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एम.एफ. हुसैन का एक पुराना इंटरव्यू : 

कभी फिल्मों के पोस्टर डिजाइन करने वाले मकबूल फिदा हुसैन ‘मोहब्बत’ नामक फिल्म में माधुरी दीक्षित के साथ अभिनय करने जा रहे हैं। यह शायद उनका नया शगूफा है। चर्चा में रहना उनकी आदत है और अखबारवालों को उनके बारे में छापने में मजा आता है। इन दिनों वे माधुरी दीक्षित पर एक पूरी की पूरी चित्र शृंखला बना रहे हैं, जिसे वे हैदराबाद के हुसैन म्युजियम में रखने वाले हैं। इसका नाम रखा है उन्होंने ‘धक-धक माधुरी दीक्षित’।

शुक्रवार चार अगस्त 1995 की सुबह साढ़े दस बजे उनके बंबई में कफ परेड स्थित घर में मुलाकात हई। हुुसैन साहब की शुुभधवल दाढ़ी गायब थी और वे हमेशा की तरह चुस्त-दुरुस्त थे। घर की दीवार पर उनकी ‘धक-धक माधुरी दीक्षित’ शृंखला की कृति लगी हुई थी। ताजा कृति। इसलिए बातचीत की शुरुआत उसी से हुई:

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हुसैन को कला के क्षेत्र का सुपर स्टार माना जाता है। उन पर अत्यधिक कमर्शियल होने के आरोप भी अकसर लगते रहते हैं। वे खुद इसके बारे में कहते है:

‘‘मेरे पास बहुत से लोग आते हैं कि आर्ट गैलरी खोल लें, कम्पनी बना लें। मैंने किया नहीं। मेरा अपना कोई स्टूडियो नहीं है। जहां भी होता हूं, घर हो, होटल हो, अस्पताल हो, वहीं काम करने लगता हूं। बहुत से चित्र मुफ्त में भी बनाता हूं। चित्र लोग बेच देते हैं, इसलिए दीवारों पर बनाता हूं। राज बब्बर के यहां बनाये हैं। दीवार तो सुरक्षित रहेगी। जिंदगी को अलग-अलग फ्रेम में देखा है, सब अच्छा लगता है। उसे बनाता रहता हूं। न्यूयार्क में नौ धर्मों की एक सीरिज बना रहा हूं। हां, काम का मैंने एक ‘मेथड’ चुन लिया है। मेरा अपना सिलेक्शन है। वो चल गया है।’’

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हुसैन राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रह चुके हैं और कला की दुनिया की राजनीति तो वे करते ही रहते हैं, लेकिन सक्रिय चुनावी राजनीति में जाने की उनकी कोई योजना नहीं है। मैंने पूछा- ‘‘अगर नरसिंह राव आपको लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने का टिकट दे दें, तो क्या आप चुनाव लड़ेंगे?’’

कभी नहीं। मैं व्यक्ति को मानता हूं। विचारधारा अलहदा चीज है। मौसम की तरह पार्टियां बदलती रहती हैं, बचा रहता है व्यक्ति। पर मैं नेताओं को गाली नहीं देता। क्यों दें? सब तो उनके पीछे लगे रहते हैं। नेता के बिना भी तो काम नहीं चलता।

मीडिया में बने रहने का उनका बहुत शौक है और वे हर समय मीडिया में बने रहते हैं। कोई न कोई बहाने से। पर वे खुद इसका खंडन करते हैं और फरमाते हैं: मेरा फॉर्मूला यह है कि कोई फॉर्मूला नहीं है। बस, काम करते रहते हैं। कई बार तो रात-रात भर सोते नहीं। इस मुल्क में करने के लिए इतना काम है कि क्या कहें। पूरी संस्कृति, पूरा इतिहास कला से भरा है। इस देश में रहकर बिना काम किये रह कैसे सकते हैं। फिर किसी चीज से परहेज नहीं। लोगों से रोज का जुड़ाव है। ऐसा माहौल आपको हॉलैण्ड में या अमेरिका में नहीं मिल सकता। हमारे देश के लोगों की रग-रग में रंग और संगीत भरा पड़ा है। अजंता-एलोरा देखो, महाबलिपुरम देखो। पर यहां अब बदलाव यह है कि महानगरों के पाश्चात्य सभ्यता में रंगे लोग ‘सिनिकल’ हो गये हैं। आप जो कहते हैं मीडिया की बात, तो अभी भी पश्चिमी मीडिया को हमारा, भारतवालों का काम नजर नहीं आता। ‘चीन’ में अगर नया ‘वाश बेसिन’ का डिजाइन भी बने तो वो लीड में छापते हैं। हमारा मीडिया तो कमजोर है।

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इन दिनों आप क्या पढ़ रहे हैं? किताबों के शौकीन मकबूल फिदा हुसैन ने बताया कि सलमान रश्दी की नई किताब है- ‘द मूर्स लास्ट साइ’। उसे पढ़ रहा हूं। पर बेकार! उसे (सलमान रश्दी को) लगता है कि वो अंग्रेजी बोलता है, बरसों से वहां पड़ा है, पर अंग्रेज नहीं बन पाया। वो बन भी नहीं सकता। मीडिया उन्हें महत्व दे देता है। वो खुश है? यहां रहकर सही जीवन देखकर भारत के बारे में लिखता तो अच्छा होता। पता नहीं, आजकल हिन्दी में कैसा लिखा जा रहा है?

अपनी आपकी निकट भविष्य की क्या योजनाओं के बारे में हुसैन बताते हैं कि मेरा चौथा म्युजियम हैदराबाद में बन रहा है। इसको जनवरी में शुरू करने की योजना है। इसमें भी सरकार का कुछ पैसा नहीं लगा है। यह म्युजियम फिल्म को समर्पित है। इसमें माधुरी दीक्षित वाले सारे चित्र रहेंगे। सत्यजित रे के चित्र भी वहीं जाने वाले हैं। माधुरी वाली सीरिज अभी पांच साल और चलेगी।

इंदौर जाते हैं कभी?

हां हां, वहां तो चाचा अभी भी हैं। रानीपुरा, मालवा मिल, पारसी मोहल्ला सब जगह चार दोस्त हैं।

... और आपकी वो माशूका कैसी है? चिट्ठी-पत्री होती होगी उनसे?

उनकी तो शादी हो गयी। आस्ट्रेलिया जाकर बस गई हैं वो। उन्हें दहेज में मैंने अपनी पूरी की पूरी एक्जिबिशन-पैंतीस, पेंटिग्स दिए थे।

और दूसरी माशूकाएं?

मत पूछिए। कइयों का तो कन्यादान करना पड़ा है मुझे।

यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि हुसैन साहब ने हमारे कई सवालों के जवाब साफ-साफ देने में टालमटोल की। वे सवाल थे:

आपकी राय में सबसे घटिया कलाकार कौन है?

शोभा डे की किताब का ‘कवर’ बनाने के पहले या बाद में उसे पढ़ा है आपने?

माधुरी के अलावा कौन पसंद है?

जामिनी राय की कला के बारे में क्या राय है?

 

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

6 अगस्त 1995, नवभारत टाइम्स, मुंबई में प्रकाशित

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