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गत वर्ष 23 जून 2016 को ब्रिटेन में ब्रेक्सिट के लिए मतदान हुआ था। इसमें 51 प्रतिशत से अधिक लोगों ने यूरोपीय यूनियन से बाहर हो जाने के पक्ष में वोट दिए थे। अब करीब डेढ़ साल बाद यह राज खुला है कि रूस ने ब्रेक्सिट के लिए जनमत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई और सोशल मीडिया साइट ट्विटर का जमकर उपयोग किया। ब्रेक्सिट के पक्ष में ट्विटर पर लाखों संदेश जारी किए गए थे, जिनमें यूरोपीय यूनियन में ब्रिटेन के शामिल रहने के नुकसान के बारे में बताया गया था। रूस चाहता था कि ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से बाहर निकले, ताकि ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन दोनों कमजोर पड़े और उसका प्रभाव बढ़ जाए।

ब्रेक्सिट के मतदान से पहले रूस से सैकड़ों ट्विटर अकाउंट से लगातार ट्रोल किए गए। पाकिस्तान मूल के लंदन निवासी मेयर सादिक खान को भी निशाना बनाया गया और इन तमाम ट्वीट में मुस्लिम विरोधी बातें कही गई। ब्रिटेन और यूरोप के देशों में बढ़ रहे आतंकी हमलों को मुस्लिमों से जोड़कर प्रचारित किया गया। ब्रेक्सिट और यूरोपीय राजनीति से जुड़े हैशटैग का बार-बार उपयोग किया गया।

अब जाकर यह बात सामने आई है, क्योंकि ब्रिटेन की संसद में ब्रेक्सिट के मतदान के पहले रूस के प्रचार युद्ध की जांच का आदेश दिया था। जांच में यह बात भी सामने आई कि फर्जी ट्वीट के जरिये प्रचार करने वालों ने पहले अमेरिकी मुद्दे उठाए और फिर धीरे से ब्रिटेन की तरफ रूख कर लिया। रूस की तरफ से प्रचार करने वाले ये अकाउंट अमेरिका और ब्रिटेन के भीतर से भी संचालित किए गए।

ट्वीट के जरिये दुष्प्रचार करने वालों ने वेस्टमिंस्टर में हुए आतंकी हमले के बाद बुर्का पहने हुए एक महिला की तस्वीरें वायरल की। वह महिला खुद आतंकी हमले से डरी-सहमी भाग रही थी, लेकिन उसे इस तरह प्रचारित किया गया, मानो आतंकी हमले में वह महिला भी शामिल हो। ट्विटर पर लगातार किए जा रहे इन संदेशों में यही बात बार-बार दोहराई गई कि यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के बाद ब्रिटेन में आतंकी हमलों पर लगाम लगेगी और गैरकानूनी रूप से रह रहे मुस्लिमों को बेदखल कर दिया जाएगा। इस तरह की बातें भी प्रचारित की गई कि यूरोपीय यूनियन से जुड़े रहना ब्रिटेन के लिए अच्छा नहीं है, क्योंकि उसे इसकी भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है।

ट्विटर के इस प्रचार अभियान में बहुसांस्कृतिक विरासत को जेल की तरह बताया गया। ब्रेक्सिट में हुए मतदान के बाद जब उसके नतीजे आए, तब उसकी सराहना में लगातार ट्वीट किए गए। इस तरह की बातें फैलाई गई कि ब्रिटेन अब सही मायने में स्वतंत्र हुआ है, क्योंकि उसके गले से यूरोपीय यूनियन का भार हट गया है। इन सभी ट्वीट में मुस्लिमों के खिलाफ प्रचार किया गया था। जुलाई 2016 में हुए म्युनिख आतंकी हमले को भी मुस्लिम आतंकवाद से जोड़ा गया। इस तरह की चेतावनियां भी दी गई कि अगर अवैध रूप से आ रहे मुस्लिम शरणार्थियों को नहीं रोका गया, तो ब्रिटेन भी इराक बन जाएगा। इन संदेशों में बार-बार कहा गया कि शरणार्थियों के लिए हमारे देश में कोई जगह नहीं है।

Brexit

दुनिया में कही भी कोई आतंकी कार्रवाई हो, ये रूसी ट्रोलर मुस्लिम देशों को कोसने लगते हैं। पूरी दुनिया में हो रही आतंकी गतिविधियों को वे सीधे-सीधे इस्लाम से जोड़ते हैं। जांच में यह बात भी सामने आई कि ब्रेक्सिट के बारे में लगातार एक ही संदेश बड़ी संख्या में अलग-अलग अकाउंट से पोस्ट किए गए। रूस के द्वारा किया गया यह प्रचार ब्रिटेन के लोगों में दक्षिणपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए था।

ब्रिटेन की संसद द्वारा कराई जा रही ही इस जांच की प्रक्रिया अभी जारी है। इसकी सुनवाई 2018 के प्रारंभ के कुछ महीनों तक चलेगी। जांच में ट्विटर के 13 हजार बोट्स के बारे में भी पता चला है। बोट्स वास्तव में एक ऐसा प्रोग्राम है, जो किसी खास हैशटैग के इस्तेमाल होते ही अपने आप नए-नए मैसेज क्रिएट करने लगता है और उन्हें बड़ी संख्या में वायरल करने लगता है। इसके अलावा एक हजार से अधिक ऐसे वीडियो भी सामने आए है, जिनका लक्ष्य ब्रिटेन से यूरोपीय यूनियन को बाहर करने का था। ये सभी वीडियो भी लगातार वायरल किए जाते रहे है। यह माना जाता है कि ब्रिटेन के नागरिकों ने जिस मामूली से अंतर से यूरोपीय यूनियन से बाहर होने के लिए मतदान किया था, वह सोशल मीडिया से बहुत ज्यादा प्रभावित था। दूसरे शब्दों में कह सकते है कि अगर सोशल मीडिया नहीं होता, तो शायद ब्रिटेन अब भी यूरोपीय यूनियन का हिस्सा होता।

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