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donationजब भी आम चुनाव आते है भारत में कारोबार बढ़ जाता है। मरणासन न्यूूज चैनलों को नया जीवन मिल जाता है। छोटे-मोटे अखबार भी खासी कमाई करने लगते है। पार्टी कार्यकर्ता से लेकर छोटे-मोटे दुकानदार तक रोजगार में लग जाते है। इस कारोबार में घोषित और अघोषित दोनों तरह के लेन-देन होते है। चुनावों को पारदर्शी बनाने के लिए बहुत सारे प्रयास किए गए, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। भारत के कंपनी कानूनों के मुताबिक कोई भी कंपनी अपने तीन वर्ष के मुनाफे के औसत का साढ़े सात प्रतिशत राजनैतिक पार्टियों को दान दे सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि जो बड़े घराने राजनैतिक दलों को चंदा देते है वे एक हद तक ही पारदर्शिता दर्शाते है। उसके आगे-पीछे भी कुछ न कुछ लेन-देन होता रहता है। यह लेन-देन नकद के बजाय सौजन्य पर निर्भर है। इस तरह के सौजन्य योगदान में नेताओं को हवाई जहाज उपलब्ध करवाने से लेकर बड़ी मात्रा में झंडे पैनल उपलब्ध कराना, वाहनों के काफिलों का इंतजाम आदि शामिल है। चुनावी चंदे को चैनलाइज करने के लिए बनाए गए ट्रस्टों में सत्या ट्रस्ट सबसे बड़ा ट्रस्ट है। हाल ही में इस ट्रस्ट की रिपोर्ट आई तो पता चला कि भारतीय जनता पार्टी को 2014 में कुल 363 करोड़ का अधिकाधिक चंदा मिला। 2014 में कांग्रेस को मिले चंदे की राशि 59 करोड़ रुपए रहीं। बीते वित्तीय वर्ष में भारतीय जनता पार्टी को 20 हजार रुपए या उससे अधिक चंदा देने वाले 1480 लोग थे। जबकि कांग्रेस को केवल 710 ऐसे चंदे मिले जिसकी राशि 20 हजार या उससे अधिक थी। कानून के मुताबिक 20 हजार रुपए से कम चंदा देने वालों के विवरण रखना जरूरी नहीं है और पार्टियां इसी का फायदा उठाकर ब्लैकमनी को व्हाइट करने का काम करती है।

भारतीय जनता पार्टी को 2014 में मिले चंदे में सबसे बड़ा योगदान भारती ग्रुप (एयरटेल) के सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट का रहा है। जिसने 41 करोड़ 37 लाख रुपए भारतीय जनता पार्टी की झोली में डाले। 33 कंपनियों और 1 ट्रस्ट ने भारतीय जनता पार्टी को एक करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा दिया, जिसमें महिन्द्रा लाइफ स्पेस, हीरो साइकिल्स, भारत फोर्ज, टोरेन्ट पॉवर, कैडिला हेल्थकेयर, वीडियोकॉन इंडस्ट्री, बिरला कार्पोरेशन और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्रमुख है।

भाजपा को मोटा चंदा देने वाले भारती ग्रुप के सत्या ट्रस्ट ने कांग्रेस को भी 36 करोड़ 50 लाख रुपए का चंदा दिया था। इस ट्रस्ट ने भाजपा को 41 करोड़ 37 लाख तो उसे संतुलित करने के लिए कांग्रेस की झोली में भी अच्छा खासा रुपया डाल दिया। कुछ कार्पोरेट घराने इतने बुद्धिमान निकले कि विवादों से बचने के लिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को बराबर चंदा दे दिया। एवी पाटिल फाउंडेशन ने 5 करोड़ कांग्रेस को दिए तो 5 करोड़ भाजपा को दिए। भारत फोर्ज ने भी कांग्रेस और भाजपा को ढाई-ढाई करोड़ रुपए दिए। महिन्द्रा लाइफ स्पेस ने भी कांग्रेस को एक करोड़ दिए थे।

भारत के प्रमुख बड़े औद्योगिक घरानों में अनिल और मुकेश अंबानी की रिलायंस कंपनियों, अनिल अग्रवाल की वेदांता, कोटक, महिन्द्रा, केके बिडला और मुरुगप्पा समूह राजनैतिक दलों को दान देने के लिए आगे आते रहे है। भारतीय जनता पार्टी चाहे सत्ता में रही हो या ना रही हो उसे इन कार्पोरेट घरानों का नियमित चंदा मिलता रहा है। सन् 2005 से लेकर 2012 तक भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस की तुलना में कार्पोरेट घरानों से ज्यादा चंदा मिला है। भारतीय जनता पार्टी कार्पोरेट घरानों से चंदा लेने में हमेशा आगे रही है। इस अवधि में जहां कांग्रेस को केवल 418 चंदे मिले, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने 1334 चंदे के चेक हासिल किए। भारतीय जनता पार्टी को चंदा देने वालों में मेन्यूफैक्चरिंग और रियलटी सेक्टर आगे रहा है, जबकि कांग्रेस को चंदा देने वालों में कंस्ट्रक्शन कंपनियां और खदान समूह हमेशा आगे रहते है।

बिजनेस स्टेण्डर्ड अखबार के एक विश्लेषण के अनुसार भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस की तुलना में दो गुने से भी ज्यादा चंदा कार्पोरेट घरानों से मिला। चुनाव आयोग ने राजनैतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए जो पहल की थी उसकी गाइड लाइन के अनुसार अनेक कार्पोरेट घराने ट्रस्ट बनाने के लिए आगे आए। इन घरानों ने ट्रस्ट बनाकर राजनैतिक पार्टियों को दान देने की शुरुआत की, ताकि चुनाव के खर्चे में काले धन पर अंकुश लगाया जा सके। बिजनेस स्टेण्डर्ड के अनुसार कांग्रेस को 70 करोड़ 28 लाख ट्रस्ट और समूह कंपनियों से, खदान, कंस्ट्रक्शन और इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट सेक्टर से 23 करोड़ 7 लाख रुपए मिले, जबकि भारतीय जनता पार्टी को उत्पादन सेक्टर से 58 करोड़ 18 लाख, ऊर्जा और तेल सेक्टर से 17 करोड़ 6 लाख और रियलटी सेक्टर से 17 करोड़ 1 लाख रुपए मिले। रियलटी सेक्टर और मेन्यूफैक्चरिंग घरानों का योगदान राजनैतिक पार्टियों को चंदा देने में हमेशा आगे रहा है। 2005 से लेकर 2012 तक कांग्रेस को चंदा देने वालों में आदित्य बिडला ग्रुप ने 36 करोड़ 41 लाख, टोरेंट पॉवर ने 11 करोड़ 85 लाख और भारती समूह के सत्या ट्रस्ट ने 11 करोड़ रुपए दिए थे। इसी अवधि में आदित्य बिडला ग्रुप ने भारतीय जनता पार्टी को 26 करोड़ 57 लाख, टोरेंट ग्रुप ने 13 करोड़ और एशियानेट होर्डिंग्स ने 10 करोड़ रुपए दिए।

2013 में हालात एकदम बदल गए। कांग्रेस को चंदे में 11 करोड़ 72 लाख रुपए मिले, जबकि भारतीय जनता पार्टी को इससे 7 गुना से भी ज्यादा चंदा मिला। आदित्य बिडला ग्रुप जो कांग्रेस का परंपरागत भामाशाह था, भारतीय जनता पार्टी की ओर झुका। 2012-13 में 7 करोड़ 50 लाख रुपए भारतीय जनता पार्टी को दिए। जबकि कांग्रेस को कुछ भी नहीं दिया।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म संस्था ने जो आंकड़ों का विश्लेषण किया है उसके अनुसार सत्या ट्रस्ट द्वारा भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और एनसीपी को कुल चंदे का 48.44 प्रतिशत हिस्सा मिला। चुनावी चंदे के लिए 15 घरानों ने अपने-अपने ट्रस्ट बनाए है। जिनमें वेदांता ग्रुप का जनहित, रिलायंस ग्रुप का पीपुल्स, महिन्द्रा ग्रुप का महिन्द्रा ट्रस्ट, टाटा समूह का प्रोग्रेसिव, एमपी बिडला ग्रुप का परिवर्तन, बजाज ग्रुप का बजाज ट्रस्ट, कोटक समूह का जनता निर्वाचक ट्रस्ट, लोढ़ा ग्रुप का जागृति, केके बिडला ग्रुप का समाज, जैन ग्रुप का गौरी वेलफेयर ट्रस्ट प्रमुख है। इनमें से अधिकांश ट्रस्ट की कोई जानकारी चुनाव आयोग के पास नहीं है। पुराने आंकड़ों पर जाए तो 2004 से लेकर 2011 तक सात साल में कार्पोरेट घरानों में 4 हजार 662 करोड़ रुपए पार्टियों को दान दिए। यह राशि किसी भी बड़े कार्पोरेट घरानों के कारोबार से मेल खाती है।

चुनाव आयोग के अनुसार राष्ट्रीय पार्टियों में एनसीपी ही ऐसी पार्टी है जिसने नियमित रूप से अपना हिसाब-किताब पेश नहीं किया। क्षेत्रीय पार्टियों में केवल पांच ऐसी है, जो नियमित रूप से आयकर विभाग के सामने अपना रिकॉर्ड रखती है। इनमें समाजवादी पार्टी, एआईएडीएमके, जनता दल यूनाइटेड, शिवसेना और तेलगु देशम पार्टी शामिल है। 18 क्षेत्रीय पार्टियां तो ऐसी है, जिन्होंने कभी भी अपने चंदे का हिसाब बताने की जेहमत नहीं उठाई। भारतीय जनता पार्टी ने अपना हिसाब-किताब नियमित तारीख के दो महिने बाद पेश की। बहुजन समाज पार्टी एक मात्र पार्टी है जिसने यह ऐलान किया कि उसे किसी ने भी 20 हजार रुपए से ज्यादा चंदा दिया ही नहीं, इसलिए वह दान-दाताओं के नाम बताने के लिए बाध्य नहीं है। बहुजन समाज पार्टी के नेता मायावती कुछ वर्ष पहले विवादों में घिर गई थी, जब उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों और विधायकों से कहा था कि उन्हें सांसद या विधायक कोटे से कार्य कराने के लिए जो राशि मिलती है उसका एक निश्चित प्रतिशत पार्टी फंड में जमा करना जरूरी है।

-प्रकाश हिन्दुस्तानी

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