठाने पर कहता है - अच्छा, उन्हें वहां जाने की खुली इजाजत है और हमें लिखने की भी नहीं? मैं वही लिखता हूं जो जानता हूं, तो देखता हूं, मैं तो बस अपनी कहानियों को एक आईना समझता हूं, जिसमें समाज अपने आप को देख सके।

Read more...

manM2

'मनमर्जियां' है तो अमृता प्रीतम को समर्पित, लेकिन इसमें मोहब्बत का स्तर फेसबुकिया है। यह ऐसी  फिल्म है, जो शुरू में 'जिस्म' जैसी है, बीच में साई परांजपे की 'कथा' जैसी, आगे बढ़ने पर कुंदन शाह की 'क्या कहना' जैसी और अंत होते-होते 'हम दिल दे चुके सनम' जैसी। इसमें दिखाए प्यार-मोहब्बत पर अमृता प्रीतम के जज्बात नहीं, वात्स्यायन हावी हैं। शहरी युवा दर्शक जो अपेक्षा लेकर आये थे, वह इंटरवल आते-आते खत्म हो जाती है।

Read more...

Paltan-4

ज्योति प्रकाश दत्ता सरहद, बॉर्डर, रिफ्यूजी, एलओसी कारगिल जैसी फिल्में बना चुके हैं, अब वे पल्टन लेकर आए हैं। इस फिल्म में उन्होंने नाथू ला दर्रे के पास की हुई झड़प को सिनेमा के पर्दे पर उतारा है। सिक्किम को बचाने के लिए भारतीय सेना चीन की सेना से टकराई थी, उसी के असली किरदारों को लेकर यह फिल्म बनाई गई है। सैनिकों और देशप्रेम से जुड़ी इस फिल्म में नए पन की कमी अखरती है। 1962 के युद्ध में शहीदों के घर आने वाले तार इस तरह वितरित करते दिखाए गए है, मानो अखबार बांटे जा रहे हो। शुरूआत के इस दृश्य से ही फिल्म अतिरंजना की शिकार लगती है।

Read more...

HPBJ-8

हैप्पी 2016 में भागी थी। दो साल बाद फिर भाग गई। पहली बार भागी, तो दर्शक उतना अनहैप्पी नहीं हुए, जितना अब हो गए। पिछली बार वह भागकर गलती से पाकिस्तान पहुंच गई थी। इस बार बाप को मुंबई का बोलकर चीन चली गई। दोनों बार प्रेमी के चक्कर में भागी थी। जिम्मी शेरगिल पिछली बार भी कुंवारा रह गया था, इस बार भी। पिछली बार हैप्पी का भागना थोड़ा तर्क संगत लगा था, इस बार निहायत बेवकूफी भरा। भागने के बाद भी वह गलती पर गलती किए जाती है और असंभव से अंत तक कहानी को पहुंचाकर ही दम लेती है। 

Read more...

Stree-1

क्या आपको पैसे देकर बेवकूफ बनने का शौक हैं? क्या आप केवल कलाकारों के नाम जानकर फिल्म देखने चले जाते हैं? क्या आपके पास बहुत ज्यादा फालतू वक्त हैं? हां भई हां। तो यह फिल्म आप ही के लिए है। स्त्री नाम देखकर यह मत सोचिये की यह फिल्म महिलाओं के जीवन पर आधारित है या उनके लिए बनाई गई है या इसमें आधी दुनिया की परेशानियां चित्रित की गई है। यह एक नये जोनर की फिल्म है, वह जोनर है मूर्खता!

Read more...

Gold-2

सन 2007 में आई चक दे इंडिया और इसी वर्ष आई सूरमा की तरह गोल्ड भी हॉकी के मैदान में खेल की कहानी है। तीनों ही फिल्मों में हॉकी मैच को देशभक्ति से जोड़कर देखा गया। सूरमा संदीप सिंह के जीवन पर आधारित थी, तो गोल्ड 1948 के लंदन ओलम्पिक में भारत की टीम द्वारा स्वर्ण पदक जीतने को लेकर है। चक दे इंडिया में कोच प्रमुख था, सूरमा में खिलाड़ी और गोल्ड में टीम का असिस्टेंट मैनेजर। १५ अगस्त को रिलीज करने के पीछे भी दर्शकों की भावनाओं को भुनाना उद्देश्य रहा है।

Read more...

Search

मेरा ब्लॉग

blogerright

मेरी किताबें

  Cover

 buy-now-button-2

buy-now-button-1

 

मेरी पुरानी वेबसाईट

मेरा पता

Prakash Hindustani

FH-159, Scheme No. 54

Vijay Nagar, Indore 452 010 (M.P.) India

Mobile : + 91 9893051400

E:mail : prakashhindustani@gmail.com