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डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी से बातचीत

सवाल - जीवन के 75 बसंत देखने पर कैसा महसूस करते हैं आप? 75 बसंत ही थे या कुछ पतझड़ भी थे?

जवाब - मुझे लग रहा है, जो मुझे आज तक नहीं लगा, आज तक मुझे कहीं रेखांकित किया गया होगा, तो मेरी किसी उपलब्धि के लिए किया गया होगा, लेकिन आज लग रहा है कि मैंने कुछ भी नहीं किया और लोग मुझको बधाई दे रहे है। क्योंकि अगर मेरी उम्र बढ़ी है, तो इसमें मेरा तो कोई योगदान नहीं है कि अतिरिक्त मैं जीवित बना रहा और वो भी मेरे हाथ में नहीं था। इसलिए बिना कुछ किए मुझे बधाई मिल रही है। मुझे लग रहा है कि ये तो बिल्कुल फ्री की बधाइयां है।

सवाल - 75 वर्ष के हुए, मालवी में शब्द है टनटनाट होना। शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से सक्रिय रहना एक बहुत बड़ी तपस्या का अंजाम कहा जा सकता है। आपने कैसे सेहत को बनाए रखा अपनी?

जवाब - कोई भी रह सकता है, आप टेंशन में मत रहिए। अन्यथा संसार में बहुत टेंशन है और कुछ माता-पिता के जींस होते है, कुछ अपनी जागरुकता होती है। अगर आप खुश रहेंगे और संसार को खुश बनाने में लगे रहेंगे, तो आपकी भी और किसी की भी उम्र बढ़ जाएगी।

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सवाल - आपने एक लेख कहीं लिखा है, उसमें लिखा है कि मैं मालवा का आदमी हूं, जहां भूकंप नहीं आते, बाढ़ नहीं आती, सूखा नहीं प़ड़ता, युद्ध नहीं होता, सुनामी नहीं आती, जहां पग-पग रोटी, डग-डग नीर है, लेकिन यहां के लोग बहुत ही आराम पसंद है, सुस्त है, यहां हुचके में बहुत सारा मंजा रखा हुआ है, मजबूत मंजा है, लेकिन पतंग को ऊंचा उठाने की कोई नहीं सोचता। क्यों ऐसा लिखा आपने ?

जवाब - आपने जो प्रश्न पूछा है, उसी में उत्तर भी है। क्योंकि हमारे सामने कोई चुनौती नहीं रही कभी। कोई ऐसी चुनौती नहीं रही कि जिसमें हमें कभी जीवन दांव पर लगाकर पूरी कम्युनिटी को बचाना पड़ता हो, अपने अंचल को बचाना पड़ता हो। आराम, खाने मिलता है, बहुत अच्छी भूमि है, कोई संकट नहीं है, इसलिए हमारी महात्वाकांक्षाएं बहुत ऊंची नहीं रहती, यही प्रतीक उसमें है कि मंजा तो है, लेकिन जरा सी पतंग उड़ जाती है और लगता है कि आसमान छूं लिया, लेकिन अब इन्दौर बदल रहा है। अब इन्दौर वो नहीं रहा, जिसको देखकर हमारी जो अवधारणा बनी हुई है, अब बहुत दिन हो गए है। अब तो इन्दौर को इन्दौर में खोजना पड़ता है। उस इन्दौर को जिस पर मैंने कमेंट लिखा है।

सवाल - आपने एक कार्यक्रम में कुछ दिन पहले कहा था कि हालचाल पूछना, खबरिया बात है, असली चीज है महसूस करना। आप कैसे महसूस करते है 75 साल की उम्र को, बीते साल की घटनाओं को दुर्घटनाओं को, दिल्ली में जो हादसे हुए ऐसे हादसों के सबक को कैसे याद करते है?

जवाब - देखो भई, पहले तो ये बता दूं कि उम्र कोई प्रतियोगिता का मामला नहीं है कि वो 75 साल जिया, वो 80 साल जिया। देखो प्रकाश, मैं जैन हूं, मेरे जो भगवान महावीर हुए है, उनकी उम्र तो 72 ही साल थी, मैं तो उनकी भी उम्र से 3 साल आगे आ गया। तो क्या मैं ऐसा मान लूं कि मैं उनसे भी बड़ा हो गया, मैं उनके पांव की धूल भी नहीं हूं। तो उम्र कितनी है, ये अमहत्वपूर्ण है। और उम्र पुन: कहूंगा कि कोई प्रतियोगिता का मामला नहीं है। प्रतियोगिता का मामला यूं हो सकता है कि तुम इतनी उम्र में क्या करते रहे। विवेकानंद की क्या उम्र थी, हरिशचन्द्र की क्या उम्र थी, झांसी की रानी क्या 22-23, भगत सिंह की क्या थी, सुखदेव की क्या थी? लेकिन इतनी सी उम्र में वो ऐसा कर गए कि कोई इतिहास उनको स्वर्ण अक्षरों से लिखे बगैर लिखा नहीं जा सकता, लेकिन मुझे संतोष है कि ये 75 साल गुजरे, सरलता से, संघर्ष से अपने आप को प्रूफ करने की कोशिश करते हुए, जद्दोजहद में बीते है, मुझे अच्छा लग रहा है।

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सवाल - मौका भी है और दस्तूर भी है, आप इन्दौर के साक्षी रहे है 75 साल से, यहां कि हर गतिविधि से, यहां के हर दंगों से, यहां के मेलजोल से, यहां के भाषणों से, रैलियों से, खेल से तो इस साक्षी भाव में इन्दौर को कहां पाते है आप ?

जवाब - 1968 में मैंने जीवन का पहला बड़ा दंगा देखा था, एक पहलवान को लेकर हुआ था। इन्दौर कई दिनों तक कफ्र्यू में रहा था। कोई लाहरी नाम के सज्जन कलेक्टर थे। उस समय प्रकाश जी, मैंने एक बहुत लंबी कविता लिखी थी और उसमें मेरी सारी जो बेचैनी और आक्रोश था और जो देखने से जो-जो मेरी संवेदनाएं जो थी, उसमें मैंने लिखी थी। उसमें मुझे लगा था कि कोई भी चीज मौका आने पर जाने क्या-क्या रूप ले सकती है। उस समय इन्दौर छोटा था। जैसा कि मैंने पहले भी कहा अब इतना बढ़ गया है और इतना बिलकुल मुंबईनुमा होता जा रहा है, महानगरनुमा होता जा रहा है। इसलिए अब इन्दौर के पुराने पल को अब मैं मिटता हुआ भी देख रहा हूं।

सवाल - एक हमारे पत्रकार मित्र ने कहा कि इन्दौर इतना बढ़ रहा है कि यह भयावह लगता है। आतंकित करता लगता है, क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ ?

जराब - सुनो, अगर मेरे यहां दीपक जलता है रोज, मेरे मकान में और कल से आप उसमें हेलोजन लगाए, तो रोशनी भी आपको भयावह लग सकती है। क्योंकि आपकी आंखें जितनी रोशनी कि अभ्यस्त है, अगर आपने उस पर रोशनी से ही आक्रमण कर दिया, तो भयावह लगेगा। यह भयावहता एक कम्परेटिव है। मतलब इसमें ये है कि इतनी लगे या इतनी लगे, तो यह भयावह से तात्पर्य यह है कि अजीब लग रहा है। भय तो क्या है, भय क्या है, आप घर में बैठे रह जाए, लेकिन जो भिन्नता आई है, एक डिफरेंट पूरा का पूरा परिदृश्य हो गया और उसके कारण जो जीवन में एक अलग किस्म की तीव्रता आ गई, त्वरा आ गई, भागदौड़ आ गई। काम उतने ही हो रहे है, लेकिन भागदौड़ ट्रैफिक के कारण, दूरियों के कारण, ज्यादा कार्यक्रमों के कारण।

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सवाल - तो यह संवादहीनता और संवेदनहीनता के कारण भी ?

जवाब - जब आप बड़ा नगर रह रहेंगे होंगे, तब संवादहीनता बढ़ेगी। ये मुंबई में भी है, कलकत्ता में भी है और बाहर जाए तो न्यूयॉर्क में भी होगी और सिडनी में भी होगी और कनाडा भी होगी। क्योंकि वो उसका रिजल्ट है। ये हमारी नहीं है, ये हमको मिलती है। ऐसे परिदृश्य में और ऐसे संसार में और वो निश्चित ही बढ़ी है।

सवाल - कुछ आपकी कविताओं की पंक्तियां ब़ड़ी खबरें बनानी वाली है, जैसे एक आपने कहा कि नेता डरते है खबरों से, खबरें डरती है विज्ञापन से, मीडिया जगत पर आपकी टिप्पणी बड़ी मौजू है, कैसे आपके मन में ख्याल आया ये ?

जवाब - अरे बाबा, ख्याल! पहले तो ये था कि अखबार में लगभग 35 प्रतिशत से अधिक विज्ञापन नहीं होना चाहिए। अब तो अखबार ऐसे आते है कि जैकेट पहने हुए। कि पहले एक जैकेट उतारिए, वो पूरा विज्ञापन का जैकेट है फिर दूसरा जैकेट उतारिए वो भी पूरा विज्ञापन का जैकेट है, जैसे हम छिलके छिल रहे हो और छिलको पर विज्ञापन छपा हो और अंदर फिर जाकर हमको अखबार मिलता है, अब अगर ऐसे में निश्चित ही बड़ा विज्ञापन जाएगा, तो खबरें हटाई जाएंगी। उनको फिर से लेआउट किया जाएगा। इसलिए विज्ञापन से खबरें डरती है। विज्ञापन ही विज्ञापन आजकल अखबार हो गया है। बल्कि एक बात और आगे चलकर कहना चाहूंगा कि संपादक नाम की नस्ल भी जो पहले हुआ करती थी, वो हटकर मालिक ही संपादक हो गया है। क्योंकि उसको विज्ञापन का खेल है। लिखा तो हम किसे से भी लेंगे। पैसा देकर लिखा लेंगे। पहले तो जो संपादक होता था वो मालिक होता या नहीं होता, वो लिखता था। तो जो संपादक वाला कंसेप्ट था, वो भी समाप्त हो गया और चीजे बहुत भिन्न हो गई है।

सवाल - आपकी कविता पतंग के बारे में, आसमान को लगता है पसंद उसकी है, हवा को लगता है कि पतंग पर उसका बस है, लेकिन वास्तव में पतंग उसके मालिक की होती है, जो चाहे जब खेंचता है, वो चाहे जब मांझे को हुचके में रोल करके पतंग को रख देता है, कुछ ऐसी ही स्थिति, क्या उस पतंग की जैसी स्थिति आज के अखबारों, के टीवी के संपादकों की हो गई ?

जवाब - हां, कितनी लिबर्टी वो देगा। एक संवाददाता जानता है कि उसको कितनी लिबर्टी है। पॉलिटिकल लिबर्टी की मैं किस पार्टी के बारे में किस हद तक जा सकता हूं, उसको मालूम है, संकेतों में मालूम है या स्पष्टत: मालूम है। निश्चित ही हर एक के वैसा ही है कि पतंग के मालिक की तरह कि वो कितनी उड़ने देगा और कब उसको खींच लेगा, यह स्थिति है। बल्कि देखो प्रकाश जी, मैंने रूपक लिखा है, ये तो मनुष्य और ईश्वर का भी है कि हमको उसने खेलने को दे दिया है और उसको लगेगा कि इतनी नहीं उड़ना चाहिए। ईश्वर पर लागू होता है कि नहीं ये मैं नहीं जानता, वो एक चला आ रहा है कथानक, लेकिन यहां तो बिल्कुल स्पष्ट घटित होते हुए देख रहा हूं।

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सवाब - आपने कहा सुख और दुख के बारे में कि सुख बड़ा चालाक है, दुख बड़ा जरूरी है। दुख न हो तो लोग प्रभु को याद करने भूल जाएगें, तो ये दार्शनिक भाव ये रूपक कैसे आपके जहन में आया ?

जवाब - देखो भई, वो पंक्तियां एक्जेक्ट याद तो नहीं है, वो कुछ ऐसा लिखा है कि सुख बहुत चालाक है, भटकाता है। अपने पते पर कभी नहीं मिलता, दुख भोला भाला है, दूसरो के पतों पर भी मिल जाया जाता है। सुख आपको एक पता देता है कि मैं वहां मिलूंगा, जब तू एमबीए हो जाएगा। मैं वहां तक पहुंचता हूं, वहां लगता है जब मुझे पूना में नौकरी मिलेंगी, तब सुख मिलेगा। वहां भी नहीं मिलता। फिर मालूम पड़ता है कि तेरे विवाह के बाद मिलेगा, तो वहां पहुंचता हूं, वहां नहीं मिलता। भटकाता रहता है, भटकाता रहता है, मरीचिका के समान और दुख जहां जाओ, दूसरों के पतो पर भी मिल जाता है। तो ये स्थायी भाव की तरह है और सुख इसलिए हमको चुनौती देता है, दुख हमको कम चुनौती देता है। सुख की दौड़ हमको चुनौती देती है और हम उसके द्वारा भटकते हुए भी अपना संधान करने के लिए बढ़ते रहते है। इस तरह की वो पंक्तियों का आशय है।

सवाल - आपने बरसों कोई 8-10 साल एक कॉलम लिखा नईदुनिया में, जो उन दिनों अच्छा अखबार माना जाता था, बड़ा प्रतिष्ठित था। स्वांतादुखाय:। कविता को संपादकीय पेज पर लाने की राजेन्द्र माथुर जी की मंशा थी, लेकिन उसे लिखना, उसे निभाना, लगातार दस साल तक निभाना, हर हफ्ते कविता लिखने, लोग कहते है कि कविता जरूरत के हिसाब से नहीं लिखी जाती, फिल्मों में ही लिखी जाती है, बाकी आम जीवन में कविता जरूरत के हिसाब से नहीं लिखी जाती। आपने कैसे यह जरूरत पूरी की अपने साथ ?

जवाब - देखो भई, वो भी एक चैलेंज था। आपने जिस माथुर साहब का उल्लेख किया, वो राजेन्द्र माथुर थे। वो खूब अंग्रेजी के अखबार वगैरह पढ़ते थे, तो उन्होंने उसमें देखा था कि जो एडिट पेज होता उस पर कविताओं के माध्यम से भी परिदृश्य को व्यक्त किया जाता है और मैंने जिस दंगे का उल्लेख किया है, इन्दौर के और एक लंबी कविता का उल्लेख किया, वो पढ़ चुके थे, तो उनको लगा कि ये सरोज कुमार लिख सकता है। उन्होंने मुझसे कहा कि लिखना है। मैंने लिखना शुरू किया। मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि वो कविताएं ऑब्जेक्टीविटी के अधिक नजदीक है, वो कविताएं सब्जेक्टीव कम है, क्योंकि उसमें वस्तु सामने है, वो भीतर से नहीं आ रही है, उसमें पत्रकारिता और साहित्य, पत्रकारिता और कविता दोनों का हिस्सा है। वो केवल कविता नहीं है।

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सवाब - वो कविताएं खबर का भी हिस्सा है ?

जवाब - येस, उसमें थोड़ा सा मेरे पास विषय है, जैसे निबंध लिखते है, सामने होता है इस पर लिखना है। वो विषय पर लिखी गई सौउद्देश्य कविताएं है।

सवाल - कभी आप चूके कि किसी हफ्ते नहीं लिख पाएं ?

जवाब - मुझे याद नहीं आता, एक आद बार कभी हुआ हूं, दस साल में मौका आता है। या कभी उस दिन अखबार ही नहीं निकला किसी कारण से। ऐसे भी कभी अवसर आए हैं। अन्यथा मेरी और से कभी कोई उसमें नागा नहीं हुआ।

सवाब - प्रो. सरोज कुमार, प्रोफेसर फिर कवि, लेकिन संस्कृतिकर्मी और रंगकर्मी के रूप में भी रंग संयोजक के रूप में रंग मंच के सहयोगी पुरोधा के रूप में आपने बहुत नाम कमाया। तो रंगमंच की यात्रा कैसे हुई आपकी, कविता से रंगमंच की ओर आगमन कैसे हुआ ?

जवाब - नहीं, नहीं। ये क्रम गलत है। जब स्कूल में था, जब भी नाटक खेले, हाई स्कूल में आया, तब भी नाटक खेले और कॉलेज में भी नाटक खेले और कॉलेज में नाटक के साथ कविता जुड़ गई और उस समय मेरा फस्र्ट लव वाज डिबेट, मैं डिबेटर रहा। हुआ ये कि कॉलेज में एक मैंने बहुत लंबा नाटक, उसमें मैं वकील बना था, वो था अंजू दीदी, वो था उपेन्द्र नाथ अश्व का लिखा हुआ। उस समय मुझे लगा कि कितना समय लगता है। नाटक एक टीम वर्क है। 15-20 लोग काम कर रहे है, 15-20 दिन तक रिहर्सल चल रही है, लेकिन प्रकाश जी, मेरे पास समय का बहुत अभाव रहता था। मैं रिहर्सलें अफोर्ड नहीं कर सकता था और आप नहीं जाते तो बाकी लोग भी आहत होते हैं, क्योंकि रिहर्सल नहीं हो पाती, प्रोक्सी कितने दिन चलेगी? तो नाटक चूंकि मैं कर नहीं पाता था, इसलिए उससे जुड़ा रहा, क्योंकि उससे मेरी बहुत आत्मीयता थी, प्रेम था, तो मैं उसके बैक स्टेज पर चला गया, ऐसा मान लीजिए, लेकिन नाटक मुझसे कभी छूटा नहीं।

सवाल - आपके जन्मदिन पर इन्दौर में जाल सभागृह में 3-3 दिन का नाट्य उत्सव हो रहा है, ये किसका आइडिया है ?

जवाब - नहीं ये तो इन्दौर थिएटर का आइडिया है, उन्होंने कहा कि सरोज जी

आप हमसे जुड़े हुए हैं, हम आपको कैसे बधाई दें ? ये सभाएं होती है, उसमें तो आप पर भाषण दिए जाते है, हम तो भाषण के लोग नहीं है। इन्दौर में प्रकाश जी, रंगकर्मी बहुत एक्टिव हैं, इस समय। तो उन सब ने कहा कि हम सब मिलकर तीन दिन नाटक खेलेंगे, यहीं हमारी बधाई का स्वरूप होगा, यहीं हम रचनात्मक बधाई आपको देना चाहते है। हम भाषण तो नहीं दे सकते है, इसलिए ऐसा कुछ होने वाला है कल से।

सवाल - क्या अभी भी आप नाटक में काम करते है ?

जवाब - मैंने आपसे कहा, नाटक का काम करता हूं, अभी भी करता हूं। कॉलेज के बाद से इतना संभव नहीं था, इतना समय दिया जाना, रिहर्सल में जाना संभव नहीं था।

सवाल - रंगमंच पर आप बरसों बरस छाए रहे, अब आपके कार्यक्रम कम हो गए, ऐसा क्यों ?

जवाब - नहीं, रंगमंच से आपका तात्पर्य नाटक से है।

सवाल - नहीं, मेरा मतलब कविता से है ? पहले आप कवि सम्मेलनों में बहुत शिरकत करते थे, पूरे देशभर में यहां-वहां कवि सम्मेलनों में धूम थी। सरोज कुमार एक नाम अभी भी है, लेकिन उस दौर में कवि सम्मेलनों का एक आकर्षण होता था। कविताओं में जो हलकापन, तथाकथित कविता में जो हलकापन आया, आपने उसकी मुखालिफत करते रहे, अब कैसा लगता है आपको, कविता का क्या माजरा है ?

जवाब - देखो, इसमें जो पहली बात है कि मैं कवि सम्मेलनों में कम पाया जाता हूं, तो इसका एक उत्तर तो ये है, बल्कि उसमें एक प्रश्न भी है कि क्या आप नहीं महसूस करते कि कवि सम्मेलन ही कम हो गए है। पहले यहां इतनी मिलें थी, हर एक का कवि सम्मेलन, कितने चौराहों-चौराहों पर कवि सम्मेलन। बाद में कलेक्टर ने कहा कि 11 बजे के बाद लाउड स्पीकर नहीं लगा सकते, जबकि कवि सम्मेलन तो इन्दौर में 11 बजे के बाद प्रारंभ होता था। रेसीडेंसी में गड़बड़ हो गया। कलेक्टर साहब ने कहा कि ये मेरी संस्था है, लेकिन 11 बजे समाप्त करना पड़ेगा। एक तो कवि सम्मेलन बहुत कम हो गए, दूसरी बात उनका जो स्तर हुआ, तीसरी बात ये जो अन्य गतिविधियां बढ़ी, ये सब मिलाकर कुछ कम हुए, अन्यथा अभी भी मैं लगातार कवि सम्मेलनों में इन्दौर और इन्दौर के बाहर बराबर जाता रहता हूं।

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सवाल - आपको कभी फिल्मों का शौक नहीं हुआ कि फिल्मों में जाकर गाने लिखे ? जय प्रकाश चौकसे जी की फिल्म में आपने कुछ लिखा था, कवि थे जिनका नाम सरोज कुमार, ‘शायद’ फिल्म का नाम था ।

जवाब - सुनो, फिल्मों के लिए गाने तो मैंने शायद फिल्म के लिए लिखा था। चौकसे जी ने एक फिल्म के लिए मुझसे कुछ लिखावाया था, लेकिन उनके पास रखा हुआ है, उन्होंने अपने कॉलम में उद्घृत भी किया था, लेकिन वो फिल्म बनी नहीं। एक मजे ले लो नाम की फिल्म बनी थी, उसमें मुझको कविता पाठ करते हुए प्रस्तुत किया गया था। और प्रकाश जी, फिल्मों के लिए गीत लिखना अगर मैं तय करता, तो मैं इन्दौर से नहीं लिख सकता, उसके लिए आपको मुंबई रहना पड़ेगा और एक बार जब यहां पर भरत व्यास आए थे, जब उन्होंने एक बहुत अच्छी बात कही थी, मैंने उनसे पूछा था कि आप इतने बड़े कवि है, आप फिल्मों में कैसे लिख लेते है, आपको कठिनाई नहीं आती? तो बोले भई, कठिनाई तो आती है, क्योंकि वहां पर पहले आपको कफन दे दिया जाता है कि इतना बड़ा है, अब उसके नाप की बॉडी चाहिए। लेकिन कविता का जो निजी मिजाज है, वो ये नहीं है कि आपको इतनी लाइनों में इस सिच्युएशन में, इस तरह के शब्दों में कविता लिखना है। क्योंकि यह आजादी कवि की होती है। वहां पर उसकी आजादी कम हो जाती है, तो कुछ आकर्षण उस तरफ रहा नहीं।

सवाल - कई लोगों के आप प्रिय कवि है, आपका प्रिय कवि कौन है, और इन्दौर में आप किन कवियों को अच्छा कवि मानते है ?

जवाब - देखो भई, लड़ाई करा दोगे। इसमें तो बड़ा गड़बड़ है। क्योंकि मेरे अनेक प्रिय कवि है और अगर कम प्रिय भी है, तो उनसे मेरी मित्रता है। और कविता का मामला तो ऐसा है, हमारे अंचल में प्रेमी जी हुए, सुमन जी हुए ये बहुत महत्वपूर्ण कवि हुए। फिर हमारे वीरेन्द्र मिश्र रहते थे, फिर यहां पर नरेश मेहता कितने सालों रहे। ये सब मेरे प्रिय कवि है। इन सब ने ना केवल कविता में, बल्कि जीवन की कई घटनाओं से मेरे जीवन को प्रभावित किया और मेरे पर किसका प्रभाव है, ये मैं नहीं जान सकता। ये तो समीक्षक ही मेरी कविता को पढ़ते समय बता सकता है कि यह प्रभाव है। क्योंकि प्रभाव डायरेक्ट नहीं आता, प्रभाव बहुत अवचेतन के रास्तों से आता है। उसको जरूरी नहीं है कि मैं पहचान पाऊं, अगर आया भी होगा, तो शायद कोई पहचानेगा, लेकिन मैंने तो मेरे मित्र, ऊपर से मेरे आदरणीय रहे है कि मेरे को लगता है कि इनका आना चाहिए, आया चाहे न हो, लेकिन मैं चाहूंगा इनका आया हो, ऐसा कुछ होगा।

सरोज कुमार का यह इंटरव्यू उनके जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 2013 में किया गया था। डिजिन्यूज पर इसका प्रसारण हो चुका है और यू-ट्यूब पर भी यह इंटरव्यू यहां देखा जा सकता है। 

https://www.youtube.com/watch?v=MsEPVLxL0Gk

 

सरोज कुमार की कविताएं

 

 1. अलंकरण

 

डिग्री को
तलवार की तरह घुमाते हुए
वह संग्राम में उतरा
वह काठ की सिद्ध हुई!

 

डिग्री को
नाव की तरह खेते हुए
वह नदी में उतरा
वह काग़ज़ की सिद्ध हुई!

 

डिग्री को
चेक की तरह संभाले हुए
वह बैंक पहुंचा
वह हास्यास्पद सिद्ध हुई!

डिग्री को कांच में जड़वाकर 

उसी दीवार पर उसने लटका दिया,

जिस पर शेर का मुंह

और हिरन के सींग टंगे थे 

शोभा में, इजाफ़ा करते हुए!

 

2. राष्ट्रगीत

 

वे नहीं गाते राष्ट्रगीत
महानता के फ़्रेम में जड़े हुए
विजेता के अंदाज़ में, मंच पर खड़े हुए
'सब एक साथ गाएंगे', कहने पर भी
वे नहीं गाते राष्ट्रगीत!

 

भारत भाग्य विधाता... वगैरह
इस अदा से सुनते हैं
मानो उनकी ही प्रशस्ति हो,
वे ही तो हैं जन-गण-मन अधिनायक,
जय-जयकार उचारें जिनका
समारोह के गायक!

 

पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा...
इस अंदाज़ से सुनते हैं
मानो उनकी ही रियासतें हों
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा...
उनके ही टीले हों, झरने हों, झीलें हों!

 

मंचों पर बार-बार खड़े-खड़े विश्वास बढ़ता जा रहा है,
कि बख्शीशें मांगता हुआ हिंदुस्तान
उनकी ही जय-गाथा गा रहा है!

 

3. सेनापति

 

आईने के सामने बैठते ही
चिड़िया
अपने प्रतिबिम्ब को
चोंच मारने लगी!

 

उसे बताया
कि वो तू ही है
दूसरी नहीं,
तेरी चोंच टूट जाएगी
फिर तू कैसे खाएगी
कैसे चह्चहाएगी!

 

बोली, मैं नहीं
वो मुझे चोंच मार रही है
पहली चोंच उसने ही मारी थी,
मैं तो केवल
जवाब दे रही हूं!

 

मैंने समझाया :
जवाबी चोंच मत मार
लड़ाई
अपने आप रुक जाएगी!

 

बोली :
ये बात किसी सेनापति से
कहला दे,
तो जानूं!
तू तो कवि है
लड़ाई के मामले में
तेरी बात
क्यों मानूं?

 

4. तुम कहीं के भी कवि क्यों न हो

 

हो सकता है मेरे यहां दिन हो
तुम्हारे यहां रात हो!
मेरे यहां वसंत हो
तुम्हारे यहां पतझर!
मेरे यहां प्रजातंत्र
तुम्हारे यहां तानाशाही!
मेरे यहां ग़रीबी
तुम्हारे यहां ऐश्वर्य!
मरती हों मेरे यहां औरतें कुएं में गिरकर
तुम्हारे यहां गोलियां खाकर !
इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?
वसंत जब भी होगा और जहां भी
फूल खिलेंगे
कोशिश जब भी होगी और जहां भी
कवि पैदा होंगे!

 

कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
तुम्हारी चमड़ी के रंग
और जीने के ढंग से,
तुम्हारी आस्थाओं और ईश्वर से!
यह काफ़ी है तुम्हें जानने के लिए
कि तुम कवि हो
और अगर हो, तो
कहिं के भी क्यों न हो,
तुम्हारी अनुभूतियों के आलंबन
और संवेदनाओं के मूलधन
अनजाने नहीं हैं,
कविता का पहला प्यार पीड़ा है!

 

आग जहां भी होगी,

आग होगी,

ईंधन के हिसाब से,

आज की ज़ात नहीं बदलती!

 

नदी जहां भी होगी,
नदी होगी,
किसी देश की नदी
पहाड़ पर नहीं चढती!

 

तुम्हारी कविताएं
जितनी तुम्हारी हैं, उतनी हमारी भी,
कविता की कोई
मेकमहन रेखा नहीं होती!
कविता का समूचा जुगराफ़िया
एकमात्र इंसान है -
जिसकी संप्रभुता में
प्रभुता नहीं प्यार है!

 

5. लड़की को बड़ी मत होने दो

 

तुम इधर क्या ऊंघ रहे हो?
उधर लड़की बड़ी होने लगी है--
धीरे-धीरे
पांव पर खड़ी होने लगी है!
धरती को हिलाओ,
लड़की को डिगाओ,
अगर वह सचमुच खड़ी हो जाएगी
तो हमसे भी बड़ी हो जाएगी!

 

फिर हाथ पसारती
राखियों का क्या होगा?
हमारी सौंपी
बैसाखियों का क्या होगा?

 

वह पांव खड़ी हो गई,
तो चलने भी लगेगी
नया-नया देखेगी,
मचलने भी लगेगी !
संविधान देख लेगी,
तो अधिकार मांगेगी
पिता की पासबुक से
कार मांगेगी!

 

फिर सनातन पगडंडियों का
क्या होगा?
होनहारों की मंडियों का
क्या होगा?

 

उसे कंचे, पांचे और
कौडियां ही झिलाओ
सिलाई-बुनाई के
झुनझुनों से खिलाओ!

 

उसे देवरानी, जिठानी की
कहानी ही कहने दो
आंचल में दूध,
पानी आंखों में रहने दो!

 

चादर को
माथे की पगड़ी मत होने दो,
लड़की है,
लड़की को बड़ी मत होने दो.

 

6. मां

 

मां, जिसने मुझे जन्म दिया
मेरे लिए
ज़रूरत बेज़रूरत
मरने को भी तैयार हो
जाएगी
बिना एक पल खोए!

 

पिता नहीं!

 

मैं कृति हूं मां की
ऐसी चित्र-कृति
जिसमें उंडेल दिए थे उसने
अपने सारे रंग
सारी सांसें, सारे सपने !

 

पिता तो बस
ईज़ल रख कर जा चुके थे.

 


7. सपाट संसार

 

जो झूठ को झूठ नहीं कह पाता,
वह सच को सच क्या कहेगा!
जो दुश्मन को दुश्मन नहीं कह पाता,
वह दोस्त को दोस्त क्या कहेगा!
जो कांटे को कांटा नहीं कह पाता,
वह फूल को फूल क्या कहेगा!

 

जिसे बुरा, बुरा नहीं लगता,
उसे भला, भला कैसे लगेगा!
जिसे अन्याय, अन्याय नहीं लगता,
उसे न्याय, न्याय कैसे लगेगा !
जिसे गुलामी, गुलामी नहीं लगती,
उसे आज़ादी, आज़ादी कैसे लगेगी!

 

जिसके लिए पाप, पाप नहीं है,
उसके लिए पुण्य, पुण्य कैसे होगा?
जिसके लिए आग, आग नहीं है,
उसके लिए पानी, पानी कैसे होगा?
जिसके लिए धरती, धरती नहीं है,
उसके लिए आकाश, आकाश कैसे होगा?

 

ज्ञान और साहस है-
तो जीवन है, ठाठ है!
जड़ता है, भय है-
तो संसार सपाट है!

 

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