Vishwa-1

विश्वरूपम-2 को विवादों में घसीटना गलत है, क्योंकि इस फिल्म में विवादास्पद कुछ भी नहीं। इस फिल्म की आलोचना करना भी ठीक नहीं है। क्योंकि यह आतंकवाद के खिलाफ फिल्म बनी है, जिसमें यह डायलॉग दोहराया गया है कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं। थकेले कमल हासन की यह थकेली फिल्म है, जिसमें कमल हासन के अलावा शेखर कपूर, राहुल बोस, वहीदा रहमान जैसे कलाकार भी हैं, जो सब थकेले लगते है। कमल हासन ने फिल्म बनाई है, पैसे लगाए है, तो पर्दे पर उनका कल्पना से परे एक्शन करना और रोमांस करना तो बनता है। अब यह आपका दुर्भाग्य की आप उसे सह पाए या नहीं।

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fanney 3

फन्ने खां में एक गाना है – मेरे अच्छे दिन कब आएंगे। आश्चर्य हुआ कि ऐसा गाना सेंसरबोर्ड ने पास कैसे कर दिया? सवा दौ घंटे की फिल्म खत्म होते-होते गाना बन जाता है – मेरे अच्छे दिन आ गए। तब समझ में आता है कि सेंसर वालों ने इसे क्यों रिलीज हो जाने दिया। अब राजकुमार राव जैसे कलाकार को ऐश्वर्या राय जैसी हीरोइन मिलेगी, तो उसके अच्छे दिन तो आ ही गए।

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Saheb-1

तिग्मांशु धूलिया को लगता है कि भारत के तमाम पुराने राजा-रजवाड़े कोढ़ हैं। वे अय्याशी, षड्यंत्र, छल-कपट के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते। हर एक की कई-कई बीवियां और कई-कई रखैलें होती हैं और भाई-भाई को, पत्नी-पति को, पति-पत्नी को, बाप-बेटे को मरवाने के षड्यंत्र में लगे रहते है। इससे समय बचे तो ही बेचारे बचा-खुचा समय कोर्ट-कचहरी और जेल जाने में खर्च कर पाते है। लगता है तिग्मांशु धूलिया खुद इस डायलॉग का मतलब भूल गए कि जब नाम के अलावा कुछ न बचा हो, तो नाम को बचा-बचाकर खर्च करना चाहिए।

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soorma1
दो सप्ताह पहले संजय दत्त पर बनी बायोपिक संजू रिलीज़ हुई थी, इस सप्ताह हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह के जीवन पर बनी बायोपिक सूरमा रिलीज हुई है। दोनों बायोपिक एक दूसरे के विपरीत है। संजू में जहाँ एक नशेड़ी, आवारा और कानून का मखौल उड़ानेवाले व्यक्ति का महिमामंडन था तो सूरमा में एक संघर्षशील हॉकी खिलाड़ी की कहानी है, जो पंजाब के एक साधारण परिवार से है और उसमें अपने आप के लिए, परिवार के लिए और देश के प्रति प्रतिबद्धता नज़र आती है।

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Dhadak-Film-5

फिल्म धड़क को मराठी की सुपरहिट फिल्म सैराट का रीमेक समझकर न देखें। न शुद्ध मुंबइयां फिल्म है, जिसका कोई संदेश नहीं है। कहानी में भी बदलाव किया गया है और सैराट जिन मुद्दों को लेकर चर्चित हुई थी। वे मुद्दे इस फिल्म में एक-दो डायलॉग तक सीमित है। सैराट में वर्ग और जाति व्यवस्था पर चोट थी। इस फिल्म में ओनर किलिंग का बहाना बना दिया गया है।

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Sanju-7

हाथों की लकीरें भी गजब होती हैं - रहती तो मुट्ठी में हैं, पर काबू में नहीं रहती। यह संवाद सोच-समझकर संजू फिल्म में रखा गया होगा। परेश रावल और रणबीर कपूर की शानदार एक्टिंग के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है। 47 साल की मनीषा कोइराला 58 साल के संजय दत्त की मां की भूमिका में हैं और अगर आपको यह देखना हो कि अगर आपके पास बेशुमार दौलत हो, तो कोई नशेड़ी, गंजेड़ी, भंगेड़ी, वेश्यावृत्ति का आदी, व्यभिचारी भी कहानी के बूते पर सहानुभूति खरीद सकता है।

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