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अनुराग कश्यप की ‘मुक्काबाज’ को गत वर्ष टोरेंटो फिल्म फेस्टिवल और मुंबई के मामी फिल्म फेस्टिवल में भले ही जमकर वाहवाही मिली हो, लेकिन यह फिल्म आला दर्जे की उबाऊ, पकाऊ और झिलाऊ है। जितने समय की यह फिल्म है, उससे एक तिहाई में पूरी कहानी कही जा सकती थी। यह न खेल फिल्म बन सकी है, न प्रेम फिल्म। ऐसा लगता है कि यह फिल्म समीक्षकों और खुद के लिए बनाई गई है। दर्शकों का ध्यान नहीं रखा गया, जब दर्शकों के लिए फिल्म बनाई ही नहीं, तब खुद ही देखो इस फिल्म को।

बॉक्सिंग के रिंग में उतरे हीरो को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, यह इस फिल्म में दिखाया गया है। खेलों में पर्दे के पीछे चल रही राजनीति भी इसमें है। खेलों की राजनीति में जाति की राजनीति भी है। गुंडागर्दी भी है, अनावश्यक मार-धाड़ और गुंडागर्दी वाले दृश्य भी हैं। ऊपर से हीरोइन सुन तो सकती है पर बोल नहीं सकती। वहां भी मनोरंजन की गुंजाइश कम ही थी।

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फिल्म के वन लाइनर और गाने दिलचस्प है। जैसे भगवान की बीड़ी में तम्बाकू नहीं होता। फिल्म में नई मारुति और कबाड़ा लम्ब्रेटा का इश्क है। अनाप-शनाप प्रेम। एक गाने के बोल ही है, बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी-तैसी। मराठी के एक नाटक का नाम है ‘सौजन्याची ऐशी-तैशी’। समझ में नहीं आता कि निर्देशक फिल्म बनाने निकला है या कुछ और करने। फिल्म का हीरो विनीत कुमार सिंह ही इसका लेखक भी है और 4 साल तक वह तमाम निर्देशकों के पास भटकता रहा कि इस पर फिल्म बना लो। शर्त यह है कि हीरो मैं रहूंगा। कोई नहीं माना, अनुराग कश्यप मान गए और उन्होंने फिल्म बना दी। बहुत हुआ इंटरटेनमेंट, तुम्हारी ऐसी-तैसी।

फिल्म के प्रचार के लिए जबरदस्त तैयारियां की गई थी। कहा गया कि हीरो शूटिंग के दौरान 49 बार जख्मी हुआ, लेकिन उसने फिल्म में एक्टिंग नहीं छोड़ी। अब जो आदमी 49 बार जख्मी होने पर भी नहीं सुधरा, वह दर्शकों का दिल जख्मी करने से क्या चूकेगा। रवि किशन और राजेश तेलंग छोटे रोल में भी प्रभावित करते हैं।

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उत्तरप्रदेश के बरेली शहर की कहानी है, जहां एक दबंग बॉक्सिंग एसोसिएशन का अधिकारी होते हुए बॉक्सर खिलाड़ियों से घर के काम करवाता है और साथ में अपनी निजी चाकरी भी। खिलाड़ी बॉक्सिंग रिंग में कम और उसकी मालिश करते ज्यादा नजर आते है। ऐसे में हीरो तो हीरो है, वह गुस्से में उसे एक दिन घूंसा जमा देता है। अब वह दादा हीरो के पीछे पड़ जाता है और हीरो बेचारा हाथ मलता रह जाता है। दो साल बर्बाद होने के बाद वह बनारस चला जाता है, जहां उसके साथ कुछ ऐसा घटित होता है कि उसे जाति प्रथा, सरकारी नौकरियों में होने वाली धांधली, घटिया अफसरशाही और गुंडा़गर्दी का सामना करना पड़ता है। कई बार वह अपना आपा खो बैठता है और ऐसी-ऐसी हरकतें कर जाता है, जो आमतौर पर हिन्दी फिल्मों में नहीं होती।

फिल्म के खलनायक जिमी शेरगिल की भतीजी जोया हुसैन से उसका इश्क होता है, जो खलनायक जिमी शेरगिल को पसंद नहीं। फिल्म के अनुसार हमारे तमाम खेल संगठन भारी जातिवाद के शिकार है। खिलाड़ियों को कहीं चैन नहीं। घर पर बाप लाठी लेकर पीछे पड़ा रहता है और शादी होने पर बीवी, दफ्तर में अफसर जान लेने पर तुला होता है और सहकर्मी भी कम नहीं। शादी होते ही प्रेमिका जब बीवी बन जाती है, तब वह सबकुछ भूलकर केवल अपने मतलब की बातें ही सोचती है और भूतपूर्व प्रेमी और वर्तमान पति का जीना मुहाल कर देती है। खेल के आधार पर मिली नौकरी को अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते और मनमानी करते है।

फिल्म काफी हद तक यथार्थ के करीब लगती है, लेकिन कड़वे यथार्थ को पर्दे पर झेलने के लिए टिकिट खरीदकर कौन जाना चाहता है? यथार्थ के नाम पर बरेली और बनारस की बजबजाती घटनाओं को कब तक दर्शक झेलेगा? खुजली अनुराग कश्यप की है, तो खुजाना भी उन्हें ही पड़ेगा। दर्शक क्यों बीच में आए?

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