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'विजुअल गाली!' फिल्म के प्रचार के लिए कलाकारों द्वारा दिए गए फोटोशूट।

‘लिपस्टिक अंडर माय बुरखा’ कैसी फिल्म होगी, इसका अंदाज उसे प्रचारित करने के लिए फिल्म की नायिकाओं की फूहड़ भावभंगिना वाले फोटोशूट काफी है। फिल्म को एक दर्जन से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके है। एक साल से भारत में इसका प्रदर्शन अटका पड़ा था। अब सेंसरबोर्ड ने ए सर्टिफिकेट देकर पास किया, तो इसे सिनेमाघर मुश्किल से मिल रहे है। भोपाल की हवाई मंजिल में रहने वाली चार महिलाओं की दमित इच्छाओं की कहानी है यह फिल्म। फिल्म से ज्यादा यह एक नाटक की तरह लगती है।

यह एक समानांतर फॉर्मूला फिल्म है। जैसे कमर्शियल फिल्मों के फॉर्मूले होते है, वैसे ही इस तरह की फिल्मों के भी अपने फॉर्मूले होते है। कमर्शियल फिल्में बड़े बजट में बनती है और बड़े कलाकार होते है। ऐसी फिल्म में स्थापित कलाकारों की जगह कम कामयाब कलाकार होते हैं। कम बजट में बनती है और अपना खर्चा निकाल लेती हैं। इन फिल्मों में सेक्स, गाली-गलौज, गली-कूचे के दृश्य, घरेलू हिंसा, दमित सपने और बिना या कम मेकअप किए हुए कलाकार नजर आते हैं। गंदगी को कलात्मक तरीके से पेश करने की कला समानांतर फिल्मों में ही देखने को मिलती है।

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लिपस्टिक फिल्म पांच महिलाओं की साढ़े चार कहानियों की फिल्म है। यह उषा (रत्ना पाठक शाह), शिरीन (कोकणा सेन शर्मा), लीला (आहाना कुमरा), रिहाना (प्लाबिता बोरठाकुर) और नम्रता की कहानियां है। फिल्म में दिखाए गए सभी मर्द घटिया और धोखेबाज हैं। पति है तो जल्लाद और बेवफा, प्रेमी है तो धोखेबाज, फियांसे है तो लल्लू, बाप है तो कठोर, चाचा है तो चरित्रहीन, मिठाईवाला है तो मतलबी। सेक्स और फोन सेक्स के दृश्यों के कारण फिल्म को ए सर्टिफिकेट दिया है।

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कहानी की चार हीरोइनें अलग-अलग परिवेश से है और 1902 में बनी एक जर्जर ‘हवाई हवेली’ नामक मकान में रहती है। इनमें एक दर्जी की बेटी है, जो बुरखा पहनकर कॉलेज जाती हैं और वक्त निकालकर भोपाल के डीबी मॉल में दुकानों से लिपस्टिक, जूते और दूसरी चीजें चुराती हैं। उसके सपने फटी जिन्स पहनना, क्लबों में जाना, सिगरेट-शराब पीना और नाइट आउट करना है। परंपरागत मुस्लिम परिवार और बुरखा पहनने के बाद भी वह अमेरिकी गायिका माइली रे सायरस जैसे गाने गाना चाहती हैं। उसके माता-पिता मेहनतकश और परंपरावादी है तथा ईमानदारी से कपड़े सीने का काम करते हैं। बेटी की निगाह में वे जल्लाद है। दूसरी महिला को उसका पति बच्चे पैदा करने और सेक्स की मशीन समझता है। वह बुरखा पहनकर नौकरी करती है और बचे समय में बच्चे पैदा करने का दायित्व निभाती है। पति ऐसा जिसने उसे कभी किस नहीं किया, लेकिन सदा सौभाग्यवती की तर्ज पर सदा गर्भवती रखता है। तीसरी ब्यूटीशियन है और उसके परिवार वाले उसकी शादी इच्छा के विरूद्ध कहीं और तय कर देते है और वह अपने होने वाले पति को लल्लू बनाकर फ्री लांसिंग करती रहती है। चौथी एक अधेड़ उम्र की विधवा महिला है, जो मस्तराम टाइप लेखकों की किताबें पढ़कर ऊल-जलूल सपने देखती है और वैसी ही हरकतें भी करती है। पांचवीं युवती नम्रता को गर्भवती होने के बावजूद क्लबों की पार्टियों में रात बिताती रहती है और धोखे का शिकार बनती है। फिल्म में सभी महिलाएं जो कुछ करना चाहती है, वह नहीं कर पाती।

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फिल्म में बुरखा पहनने वाली लड़कियां जिन्स पर पाबंदी लगाने के खिलाफ मोर्चा ले लेती है। आंदोलन करती है, पकड़ी जाती है और अपने परिवार वालों से प्रताड़ित होती है। भोपाल के सुलभ शौचालयों का उपयोग लड़कियां वस्त्र बदलने के लिए करती है और घर में जगह नहीं होती, तो प्रेमी के साथ बाथरूम चली जाती हैं। भोपाल की बड़ी मस्जिद, सड़वेंâ, गलियां और बाजार देखना अच्छा लगता है। निर्देशक ने सभी महिलाओं को एक ही धर्म का नहीं बताया है। फिल्म के संवाद बेहद चलताऊ, पॉकेट बुक्स के उपन्यास के जैसे है। फिल्म का अंत एकदम नाटकीय अंदाज में होता है। विक्रांत मेस्सी और सुशांत सिंह टीवी कलाकार है, इसलिए परिचित लगते हैं। फिल्म का एक गाना है, जिसकी लाइन अर्थपूर्ण है ‘१२ टके ब्याज पे, खुशियां उधार की’।

बेहतरीन अभिनय वाली इस फिल्म को प्रदर्शन के लिए छोटे शहरों में स्क्रीन नहीं मिल रहे है। मल्टीप्लेक्स में बामुश्किल इसे जगह मिली है। इतने अवॉर्ड पाने के बाद भी फिल्म का प्रदर्शन ठीक से न हो पाना, दुखद है।

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