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पोंटी चड्डा की कंपनी अरूण गवली पर ही फिल्म बना सकती है, मदर टेरेसा पर तो नहीं। अगर अरूण गवली और उसकी पूरी गुंडा फौज आकर बंदूक की नोक पर फिल्म देखने के लिए कहे, तो भी मना कर दीजिए। फिल्म में अरूण गवली का महिमामंडन शर्मनाक है। उसे झेलना बेहद कठिन है। 80 और 90 के दशक में जब गवली की डगड़ी चाल मुंबई के अखबारों में सुर्खियां बनाया करती थी, उन्हीं दिनों मैं भी मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में पत्रकार था। इसीलिए दावे से कह सकता हूं कि यह फिल्म भायखला के सात रास्ता इलाके की डगड़ी चाल के बारे में जिस तरह छवि बनाती है, वह सही नहीं है। अरूण गवली मवाली, हफ्ता वसूली करने वाला गुंडा, नशेड़ी, गैंगस्टर, अपराधी व्यक्ति रहा है। जिसने अपराधों के सहारे राजनीति में घुसने की कोशिश की। फिल्म में अरूण गवली को वाल्मीकि दिखाने की कोशिश की गई है, जो हास्यास्पद है।

यह बात सही है कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं। क्यों नहीं करें अपराधी से घृणा? जो व्यक्ति केवल इसलिए कई लोगों की हत्या कर दें कि अपराध की दुनिया में उसका वर्चस्व बढ़े, उसका सम्मान कैसा? उससे सहानुभूति कैसी? अरूण गवली जैसे अपराधी ने गलत तरीके से कमाए गए धन का उपयोग जेल और पुलिस अधिकारियों से सांठगांठ करने, नेताओं को पक्ष में लेने और आम नागरिकों को भरमाने के लिए किया। अरुण गवली भी उन अपराधियों में से है, जिसे भ्रम था कि राजनीति की गंगा में आकर वह भी पवित्र हो जाएगा, लेकिन वह नहीं हो पाया।

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डैडी फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि अरूण गवली इसलिए भला है, क्योंकि वह चाल में पला-बढ़ा था। उसके पिता मिल मजदूर थे, अपराधी होने के बाद भी वह एक पारिवारिक व्यक्ति था और वह अपने लोगों (जो की उसके गिरोह के गुंडे थे) की पूरी परवाह करता था। शबनम मौसी की तरह वह भी एक बार विधानसभा का चुनाव जीतने में कामयाब हो गया था, लेकिन बाद में मतदाता जागरूक हो गए।

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बदले हुए नामों के साथ इस फिल्म में अंडरवल्र्ड के कई किरदार है। दाऊद इब्राहीम, राम भाई नायक, गुरू साटम उर्फ मामा, छोटा बाबू, तान्या कोली, बाबू भाई रेशम आदि-आदि। मुंबई की मिल हड़ताल का इन गुंडों ने जमकर फायदा उठाया और मालिकों की दलाली की, चाल और झोपड़पट्टियां तुड़वाकर बिल्डरों को जमीन उपलब्ध कराई। भायखला, महालक्ष्मी, नायगांव, चिंचपोकली, महालक्ष्मी, अग्रीपाड़ा, परेल आदि-आदि इलाकों में इन गुंडों का साम्राज्य रहा और इनमें आपस में प्रतिस्पर्धा भी रही। हालात इतने बदतर हो गए कि इन्होंने अपना साम्राज्य जमाने के लिए हिन्दू डॉन और मुस्लिम डॉन जैसी भूमिकाएं भी जमाई। पूजा और नमाज पढ़ते लोगों पर गोलियां चलाने में भी यह लोग बाज नहीं आए और अब पैसे के बूते पर समाजसेवक का रोल करना चाहते है।

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इस फिल्म में हिंसा के दृश्य इस तरह दिखाए गए है, जैसे कोई रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली घटनाएं हो। मुंबई में रहने वाले एक वर्ग के लोगों और समीक्षकों को फिल्म पसंद आ सकती है। अर्जुन रामपाल ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा था कि मैंने अरूण गवली के जीवन का अध्ययन किया, वह गैंगस्टर हो सकता है, लेकिन गुंडा नहीं। फिल्म में अरूण गवली को रॉबिनहुड दिखाने की पूरी कोशिश की गई है, मानो वह बेचारा बहुत शरीफ आदमी था। उसने कुछ हत्याएं ही तो की और करवाई थी, थोड़ी स्मगलिंग करवाई, अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त की, नशे का कारोबार किया और अपने जैसे 50-100 गुंडों को रोजगार मुहैया कराया। शरीफ आदमी था बेचारा।

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मिल्खा सिंह जैसी फिल्म करने के बाद फरहान अख्तर का फिल्मी दाऊद इब्राहिम का घटिया रोल देखकर दुख हुआ। वह केवल टीवी देखता रहता, शराब और सिगरेट पीता रहता और चश्मा पहनकर खुसपुसाता रहता। अर्जुन रामपाल ने अरूण गवली की एक्टिंग करने में बहुत मेहनत की और रोल के हिसाब से उसमें समाहित भी हो गए। आशा गवली बनी ऐश्वर्या राजेश और पुलिस अधिकारी बने निशिकांत कामत ने भी एक्टिंग ठीक की है। फिल्म में जबरदस्ती घुसेड़े गए तीन गाने भी है, जिन्हें झेलना किसी सजा से कम नहीं। ढाई घंटे की जेल जैसी है यह फिल्म।

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