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ट्विटर पर शुरू एक हैशटैग #मीटू को टाइम पत्रिका ने पर्सन ऑफ द ईयर 2017 घोषित किया है। टाइम पत्रिका ने इसके लिए ऑनलाइन वोटिंग भी करवाई थी। #मीटू के बाद टाइम पत्रिका ने 2017 के लिए प्रथम उपविजेता अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को और द्वितीय उपविजेता चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को घोषित किया। अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति के बाद तीसरे नंबर पर कॉलिन कैपरिक और रॉबर्ट मुनर रहे। तो क्या इसका अर्थ यह है कि मीटू हैशटैग अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति से भी ज्यादा पावरफुल है ?

टाइम पर्सन ऑफ द ईयर घोषित नहीं होने के कारण बाद में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था कि टाइम पत्रिका वालों ने फोन करके उनसे कहा था कि वे उन्हें पर्सन ऑफ द ईयर चुनने जा रहे है, ट्रम्प ने प्रस्ताव ठुकरा दिया था। हालांकि पत्रिका ने स्पष्ट किया कि हमारी ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं था, हमने केवल यही कहा था कि वे टाइम पत्रिका के पर्सन ऑफ द ईयर चुने जा सकते है। बाद में राष्ट्रपति ट्रम्प ने ट्वीट करके बताया कि टाइम पत्रिका वालों ने कहा था कि संभवत: मैं पर्सन ऑफ द ईयर चुना जाऊं, पर इसके लिए मुझे एक इंटरव्यू और लंबे फोटोशूट के लिए मंजूरी देनी होगी। मुझे यह मंजूर नहीं था। टाइम पत्रिका की तरफ से कहा गया कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं था, हम 1927 से पर्सन ऑफ द ईयर चुनते आ रहे है। इसके लिए पिछले कुछ वर्षों में हमने ऑनलाइन मतदान करवाना भी उसमें शामिल किया है।

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ट्विटर पर शुरू हुआ अभियान हैशटैग मीटू को मिला पर्सन ऑफ द ईयर सम्मान वास्तव में उन लोगों को मिला है, जिन्होंने इस अभियान को शुरू किया और उसे आंदोलन का रूप दिया। हैशटैग मीटू एक अभियान था, जो महिलाओं के साथ हुई यौन ज्यादतियों के खिलाफ शुरू किया गया था। इस अभियान में एक से बढ़कर एक महिलाओं ने अपने साथ हुई ज्यादती के बारे में खुलकर बताया था और लोगों से जागृत होने की बात कही थी। इसमें हॉलीवुड की कई मशहूर अभिनेत्रियों ने भी शोषण के राज उजागर किए थे, जिससे कई जाने-पहचाने लोग बेनकाब हुए। हॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्ले जुड ने भी जाने-माने निर्माता हॉर्वे विंसटाइन पर शोषण के आरोप लगाए थे। ऐश्ले जुड भी टाइम पत्रिका द्वारा पर्सन ऑफ द ईयर नामित लोगों में शामिल की गई थी।

टाइम पत्रिका ने महिलाओं के साथ हुई यौन प्रताड़ना, हिंसा और शोषण के दोषी लोगों के नाम उजागर करने वाले इस हैशटैग को अभियान बनाने में जुटे लोगों को नाम दिया - ‘द साइलेंस ब्रेकर्स’। ट्विटर से शुरू हुआ यह अभियान बाद में सोशल मीडिया के कई प्लेटफार्म पर जारी रहा, जिसमें भारत के भी अनेक लोग बेनकाब हुए।

अक्टूबर 2017 में शुरू हुआ मीटू हैशटैग दो महीने से भी कम समय में टाइम पत्रिका के लिए पर्सन ऑफ द ईयर बन गया। एलिसा मिलानो नामक अभिनेत्री ने हॉलीवुड के फिल्म निर्माता हॉर्वे विंसटाइन के खिलाफ सबसे पहले अपनी बात कही थी। वास्तव में मीटू हैशटैग का जन्म करीब 11 साल पहले मायस्पेस नामक सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर हो चुका था। तब यह एक जनजागृति अभियान था। उस अभियान का उद्देश्य रंग और लिंग के आधार पर भेदभाव के विरूद्ध लड़ना था, लेकिन उस अभियान को उतनी कामयाबी नहीं मिल पाई, जितनी इस अभियान को।

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15 अक्टूबर 2017 को जब यौन हिंसा के खिलाफ मीटू अभियान शुरू हुआ, तब उन्होंने जिन सूचनाओं, संवादों, फिल्मों आदि को शेयर किया, तो उसे कई लोगों ने दिल तोड़ने वाली बात कहा। 15 अक्टूबर को ही मीटू दो लाख बार से ज्यादा उपयोग में लाया गया और उसके अगले दिन इसकी संख्या ढाई गुना बढ़ गई। फेसबुक पर भी मीटू चलन में आ गया और देखते ही देखते 47 लाख से अधिक लोगों ने करीब सवा करोड़ पोस्ट इस हैशटैग से शेयर कर डाली। इस हैशटैग को इस्तेमाल करने वाले 45 प्रतिशत लोग अमेरिका के थे। लाखों महिलाओं ने इस हैशटैग के जवाब सोशल मीडिया पर लिखे, जिनमें दुनिया की जानी-पहचानी हस्तियां शामिल है।

ऐसा नहीं था कि केवल महिलाओं ने ही इस हैशटैग के जवाब में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। पुरूषों ने भी इसी हैशटैग के साथ अपने अनुभव और ज्यादतियों की शिकायत की। इसके बाद इसी से जुड़े नए हैशटैग चलन में आए, जैसे हैशटैग हाऊआईविलचेंज और हैशटैग हिमथ्रू। फिल्म, संगीत, विज्ञापन, शिक्षा और राजनीति से जुड़े अनेक लोगों ने इस हैशटैग के साथ अपने विचार शेयर किए।

देखते ही देखते 85 देशों में इस हैशटैग के साथ प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गई। भारत, पाकिस्तान, ब्रिटेन, फिलिपिंस, चीन आदि कई देशों में लोगों ने नामजद अनुभव शेयर किए। दुनियाभर की भाषाओं में इस हैशटैग के अनुवाद हुए और लोगों ने उसे अपने अंदाज में बयान करना शुरू किया। यहां तक कि हिब्रू भाषा में भी इस हैशटैग को लोगों ने अनुवाद किया और फ्रांस में टेलीविजन चैनल के एंकर्स पर भी आरोप लगाए। यूरोप की संसद में मीटू के अभियान के जवाब में एक सत्र बुलाया गया। ब्रिटेन में इस हैशटैग के आधार पर लगी शिकायतों पर जांच अधिकारी बिठाए गए। चीन में भी इस पर व्यापक प्रतिक्रियाएं हुई और उससे यह बात उजागर हुई कि इस तरह के शोषण की बात केवल यूरोपीय देशों में ही नहीं है।

इस अभियान के पक्ष में ही सब बातें नहीं हुई। कई लोगों ने यह भी कहा कि बरसों बाद किसी पुरानी घटना को इस तरह प्रचारित करना पब्लिसिटी स्टंट भी हो सकता है। यह एक तरह से भावनाओं का शोषण करना ही हुआ। इससे एक बात जरूर उजागर हुई कि अगर शोषित महिलाएं केवल अपनी आवाज ही बुलंद कर दें, तो समाज पर उसका कितना असर देखा जा सकता है।

11 Dec. 2017

 

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