Bookmark and Share

RAVAN

रावण की छवि जनमानस में किसी खलनायक से कम नहीं। रावण नामक के बजाय एक विशेषण की तरह याद किया जाता है। हर विजयादशमी को रावण के प्रतीक पुतले का दहन किया जाता है और भगवान राम की महिमा का वर्णन होता है। पत्रकार शैलेन्द्र तिवारी ने रावण के जीवन के उन पहलुओं को जानने और समझने की कोशिश की है, जो उनकी छवि के विपरीत थे। कहते है कि मध्यप्रदेश के मंदसौर में रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका था, शायद इसीलिए वहां रावण का मंदिर है और रावण की पूजा होती है। कहा जाता है कि रावण था ही इतना बलशाली और बुद्धिमान कि वह सृष्टि की संरचना अपनी मर्जी से करने में सक्षम था।

शैलेन्द्र तिवारी के अनुसार रावण वास्तव में एक अपराजित योद्धा था। एक ऐसा योद्धा जिसने अपनी मर्जी से ही हर स्थिति का निर्माण किया। रावण के मन में इन्द्र का सिंहासन जीतने की मंशा नहीं रही। न ही देवताओं की संपत्ति और वैभव में उन्हें कोई लोभ नजर आता था, जो शासक अपने पूरे साम्राज्य को ही सोने का बना सकता था, उसके सामने देवताओं का ऐश्वर्य भी तुच्छ था। रावण से बलशाली अगर कोई था, तो भगवान शिव थे। शिव के कुलिन वंश का ही हिस्सा लंका था।

रावण महाज्ञानी था, जो उसे अहंकार की ओर ले गया। रावण बलशाली था, जिस कारण उसमें क्रोध का भाव आ जाता था। रावण के पास सत्ता और वैभव था, जिस कारण उसके क्रोध और अहंकार की सीमा नहीं थी। तुलसीदास जी के भगवान राम के विपरीत शैलेन्द्र तिवारी के रावण की कल्पना नए विचारों को जन्म देती है। क्या यह सचमुच संभव था कि जीवन और प्रकृति तक को अपने हिसाब से स्वीकार करने वाले महायोद्धा ने भगवान राम से जान-मुझकर पराजय स्वीकार की। हम सभी अपने जीवन में सोच-समझकर फैसले लेते है, लेकिन वे फैसले वक्त के साथ सही और गलत साबित होते है। रावण ने भी अपने जीवन में जो फैसले लिए होंगे, वो सब सही समझकर ही लिए होंगे, यह तो वक्त है, जिसने उन्हें गलत साबित किया।

पुस्तक में अनेक रामायणकालीन प्रसंग है। अयोध्या में रावण का प्रसंग उनमें से एक है, जब रावण ने उत्तर दिशा की ओर अजेय पताका लेकर यात्रा शुरू की थी और एक के बाद एक राज्य जीतता चला गया। अयोध्या पर कभी रावण जीत चुका था। जब अयोध्या के राजा अनरण्य थे। जब रावण की सेना ने अनरण्य का वध किया था, तभी रावण को उनके बहते हुए लहू में अपना भविष्य नजर आ गया था।

एक प्रसंग में सूर्पणखा और भगवान राम तथा लक्ष्मण के बीच दिलचस्प संवाद है, जिसमें लक्ष्मण अपने आप को भगवान राम का दास कहते हैं, लेकिन सूर्पणखा के इस आग्रह पर कि भगवान राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण को आदेश दे कि वे सूर्पणखा को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लें। जब सूर्पणखा भगवान राम से कहती है कि हमारे (लक्ष्मण और सूर्पणखा) के विवाह को स्वीकार करें। तब राम कहते हैं कि देवी लखन मेरा भाई है, मेरा दास नहीं। राम तो खुद अपने भक्तों के दास हैं और मैं खुद इस जंगल में दासों जैसा जीवन जी रहा हूं। मैं लक्ष्मण को तुमसे विवाह करने की आज्ञा कैसे दे सकता हूं, वह अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। दोनों भाइयों के बीच सूर्पणखा विनोद का पात्रभर बनकर रह गई थी। स्त्री की धैर्य शक्ति पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है और फिर सूर्पणखा तो लंका की राजकुमारी थी, जिसका भाई रावण जैसा बलशाली योद्धा था। दोनों भाइयों के बीच विवाद का पात्र बनने पर क्रोधवश सूर्पणखा ने सीता पर हमला बोला। जिससे लक्ष्मण अचंभित हो गए। जो स्त्री थोड़ी देर पहले तक प्रणय निवेदन करते हुए प्रेम मूर्ति बनी हुई थी, वह एक ही पल में ऐसी आक्रामक कैसे हो सकती है। लक्ष्मण इतने क्रूद्ध थे कि उन्होंने सूर्पणखा को बालों से पकड़कर बंदी बना लिया और उसकी हत्या करना चाह रहे थे। आखिर कोई उनकी माता जैसी भाभी पर उनके सामने आक्रमण कैसे कर सकता था? उसी क्षण माता-सीता ने लक्ष्मण को रोका और कहा कि क्या तुम एक ऐसी स्त्री का वध करना चाह रहे हो, जो कुछ पल पहले तक प्रणय निवेदन कर रही थी। जब लक्ष्मण ने अपनी सफाई दी और कहा कि ऐसी आक्रामक स्त्री को सजा तो मिलनी ही चाहिए, तब सीता माता ने कहा कि एक स्त्री का सौंदर्य ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होता है। सूर्पणखा तो उसी सौंदर्य के बल पर प्रणय निवेदन कर रही थी। इसलिए सूर्पणखा का वध करने से बेहतर है, उसके सौंदर्य पर वार करना।

सूर्पणखा के अंग विच्छेदन ही आगे जाकर सीता के अपहरण का कारण बने, जिसकी परिणति भीषण युद्ध से हुई। पुस्तक में रावण को एक महान योद्धा और महाज्ञानी के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि भगवान राम एक वीर योद्धा और क्षत्रीय राजकुमार थे। रावण में वह शक्ति थी कि बालू की रेत के भी शिवलिंग बना सकते थे। अर्थात बालू के कण-कण उनकी मंशा के अनुसार कार्य करते थे, जबकि भगवान राम के साथ ऐसा नहीं था। रावण ने ही भगवान शिव को प्रकट होने के लिए बाध्य किया था और भगवान शिव के समक्ष ही संकल्प कराया था कि युद्ध में राम ही विजय हो। ब्राह्मण के रूप में रावण ने पूजन विधि के पश्चात भगवान राम से अपेक्षा की थी कि वे दक्षिणा के रूप में मेरी (रावण) मृत्यु के समय समीप उपस्थित हो।

रामायण की कहानियां बचपन से सुनते आए लोगों को बताती है कि रावण एक ऐसा योद्धा था, जिसके सामने बलशाली से बलशाली देवता भी टिक नहीं पाते थे। रावण जानता था कि भगवान राम में कितनी शक्ति है और उनकी वानर सेना क्या-क्या कर सकती है। अपने दरबारियों को भ्रम को उन्होंने कभी नहीं तोड़ा। रावण में इतनी शक्ति थी कि हनुमान द्वारा तहस-नहस की गई लंका को एक सप्ताह में ही वापस व्यवस्थित कर दिया था।

युद्ध भूमि के अध्याय से शुरू हुई यह किताब युद्ध भूमि पर ही जाकर खत्म होती है, लेकिन तभी यह पढ़ने को मिलता है कि मित्रो, यह कहानी का अंत नहीं है। यहां से एक न कहानी शुरू होती है... वह कहानी, जो एक नई किताब की शक्ल में जल्दी ही आपके हाथों में होगी। पूरी किताब पढ़ने के बाद लगता है कि करीब सवा तीन सौ पेज की यह किताब तो रावण को अपराजित योद्धा साबित करने की भूमिका भर है। मूल पुस्तक अभी बाकी है।

Search

मेरा ब्लॉग

blogerright

मेरी किताबें

  Cover

 buy-now-button-2

buy-now-button-1

 

मेरी पुरानी वेबसाईट

मेरा पता

Prakash Hindustani

FH-159, Scheme No. 54

Vijay Nagar, Indore 452 010 (M.P.) India

Mobile : + 91 9893051400

E:mail : prakashhindustani@gmail.com