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इस साल के पूवार्ध की वाहियात फिल्मों में से एक है ‘एक हसीना थी, एक दीवाना था’। सुनील दर्शन इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक, स्क्रीप्ट राइटर आदि-आदि है और उनका छोरा शिव दर्शन इसका हीरो है। यह फिल्म दर्शकों के बजाय ‘दर्शनों’ के लिए है। तड़ीपार नदीम सेफी ने इसमें म्युजिक दिया है। जिन पर 1997 में गुलशन कुमार की हत्या का आरोपी होने का मामला था। श्रवण राठौर के साथ उनकी जोड़ी नदीम श्रवण ने अच्छे-अच्छे गाने दिए थे। वे संगीतकार अब भी अच्छे है और इस फिल्म का संगीत मधुर है। पलक मुछाल की आवाज भी इस फिल्म में है।

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पूरी की पूरी फिल्म बेसिरपैर की बातों से भरी पड़ी है। आत्मा, पुर्नजन्म, भूत-प्रेत इस फिल्म की खूबसूरत लोकेशन पर हावी है। सुनील दर्शन की यह फिल्म रोमांटिक म्युजिक फिल्म कही गई है, लेकिन यह दर्शकों के लिए है हॉरर फिल्म। धनी मंगेतर अपनी होने वाली बीवी को अपनी संपत्ति दिखाने के लिए ले जाता है और वहां वैसा ही सबकुछ घटता है, जो आज के जमाने में तो विश्वसनीय नहीं लगता। शिव दर्शन की यह दूसरी फिल्म है, जिसके लिए उनके पिताजी ने पैसे बर्बाद किए। न उन्हें एक्टिंग आती है, न वे सीखना चाहते हैं। उनके मुकाबले हीरोइन मताशा फर्नांडिस ने कुछ अच्छी एक्टिंग की है। मॉडलिंग से एक्टर बने उपेन पटेल खाली बल्ले दिखाते रहते हैं।

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फिल्म की कहानी में ऐसे-ऐसे पेंच है कि माथा भन्ना जाता है। पूरी फिल्म में तीन ही कलाकार कुछ बोलते है, बाकी के लिए कुछ होता ही नहीं। केवल गानों के बूते पर तो आप यह फिल्म नहीं देख सकते। डेस्टीनेशन मैरिज के नाम पर माउंट यूनिक एस्टेट देखना अच्छा लगता है, लेकिन परालौकिक शक्तियों को झेल पाना आज के दौर में मुश्किल है।

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