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अगर आप टीवी पर गुरमीत और हनीप्रीत को झेल सकते हैं, कपिल शर्मा के शो को देख सकते हैं, तो जुड़वा-2 आपको अच्छी लगेगी। तर्कहीनता, छिछोरेपन और बेअक्ली भी मनोरंजक हो सकती है। यह फिल्म डेविड धवन ने अपने बेटे वरुण को स्थापित करने और नोट कमाने के लिए बनाई है। चाहे तो इसमें योगदान दें और रोहिंग्या मुसलमान, नोटबंदी, यशवंत सिन्हा के इंटरव्यू आदि के तनाव दूर करें। दिमाग को सिनेमाघर के बाहर रखें, खाली मगज जाएं, ठहाके लगाएं, अक्लमंदी भरी मूर्खताओं देखें और चले आएं।

फिल्म देखते वक्त आप तय नहीं कर पाते कि यह जुड़वा का सिक्वल है या हमशक्ल का। यह फिल्म भी मनोरंजन के चलताऊ फॉर्मूलों से भरी है और वहीं पुराने फॉर्मूले इसमें भी है। जैसे कि सभी तस्कर ईसाई होते हैं, गुजराती महिलाएं धनवान दामाद के लिए कुछ भी कर सकती हैं, लंदन में रह रहे सभी एनआरआई जोकर की तरह हैं, जिनमें बुद्धि नाम की चीज नहीं है, लड़कियां बेहद मूर्ख होती हैं और वे किसी के साथ भी कभी भी मोहब्बत कर सकती हैं और उन्हें धोखा दिया जा सकता है।

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फिल्म में वाट्सएप के लतीफों को डायलॉग के रूप में भी पेश किया गया है। जैसे बिग बेन घंटे को कहते है या बड़ी बहन को? मंगल ग्रह पर शनिवार को जाया जा सकता है या नहीं। महिला क्रिकेट में मैन ऑफ द मैच कोई हो सकता है क्या? शादी करने के पहले एक धर्म के लोग तीन बार पूछते है कि अफगानिस्तान की राजधानी क्या है? जब जवाब में कबुल-कबुल-कबुल आता है, तो शादी हो जाती है। स्प्लिट पर्सनैलिटी, मल्टीपल डिस्ऑर्डर और बायपोलर डिस्ऑर्डर ऐसी बीमारियां है, जिन्हें डॉक्टर नहीं पहचान पाते।

सलीम जावेद की पुरानी फिल्मों की तरह इसमें भी बचपन में बिछड़े दो भाई है, जो राम और श्याम के दिलीप कुमार की तरह नहीं, वरूण धवन के रूप में राजा और प्रेम की तरह है। एक शराब पीता है, तो दूसरे को नशा हो जाता है। एक पॉटी जाता है, तो दूसरे को सुसु आ जाती है। एक करवट बदलता है, तो दूसरा लुढ़क जाता है। हीरो सर्वशक्तिगुण संपन्न, हैंडसम, मुसीबतों से टकराने वाला और समस्याओं को हंसते-हंसते झेलने वाला इंसान होता है, इसमें भी है, दो-दो है और वह डायरेक्टर का लड़का है, तो यह सोने पर सुहागा।

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पिंक की तापसी पन्नू को एक ठस दिमाग लड़की के रूप में देखकर अच्छा नहीं लगा। राजपाल यादव पूरी फिल्म में तोतले लोगों का मजाक उड़ाते रहे, मानो यह कोई बड़ी भारी अयोग्यता हो। वे ‘दोस्ती तोड़ दी’ को ‘धोती खोल दी’ बोलते हैं और दर्शक हंंसते हैं। बाल बुद्धि लोगों के लिए ही राजपाल यादव को ठूंसा गया है। अनुपम खेर जैसे प्रतिभावान कलाकार ने लंदन में रहने वाले एक ऐसे व्यक्ति का किरदार किया है, जिसके चरित्र का वजन रत्तीभर भी नहीं है। बुढ़ापे में भी उनको ऐसे रोल करने की क्या जरूरत थी? जैकलिन फर्नांडीस और तापसी पन्नू को उपयोग ग्लैमर के लिए किया गया है। आखिर में दो मिनिट के लिए सलमान खान भी दोहरे रोल में आते हैं और चलती है क्या 9 से 12 की लाइनें दोहरा जाते हैं। जिन लोगों ने 1997 में बनी जुड़वा देखी थी, उनको लगता है कि यह फिल्म उसके सामने 19 ही है। वह भी तेलुगु फिल्म बिग ब्रदर का रीमेक थी और यह रीमेक का भी अगला मेक है। 20 साल में भी हिन्दुस्तानी सिनेमा का स्तर नहीं सुधरा है।

फिल्म में कॉमेडी के अलावा एक्शन और इमोशन के भी डो़ज है। घिसे-पिटे लतीफों और बिना लॉजिक के सीन देखते हुए दर्शक तय नहीं कर पाता कि उस पर हंसे या गुस्सा करें। फिल्म में कोई भी किरदार ऐसा नहीं है, जो न्यायसंगत हो। एक वर्ग को यह फिल्म पसंद आ सकती है और लंबे सप्ताहंत और त्यौहारों के बीच इकलौती फिल्म होने का फायदा इसे मिल सकता है। सिनेमा में जाने वाले लगभग हर दर्शक को पता है कि वह क्या देखने आया है, इसलिए उसे निराशा कम होगी। जो पानी पूरी खाने जाता है, उसे पता होता है कि वह बादाम का हलवा खाने नहीं आया है।

29 Sept 2017   01.27 Pm

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