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Abay-Chajlani

मैं, शाहिद मि़र्जा और अमितप्रकाश सिंह नईदुनिया के पहली खेप के ट्रेनी जर्नलिस्ट थे। बाबा यानी राहुल बारपुते नईदुनिया के प्रधान सम्पादक हुआ करते थे, रज्जू बाबू यानी राजेन्द्र माथुर सम्पादक थे। अभय छजलानी का नाम नईदुनिया में रोज नहीं छपता था। कायदे के अनुसार वे किसी पद पर नहीं थे, लेकिन काम सभी पदों का करते थे।

वे नईदुनिया के चीफ प्रूफ रीडर भी थे, चीफ फोटो एडिटर भी, चीफ रिपोर्टर भी और चीफ लेआउट आर्टिस्ट भी। इसके अलावा अखबार के प्रॉड्क्शन, डिस्पैच और डिस्ट्रीब्यूशन के शिखर पुरुष भी वे ही थे। वे तब नईदुनिया के परिसर में ही रहते थे, गोया वे २४ घंटों के मुलाजिम तो थे ही; रात-बिरात कभी संकट होता तो अभयजी को ही हम संकटमोचक मानते और तमाम समस्याओें का हल भी वे ही करते थे।

अभयजी का एक आग्रह हमारे गले की घंटी बना रहता था। वह यह कि खबरों की १०० प्रतिशत पुष्टि का आग्रह। खबरों के सभी तथ्य, आंकड़े, नाम आदि की पुष्टि और पुन:-पुन: पुष्टि के बाद ही वे खबरों को ओके करते थे। उनका यह आग्रह सभी पत्रकारों से आज भी रहता है कि जो सच नहीं, वह खबर नही! वह अफवाह या अनुमान है और उसके लिए हमारे पास कोई जगह नहीं है।

आज विरले ही ऐसे सम्पादक होंगे जो खबरों की सच्चाई के प्रति इतना आग्रह रखते होंगे।

भाषा की दृष्टि से किसी भी व्यक्ति के नाम से पहले ‘श्री’ और बाद में ‘जी’ दोनों ही लिखना भले ही गलत हो, ‘श्री अभय जी’ के लिए यह गलत नहीं था। वे अक्सर अपने से वरिष्ठों के आगे श्री और पीछे जी लगाना नहीं भूलते थे। वे कहते थे कि मेरे मन में भावनाओं इतनी मजबूत है कि वे व्याकरण के नियम भी झुठलाने लगती है। शिष्टता और सहजता का यह गुण उनके लेखन में तो है ही, उनके व्यवहार में भी है। यहां तक कि अपने बेटे को भी नाम के बाद वे जी लगाकर ही सम्बोधित करते हैं। उनके मुंह से किसी के लिए तू शब्द शायद ही कभी निकला हो। एक घटना है। मैं नईदुनिया में डाक एडिशन में डेस्क पर कार्यरत था, अभयजी ने मुझे बुलाया और कहा कि मैं आपको एक बहुत महत्वपूर्ण आदमी से मिलाने के लिए लेकर चल रहा हूं। उन्होंने मुझे अपने बजाज वेस्पा स्वूâटर पर पीछे की सीट पर बैठने को कहा और स्वूâटर स्टार्ट करके रेसीडेंसी कोठी लेकर गए। वहां जाकर पता चला कि वे मेरा परिचय जिन सज्जन से करा रहे हैं, वे मध्यप्रदेश के चीफ सेव्रेâटरी हैं। वहां उन्होंने मेरा परिचय कराया ‘‘मीट माय कुलीग प्रकाश हिन्दुस्तानी’’।

चीफ सेव्रेâटरी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति से मेरे जैसे नौसिखिया पत्रकार का परिचय सहकर्मी के रूप में कराना उनका शुद्ध बड़प्पन ही था, वर्ना स्टाफ, रिपोर्टर, असिस्टेंट जैसे शब्द भी तो हैं!

शाहिद मि़र्जा और मैं सुदामा नगर में एक रूम किराए पर लेकर रहते थे। बारिश के दिनों में हमारे कमरे में पानी भरने लगा, हम घबराए और अभयजी को अपनी समस्याएं बतलाई। अभयजी ने हमें नईदुनिया परिसर में ही पहली मंजिल पर लाइब्रेरी के सामने गेस्ट रूम दे दिया। हम दोनों वहीं हफ्तों रहे। रोज सुबह अभयजी के घर चाय और नाश्ते के लिए जाते। अभिभावक के रूप में उन्होंने और उनकी धर्मपत्नी पुष्पा छजलानी ने हमारी लगभग हर जरूरत का ध्यान रखा।

दो दशकों बाद अभयजी के निर्देश पर मैंने वेब दुनिया में वंâटेंट एडिटर के रूप में काम शुरू किया। वेब दुनिया के सर्च इंजन की लांच पार्टी मुंबई की मशहूर ताज होटल में रखी गई थी। प्रेस कांप्रेंâस भी वहीं थी। हम सुबह की फ्लाइट से मुंबई गए और कार्यक्रम के बाद फ्लाइट से ही वापस लौटे। वहां जाते या आते वक्त अभयजी कभी भी हमसे पहले गाड़ी में नहीं बैठे। जब हम गाड़ी में बैठ जाते, तभी वे अपनी गाड़ी की ओर रवाना होते। इतने सौजन्य की हम कभी भी किसी से अपेक्षा नहीं कर सकते।

हममें से कभी भी कोई बिल लेकर अभयजी के पास जाता तो उनकी खूबी होती कि वे बिल राशि देखे बिना उस पर दस्तखत करते। रिपोर्टिंग के दौरान जो बिल कभी भी बनाए, उनमें से एक पैसा भी कभी भी नहीं काटा गया। वे मानते थे कि उनका सहकर्मी कभी भी गलत बिल बना ही नहीं सकता। हम उनकी तुलना में बहुत ही जूनियर थे, कभी-कभी बहस भी कर लेते, वाद-विवाद भी होता। लोग कहते कि हम उनके मुंंहलगे हैं, वे दिल पर नहीं लेते। नईदुनिया में रहते हुए हम थॉमसन इंस्टीट्यूट और इलना, आईएनएस और प्रेस कॉउंसिल के बारे में कम ही समझ पाए थे, लेकिन इतना पता था कि यह बड़ी संस्थाएं हैं और अभयजी वास्तव में कितने बड़े व्यक्ति है, यह बात मुझे नईदुनिया छोड़ने के बाद मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में काम करते समय पता चली।

हमें बाद में पता चला कि हम उन्हें ‘अभयजी’ कहकर सम्बोधित करते थे, वह गलत था। वास्तव में वे हमारे बॉस थे, सर थे, लेकिन ओरों के साथ वे हमारे लिए भी अभयजी ही रहे। आज भी सभी उन्हें अभयजी कहते हैं, लेकिन हम अभी इस लायक नहीं हुए हैं। उन्हें अभयजी कहकर अपना कद बढ़ाना चाहते थे।बस।

‘जब स्वयं एक पात्र बनकर सोचता हूं...’
अभय छजलानी

मुझे पिछले ५५ वर्षों में कभी ऐसा नहीं लगा कि भारत अपने नागरिकों में समान रूप से विद्यमान है। प्राकृतिक प्रकोप या युद्ध के दिन ही मात्र इसका अपवाद रहे। ऐसा अहसास होना चाहिए, यह संविधान में अवश्य लिखा है, लेकिन किताबी सच में और जीवन के सच में बड़ा अंतर होता है। यह भी सच है कि सच केवल महसूस करने की बात है। प्रमाणित करने या चुनौती देने का नहीं। इसलिए जब मैं देखता हूं कि आजाद भारत में सच को चुनौती देना और उसे प्रमाणित करना दैनंदिनी जीवन में शामिल हो रहा है तो खुद में देश को देखने की भावना और कठिन मालूम होने लगता है। सच कहूं तो देशभक्ति की यह तलाश टीस पैदा करती है, जिसे होना चाहिए। उसे तलाश करने की जरूरत क्यों पड़ना चाहिए? यह प्रश्न मुझे पिछले ६६० महीनों में एक बार भी छोड़कर नहीं गया। एक आदमी होने के नाते मुझे यह भी लगा कि ऐसे आम प्रश्नों पर ही आजादी को तौलना इसलिए ठीक है कि जहां वह पहुंची नहीं है वहीं उसकी तलाश होना चाहिए। अखबार पढ़ते-पढ़ते या टेलीविजन पर समाचार व्याख्या सुनते-सुनते मुझे यह भी लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र दरवाजे के बार देर से खड़ा हो और मैंने मन के दरवाजे ही न खोले हों। ऐसा सच निकलता तो शायद मुझे ज्यादा प्रसन्नता होती। तब मैं भी प्रशासन को भी अपने में से एख मानकर उसकी प्रशंसा कर करता कि अपनों का भला करने की कोई भी सीमा तय की जा सकती है? प्रशासन को देखो जन्म से मृत्यु तक, जीवन के हरेक कर्म की फिक्र करते-करते उसकी क्या दशा हो रही है। कहीं उसे अस्पताल को ठीक करना पड़ता है, कहीं उसे उच्च शिक्षा का संचालन करना होता है, कहीं विवाह का रक्षक बनकर खड़ा हो जाता है तो कहीं वह सड़क बनाने वाले मजदूरों के वंâधे से वंâधा लगा लेता है। वह क्या नहीं करता है? लेकिन बीते ५५ सालों में मेरी इस आरजू को भी पूरा होने का अवसर नहीं मिला है, क्योंकि प्रशासन ने सत्ता को निर्माणकारी बनाने के बजाय स्व-कल्याणकारी बनाने का अपना लक्ष्य रखा है।

कभी सोचता हूं कि कहीं मैं सचमुच ही निराशावादी तो नहीं हो गया, जो कश्मीर में कुछ हत्याओं से विचलित होकर लोकतंत्र के मर जाने का भ्रम पाल लेता हूं? जब मंचों से आशावादी होने की पुकार लगती है और वही रेडियो, टेलीविजन तथा चौराहों से झरने लगती है तो मुझे भी लगता है कि मैं भी देश की भावना के साथ ही हूं। पर दूसरे ही पल वाकई सबके साथ मैं भी कर्म के आकलन पर निराशा की ऐसी घाटी में गिरता महसूस करता हूं। जहां से कम ही लोग लौटकर आते हैं, लेकिन संस्कार, बुद्धि, पुराने देखे हुए दिन महापुरुषों के वचन और मेरी आत्मा निराशा के इस सोच को तुरंत ठुकरा देते हैं। शायद इसी स्थिति से निपटने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था के जनक ने बहुमत के सिद्धांत का प्रावधान कर दिया ताकि इक्का-दुक्का आत्मा की आवाजों को दबाकर भी शासन पद्धति के जीवन की रक्षा की जा सके। मेरी उलझन निरंतर बढ़ती जा रही है। इसलिए भी कि मेरे देश का प्रजातंत्र जिसे हम बहुमत वाला प्रजातंत्र कहते हैं, वास्तव में आबादी का बीस से तीस प्रतिशत समर्थन पाकर ही सत्ता पर चढ़ बैठता है और फिर बहुमत का प्रतिनिधि बनकर मनमानी को नियम सम्मत कर देता है। उलझन है इसे मैं बहुमत वाला प्रजातंत्र कहूं या बहुमत तानाशाही कहूं।

आत्मा की आवाज को पुकारना नहीं होता है। उसे समन या वारंट भेजकर बुलवाने के लिए सत्ता-शक्ति की जरूरत भी नहीं होती है। यह तो बिना याचिका के भी सुनवाई कर ‘विवेक’ को उचित-अनुचित का निर्णय करने के लिए भेज देती है। तो क्या आज जो आत्मा की आवाजें सुनाई दे रही हैं। वे भी उपभोक्तावाद की पैदावार है? यदि ऐसा हुआ तो मेरी उलझन को कौन सुलझाएगा? व्यवस्था से निराश मेरे जैसा आदमी यदि ‘विवेक’ की शरण भी न पा सका तो क्या केवल लोकतंत्र की पुस्तक को सीने से लगाकर जीवन काट सवूंâगा? उस पुस्तक में मेरी उलझन का समाधान लिखा है, लेकिन व्यवस्था मुझे पढ़ने क्यों नहीं दे रही है? उस पर विश्वास क्यों नहीं करने दे रही है? बिना पढ़े पुस्तक भी मदद वैâसे कर सकती है?

५५ सालों में हर दिन, हर रात- सच कहूं, हरेक पल टूटी सड़कों पर चलते-चलते इसी सोच में बीता कि यदि लोकतंत्र है तो मुझे पेयजल लेने के लिए कतार में क्यों लगना पड़ता है? दवा पाने के लिए यातना क्यों करनी पड़ती है? शिक्षा को दुकानों से क्यों खरीदना पड़ता है? लोकतंत्र है तो बिजली का वितरण लोकतांत्रिक क्यों नहीं है? आजादी मुझे क्यों नहीं मिली, इसके लिए मुझे राजनीति में प्रदेश की अनिवार्यता क्यों बताई जाती है? इन सवालों से घिरा मेरा मस्तिष्क जीवन की कड़वी सच्चाइयों से भी नाता तुड़वा देता है। मुझे इन सवालों के बीच पता ही नहीं चलता कि बिजली कब आकर चली गई। कब कर वसूलक आकर मोटी राशि वसूल ले गए और कह गए कि चुनाव के बाद सब ठीक हो जाएगा। मैं सुन नहीं पाया, मेरा ध्यान तो लोकतंत्र के दर्शन को समझने में उलझता रहा है। ५५ साल गुजर गए, पता ही नहीं चला कि लोकतंत्र के कदम समय से कितने पिछड़ चुके हैं। अब भी जब अवसर मिलता है, तो पुस्तक उठाकर उसमें लोकतंत्र के लाभों की सूची पढ़ता हूं और सोचने लगता हूं कि कहीं पुस्तक में असत्य तो नहीं लिखा है। उसमें तो कहीं नहीं लिखा है कि जनसेवा करो और बदले में धन लो। उस सूची मुझे कहीं लिखा नहीं मिला कि जनसेवा करना है तो अपनी सरकार बनाना जरूरी है। यह उल्लेख भी पुस्तक में कहीं नहीं मिलता है कि जनसेवा के अर्थो में दलबदल, पदों का बटवारा, पेट्रोलपंप का आवंटन अपनो को, सरकारी सुविधाएं जिन पर अपना पूरा अधिकार हो, भी शामिल है। मैं समझ नहीं पाया हूं कि असली लोकतंत्र वह है, जिसके लिए आम रास्तों को रोककर उसे गुजरने की जगह दी जाती है, जो लाला पीली और अब हरी बत्ती लगे लोकतंत्र को गुजरते देखने के लिए मजबूर की जाती है। (१५ अगस्त २००२ नई दुनिया) 

स्वतंत्र विचार के पुरोधा अब्बूजी : रामशरण जोशी

‘‘अभयजी, इंदिराजी के तीसरे पुत्र कमलनाथ से आज यहां मध्यप्रदेश भवन में मे झड़प हो गई है। क्या किया जाए’’

‘‘कुछ चिंता करने की आवश्यकता नही है। अगर हम डरते रहे तो अखबार नहीं निकाल सकते। आप निश्चित होकर अपना काम करते रहिए, बाकी मुझ पर छोड़ दीजिए।’’

यह किस्सा जनवरी १९८० का है, जब इंदिरा गांधी की सत्ता में धमाकेदार पुनर्वापसी हुई थी। इस उपलक्ष्य में दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन में मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेता व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अर्जुनसिंह ने इंदिरा गांधी के स्वागत में रात्रि-भोज का आयोजन किया था। प्रदेश के तकरीबन सभी नव-निर्वाचित सांसद मौजूद थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, संजय गांधी तथा उनके परिवार के लोग भी शामिल थे। ‘नईदुनिया’ में प्रकाशित छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र की किसी चुनाव खबर को लेकर कमलनाथजी उखड़े हुए थे। उन दिनों उन्हें इंदिराजी का ‘तीसरा पुत्र’ माना जाता था। जैसे ही मेरा परिचय उनसे कराया गया कि मैं दिल्ली में ‘नईदुनिया’ का प्रतिनिधि हूं, यह सुनते ही उनके तेवर बदल गए। उनकी त्यौरियां चढ़ गई और अनाप-शनाप बोलने लगे। सभी लोग हक्का-बक्का रह गए। मैंने उनके इस व्यवहार का प्रतिवाद किया। पास खड़े पत्रकारों व अन्य सांसदों ने मुझे शांत रहने की नसीहत दी और कहा कि अभी कमलनाथजी ‘तूफान’ हैं। इसे गुजर जाने दो। किसी ने कहा कि अब आपकी नौकरी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि ‘नईदुनिया’ और कांग्रेस का करीबी संबंध है और वैसे भी आप ‘चरम वामपंथी’ पृष्ठभूमि के हैं तब इस अखबार में लंबे समय तक आपको मालिकान रहने नहीं देंगे। नि:संदेह मैं चिंतित हुआ और घर लौटकर अभयजी को फोन पर घटना का ब्योरा सुना दिया और उन्होंने मेरी आशंकाओं को तुरंत ही नकार दिया।

अब इस अनुभव की पृष्ठभूमि में इस चरित्र को समझा जाए, श्री अभयजी छजलानी उर्पâ अब्बूजी। मैंने इस त्रि-आयामी शख्सियत के साथ अपनी दो दशक की पत्रकारीय पारी (१९८०-१९९९) खूब खेली, जमकर खेली। मेरे लिए यह शख्सियत एक साथ पूंजीपति व ‘नईदुनिया’ के मालिक, ‘नईदुनिया’ के सम्पादक और बड़े भाई व वरिष्ठ मित्र रही है। मैं बीस वर्षों में यह भी तय नहीं कर पाया कि हम दोनों की संबंध यात्रा में अब्बूजी कब, कौनसी भूमिका निभाते रहे? कब उनकी भूमिका बदलती रही और कौन-सी भूमिका का कहां आरंभ या अंत होता रहा?

अभयजी से मेरी पहली मुलाकात १९७९ के मध्य ‘नईदुनिया’ के दफ्तर में हुई थी। उन दिनों मैं ग्रामीण क्षेत्रों मेंं बंधक श्रमिक प्रथा पर शोध तथा खेतिहर के लिए ‘चेतना निर्माण’ शिविरों के आयोजन से जुड़ा हुआ था। रतलाम जाते समय कुछ समय के लिए इंदौर रुका था। मैं पत्रकारिता में लौटना चाहता था। दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश के सूचना निदेशक स्व. श्याम व्यास ने संकेत दिया था कि ‘नईदुनिया’ दिल्ली में अपना एक पूर्णकालिक प्रतिनिधि नियुक्त करना चाहता है। इसी प्रयोजन को लेकर मैंने अभयजी से चलताऊ मुलाकात की थी। इसके पश्चात दिसंबर आते-आते ‘नईदुनिया’ ले जुड़ गया और मुझे पहला दायित्व लोकसभा चुनाव कवरेज का दिया गया। इस इसके पश्चात जनवरी १९८० में इस पत्र के साथ मेरी विधिवत औपचारिकता यात्रा की शुरुआत हो गई।

मुझे याद है, जब इंदिराजी की पुनर्वापसी के साथ प्रथम बजट-सत्र हुआ था। तब अभयजी दो-तीन दिन के लिए दिल्ली आए हुए थे। हम दोनों एक साथ संसद भवन गए। संसद के गलियारों में मध्यप्रदेश के कतिपय नव-निर्वाचित युवा सांसद अभयजी से टकरा गए। मैं उनके साथ ही खड़ा हुआ था। उन सांसदों ने अभयजी को अलग एक कोने में ले जाकर कुछ देर बातें की। सांसद सदन में लौट गए और हम दोनों पुस्तकालय की ओर बढ़ गए। मुझे न जाने क्यों शंका हुआ और मैंने अभयजी से पूछ ही लिया कि, ‘‘क्या वे सांसद कोई खास खबर दे रहे थे?’’ उन्होंने कहा, ‘‘नहीं, बस कुछ बातें कर रहे थे।’’ फिर भी मुझसे रहा नहीं गया और मैंने अभयजी से पूछा ही लिया कि आखिर वे किस प्रकार की बातें कर रहे थे? अभयजी बताना नहीं चाहते थे, लेकिन उन्होंने मेरे बार-बार आग्रह पर केवल इतना ही कहा ‘वे आपको यहां से हटाना चाहते हैं।’

‘क्या उनके मुझसे कोई प्रोपेâशनल शिकायत है?’

‘बिल्कुल नहीं।’

‘तब वे मुझसे क्या चाहते हैं?’

‘वे कुछ नहीं चाहते। उनकी शिकायत यह है कि आप नक्सलवादी पृष्ठभूमि के रहे हैं। आपातकाल में आपके खिलाफ वारंट था। ऐसे व्यक्ति को इतनी महत्वपूर्ण जगह पर नहीं रखा जाना चाहिए।’

‘तब आपका क्या उत्तर था?’ मैंने भयभीत उत्सुकता से पूछा।

‘मैंने उनसे केवल यही पूछा कि जोशीजी की रिपोर्टिंग वैâसी है? क्या उसको वे अपनी विचारधारा के अनुसार ट्विस्ट तो नहीं कर रहे हैं? उन लोगों का उत्तर था-‘जोशीजी की रिपोा\टग बिल्कुल सही है। वे उसे डिस्टोर्ट नहीं करते हैं।’ यह सुनकर मैंने उनके केवल यही कहा कि जब उनकी रिपोर्टिंग में कोई गलती दिखाई दे तब मुझे बतलाइएगा।’

अभयजी यह कहकर मुस्कुरा दिए। मुझसे बोले- ‘अगर हम किसी के कहने पर अपने लोगों को हटाते व बदलते रहे तो हमें अखबार निकालने की जरूरत क्या है? आपके अपने विचार हैं। बस हमारी अपेक्षा यही रहती है कि तटस्थ भाव से पत्रकारिता की जाए।’

मुझे करीब दो वर्ष तक पुलिस ने ‘सिक्योरिटी क्लियरेंस’ नहीं दिया था, इसलिए पीआईबी की मान्यता की समस्या बनी रही। अभयजी और स्व. नरेन्द्र तिवारीजी को जब यह बात बतलाई गई तो दोनों ने मुझसे केवल यही कहा था’’ आप कोई अपराधी तो हैं नहीं। आप क्रांति करने के लिए निकले थे, नही हुई। ठीक है, वे न दे मान्यता। हमें डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। समय पर सब ठीक हो जाएगा। और वाकई ऐसा ही हुआ। बगैर किसी समझौते के सिक्योरिटी क्लियरेंस’ हुई और ‘एक्रीडिटेशन’ जारी किया गया।

इस दो दशक में मैंने दो दपेâ ‘नईदुनिया’ छोड़ी और वापस भी आया। अब्बूजी हर बार यही कहा करते थे कि जोशीजी मूलत: एक भावुक प्राणी हैं। वे भावावेश में निर्णय लेते हैं, इसलिए उनके इरादों पर शंका नहीं करनी चाहिए। वास्तव में हम दोनों के बीच बहुत कुछ खुलकर विचारों का आदान-प्रदान हुआ करता था। जब भी वे दिल्ली आते, हम दोनों मीलों पैदल राजधानी की सड़कों को नापा करते थे। मैं उन्हें उन स्थानों पर ले जाया करता था जहां आंदोलन के दौरान मैं और मेरे अन्य साथी अंडर ग्राउंड मीटिंगें किया करते थे। हम लोगों के बीच सांप्रदायिकता, फासीवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद पर जमकर चर्चाएं हुआ करती थी। मुझे याद है कि जब देश में अयोध्या आंदोलन का प्रचंड ज्वार डबडबा आई थी। उन्होंने भरे मन से कहा था- ‘ईश्वर करे जोशीजी इस देश में कभी कोई हिटलर पैदा न हो।’

‘नईदुनिया’ के आधुनिकीकरण को लेकर भी हम दोनों के बीच वैचारिक बहसें हुआ करती थी। मैं उन्हें अपने पत्रों में लिखा करता था कि आप लोग बिल्कुल पिछड़े व महाजनी पूंजीपति की दस्तवेंâ सुनाई पढ़ रही है। ‘नईदुनिया’ को कब बदलेंगे। उनका जवाब हुआ करता था ‘जोशीजी, धैर्य रखिए। समय आने पर सबकुछ होगा। लेकिन याद रखिए हर परिवर्तन की कीमत होती है।’ ‘नईदुनिया’ कुछ मूल्यों पर टिका हुआ है। यह परिवर्तन की कितनी व वैâसी कीमत चुका पाएगा, यह अभी कहना मुश्किल है। कुछ काम भविष्य पर छोड़ दिया जाए तो ठीक है।’

और अंत में,

अब्बूजी पर बुहत कुछ लिखा जा सकता है। मैं अपनी आत्मकथा में ‘नईदुनिया’ के अनुभव लिखूंगा भी। उनसे लिए गए एक लंबे साक्षात्कार में उनके जीवन के कई पहलुओं को स्पष्ट कर चुका हूं। फिलहाल फिलहाल में अपनी स्मृति के आधार पर इतना ही कह सकता हूं कि बीस वर्षों में बमुश्किल मेरी तीन-चार रिपोर्टिंग ही नहीं छपी अन्यथा मुझे अब्बूजी सान्निध्य में ‘नईदुनिया’ में अभूतपूर्व स्वतंत्रता मिली। यह कहना और भी ठीक रहेगा कि मेरे जीवन के संक्रांति काल में इस शख्सियत की त्रिआयामी भूमिका ने मेरी वैचारिक प्रतिबद्धता को कभी आंच नहीं दी। इस अवसर पर मुझे यह स्वीकार करने में कतई दिक्कत नहीं है कि विचारधात्मक संकीर्णतावाद से मुक्ति दिलाने में जिन तीन-चार व्यक्तियों (डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा, अर्जुुनसिंह और राजेन्द्र माथुर) ने मेरे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उनमें से एक अब्बूजी भी हैं। इससे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए क्या कर सकती है।

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