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बुरहानपुर टूरिज्म प्रमोशन काउंसिल और जिला पुरातत्व संघ, बुरहानपुर द्वारा प्रकाशित कॉफी टेबल बुक कलात्मक और सूचनाप्रद है। ‘ताप्ती, तप और ताकत’ शीर्षक से प्रकाशित यह प्रकाशन कॉफी टेबल की शोभा निश्चित ही बढ़ाएगा। इस किताब में बुरहानपुर के बारे में ऐतिहासिक, दिलचस्प और सुरूचिपूर्ण सामग्री संजोई गई है। शासकीय प्रकाशन है, इसलिए विवादों से बचने के लिए डिस्क्लेमर भी दिया गया है कि यह किताब प्रामाणिक, ऐतिहासिक या नैतिक होने का कोई दावा नहीं करती। यह डिस्क्लेमर अनावश्यक ही लगता है, क्योंकि इसके संपादक मुकेश मिश्रा और सुबोध खंडेलवाल ने विश्वसनीयता का पूरा ध्यान रखा है। कलेक्टर दीपक सिंह के प्रोत्साहन और प्रयास से ही यह प्रकाशन संभव हो पाया है। इतिहासकार डॉ. शरद पगारे, शाजी जमां, भगवतीशरण मिश्रा, हेरम्ब चतुर्वेदी, पंकज घनश्याम शाह, अफसर एहमद, युगजीत नवलपुरी आदि ने इसमें मदद की है। पुस्तक में शामिल खूबसूरत छायाचित्र बुरहानपुर के जाने-माने छायाकारों नयन तापड़िया, रजा खान, अमर चौहान, सपना दलाल, सचिन पंवार के साथ ही इंदौर के तनवीर फारुकी और इंदौर के हनीफ तड़वी के है। पुस्तक हिन्दी और अंग्रेजी में है।

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बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि अतीत में बुरहानपुर कितना वैभवशाली शहर था और कारोबार का कितना बड़ा केन्द्र। यह बात भी बहुत कम लोगों को पता है कि वास्तव में ताजमहल आगरा के बजाय बुरहानपुर में ही बनना था। इसकी शुरूआत भी हो गई थी। मुमताज को पहले बुरहानपुर में ही दफनाया गया था और बाद में उन्हें ले जाकर आगरा के ताजमहल में दफनाया गया। बुरहानपुर की यहां-वहां फैली हुई अतीत की विरासत को यह किताब पाठक से परिचित कराती है। बुरहानपुर जो कभी वैभव, कला, संस्कृति और सभ्यता का संगम था, आज कई क्षेत्रों में पिछड़ गया है। दुर्भाग्य की बात है कि हममें अपनी विरासत के प्रति स्वाभिमान की भावना उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए।

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यह किताब बताती है कि शाहनवाज खां के मकबरे का नाम काला ताजमहल क्यों पड़ा और पहली जामा मस्जिद को बीवी की मस्जिद क्यों कहा जाता है? मध्यकालीन भारत की इंजीनियरिंग कितनी समृद्ध रही होगी, उसका अंदाज कुंडी भंडारा से होता है, जहां पत्थरों को इस तरह संजोया गया है कि पानी की कमी कभी नहीं होगी। (कई लोग कुंडी भंडारा को खूनी भंडारा भी कहते हैं।) मांडू के बाज बहादुर और रूपमती की प्रेम कहानी की तरह ही गुल आरा बाई की कहानी भी इस किताब में है। इस किताब से पता चलता है कि मुमताज को मौत के बाद पहले जिस जगह दफनाया गया था, वह वास्तव में एक शिकारगाह रही है। भोपाल और मांडू की तरह बुरहानपुर में भी पुराने शाही हमाम हुआ करते थे, जिन्हें आप पुराने स्पा का नाम दे सकते है। बुरहानपुर से ही सटे असीरगढ़ और उसके किले के रोमांच, छल और रहस्य के बारे में भी किताब में लिखा गया है। बुरहानपुर से गुजरने वाली सूर्य पुत्री ताप्ती नदी और उसके घाटों के किस्से भी पुस्तक में सचित्र हैं।

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इस प्रकाशन के पन्नों से गुजरना अतीत की विरासत के दर्शन करने जैसा है। सुखद, रोचक और सुखानुभूति वाला। बुरहानपुर के उत्सव और मेले के बारे में भी जानकारी है और ताप्ती के घाटों के बारे में भी। बुुरहानपुर की खेती-बाड़ी और व्यापार की प्रारंभिक जानकारियां इस किताब में दी गई है। शिक्षा और उद्योग धंधे के बारे में भी बुुनियादी जानकारियां है। किताब में बेहद खूबसूरत तस्वीरें है, सुंदर नक्शे है और मनभावन ग्रॉफिक्स कला का उपयोग किया गया है। सरकारी प्रकाशन होने के कारण बारह नेताओं और अफसरों के अनमोल संदेश भी बोनस में उपलब्ध हैं। यह कॉफी टेबल बुक हार्ड बाउंड और सॉफ्ट बाउंड में उपलब्ध है। हार्ड बाउंड में इसकी कीमत 1100 रूपए है।

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