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मदर टेरेसा की अप्रत्यक्ष आलोचना करने वालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की बात विवादों में घिरी रही है। संसद में भी इस पर चर्चा की और अनेक राजनैतिक दलों ने मोहन भागवत की आलोचना की। शिवसेना ने जरूर भागवत के बयान का एक हद तक समर्थन किया, लेकिन मोहन भागवत पहले व्यक्ति नहीं है, जिन्होंने मदर टेरेसा के बारे में खुलकर अपने विचार रखें। मोहन भागवत ने कहीं भी मदर टेरेसा की सेवा की आलोचना नहीं की। उन्होंने यहीं कहा कि मदर टेरेसा की सेवा के पीछे धर्म परिवर्तन का उद्देश्य छुपा था। अगर हम अपने लोगों की सेवा करें तो किसी और व्यक्ति को यहां आकर सेवा करने की जरुरत ही नहीं पड़े।

मोहन भागवत से उल्टे विचार ओशो के रहे है। वे खुलकर महात्मा गांधी और मदर टेरेसा के बारे में बोलते रहे है। ओशो के अनुसार भारत के दुर्भाग्यों में से एक दुर्भाग्य यह है कि हम अपने महापुरुषों की आलोचना करने में समर्थ नहीं हो पा रहे है। या तो हम अपने महापुरुषों को इस योग्य नहीं समझते कि उनकी आलोचना की जा सवेंâ या हम यह समझते है कि हमारी आलोचना के सामने महापुरुष टिक नहीं पाएंगे। महात्मा गांधी के बारे में ओशो ने कहा था कि वे ऐसे व्यक्ति नहीं है जो आलोचना से धूमिल होंगे। मेरी नजर में महात्मा गांधी ऐसी हस्ती है जो पत्थर की महान प्रतिमाओं की तरह अगर उन पर आलोचना की बारिश होगी तो उस पर जमीं धूल-मिट्टी बह जाएगी और उनकी प्रतिभा और ज्यादा निखर कर प्रकट होगी, लेकिन मदर टेरेसा के बारे में ओशो के ख्याल ऐसे नहीं थे। उन्होंने मदर टेरेसा के बारे में साफ-साफ कहा था- ‘‘मेरे लिए मदर टेरेसा और उनके जैसे लोग पाखण्डी है, क्योंकि वो कहते एक बात है, लेकिन यह सिर्पâ बाहरी मुखौ टा होता है। वे करते दूसरी बात है, यह पूरा खेल राजनीति का है- संख्या बल की राजनीति’’।

दरअसल जब मदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार की घोषणा की गई थी। तब ओशो ने मदर टेरेसा के कामों का विश्लेषण किया था, जिससे मदर टेरेसा नाराज हो गई थी और उन्होंने ओशो को एक पत्र लिख दिया। उस पत्र को लेकर ओशो ने अपने प्रवचनों में साफ-साफ कहा कि राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए है। इन दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें की है। इन्हें खुद पता नहीं होता कि यह क्या कर रहे है? कई बार इनकी नियत ठीक होती है, लेकिन चेतना के अभाव में ये समझ नहीं पाते है कि यह क्या कर रहे है? मदर टेरेसा ने ओशो को जो पत्र लिखा था : संदर्भ- नोबल पुरस्कार और इसके आगे मदर टेरेसा ने ओशो को लिखा था कि आपने मेरे नाम के साथ जो विशेषण इस्तेमाल किए उसके लिए मैं पूरे प्रेम से क्षमा करती हूं।

ओशो ने अपने प्रवचन में कहा कि मैंने मदर टेरेसा की आलोचना की थी और कहा था कि उन्हें नोबल पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था। उन्होंने मेरी बात को अन्यथा ले लिया। वह आदमी, नोबल दुनिया के सबसे बड़े अपराधियों में से एक था। वह हथियारों का बहुत बड़ा निर्माता था। पहला विश्व युद्ध उसके हथियारों से ही लड़ा गया था। ऐसे आदमी के नाम पर पुरस्कार मिलने पर मदर टेरेसा मना नहीं कर सकी। प्रशंसा पाने की चाह, सारे विश्व में सम्मान पाने की चाह, नोबल पुरस्कार वह सम्मान दिलवाता है सो उन्होंने पुरस्कार सहर्ष स्वीकार कर लिया। ओशो ने मदर टेरेसा के लिए अमग्न्ी (धोखेबाज, कपटी, धूर्त) शब्द का इस्तेमाल किया था। मोहन भागवत ने मदर टेरेसा के सेवा के काम की सराहना की थी और भारतीयों की कमी बताई थी कि अगर वे सेवा कार्य ठीक से करते तो बाहरी लोगों को यहां आकर सेवा कार्य की जरूरत नहीं पड़ती।

ओशो ने अपने प्रवचन में साफ किया कि मदर टेरेसा कि नियत धोखा देने की कभी नहीं रही होगी, लेकिन यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है परिणाम। ऐसे लोग चाहते है कि समाज में शोषण का पहिया, अत्याचार का पहिया यूं ही आसानी से घूमता रहे। ऐसे लोग न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी धोखा देते है।

मदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार इसलिए दिया गया कि वे हजारों अनाथों की सहायता करती है और उनकी संस्था में हजारों अनाथालय है। अचानक एक दिन उनकी संस्था के पास एक भी बच्चा गोद देने के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता। क्या यह संभव है कि भारत जैसे देश में कोई बच्चा अनाथ न हो। दरअसल मदर टेरेसा केवल ईसाई परिवार को ही बच्चे गोद देने का काम करती है। जब मदर टेरेसा को पता होता था कि यह अनाथ बच्चा हिन्दू धर्म का है तब उसकी परिवरिश हिन्दू परिवार में हिन्दू रीति-रिवाजों से क्यों नहीं होती? जब भारतीय संसद में धर्म की स्वतंत्रता के ऊपर एक विधेयक प्रस्तुत किया गया तब उसका विरोध करने वाली पहली व्यक्ति थी मदर टेरेसा। धर्म की स्वतंत्रता विधेयक का उद्देश्य क्या था? यहीं था कि किसी को भी दूसरे धर्मावलम्बी को धर्म परिवर्तन कराने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, जब तक वह व्यक्ति खुद अपनी इच्छा से अपना धर्म छोड़कर किसी और धर्म की शरण में न जाना चाहे। मदर टेरेसा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और कहा कि यह विधेयक किसी भी हालत में पास नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह हमारे काम के खिलाफ जाता है। हम लोगों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है और लोग केवल जब ही बचाए जा सकते है जब वे ईसाई बन जाए। मदर टेरेसा ने उस विधेयक पर इतना हो-हल्ला, इतना हो-हल्ला मचाया कि वह विधेयक पास नहीं हो सका। उसे भुला दिया गया। अगर मदर टेरेसा इतनी ईमानदार थी, तो उन्हें किसी भी धर्म के व्यक्ति की मदद करने में संकोच नहीं करना चाहिए था। अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदल लें तो यह उसकी मर्जी। मेरे लिए मदर टेरेसा और उनके जैसे लोग पाखंडी है।

ओशो अपनी भूमिका को लेकर बहुत स्पष्ट रहे है। वे साफ कहते थे कि मैं गरीब लोगों की सेवा नहीं करना चाहता। मैं गरीबों की गरीब खत्म करके उन्हें समर्थ बनाना चाहता हूं। मेरी रूचि किसी भी गरीब को गरीब बनाए रखने में नहीं है। लोगों की गरीबी दूर होना मेरे लिए आनंद का विषय है। मेरी राय में पोप और मदर टेरेसा जैसे लोग अपराधी है और उनके अपराध को देखने के लिए बहुत सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता है।

मैं गरीबों की सेवा करना नहीं चाहता। गरीबों की सेवा करने के लिए बहुत सारे लोग मौजूद है। आप तो बेचारे अमीरों को मेरे लिए बख्श दीजिए। मैं अमीरों का गुरू हूं और अमीरों की ही सेवा करना चाहता हूं।- ओशो

-प्रकाश हिन्दुस्तानी 

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