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अगर कभी आप डिप्रेशन में हो, तब भूलकर भी सोशल मीडिया पर न जाएं। विशेषकर फेसबुक पर। आमतौर पर बोर होते हुए लोग मोबाइल या लैपटॉप पर फेसबुक जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट पर स्क्रोल करने लगते हैं। वहां लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाओं से उनका अवसाद बढ़ने लगता है और मनोरंजन के बजाय सोशल मीडिया उनके लिए परेशानी और दुख का कारण बन जाता है। हाल ही में हुए अध्ययन से पता चला है कि डिप्रेशन की स्थिति में सोशल मीडिया चिढ़चिढ़ापन बढ़ा देता है।

डिप्रेशन की स्थिति में छोटी-छोटी बातें भी और ज्यादा अवसाद का कारण बन जाती है। किसी ने आपकी छोटी सी पोस्ट पर कोई अच्छा कमेंट नहीं लिखा, तब आप अपने मन में गिरह बांध लेते है कि अरे, इसने मेरी अनदेखी कर दी। लोगों के मामूली कमेंट्स आपको नागवार गुजरते है। दोहराये जाने वाले कई संदेश भी आपको चिढ़चिढ़ा बना देते है, जबकि उनसे आपका कोई लेना-देना नहीं होता। आप अपनी किसी पोस्ट पर किसी करीबी की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करते है और अगर वह प्रतिक्रिया न हो, तब आप उस नजदीकी व्यक्ति से मन ही मन दूर चले जाते है।

किसी ने कोई पार्टी की और आपको बुलाया नहीं या पार्टी के फोटो शेयर किए और आपको पता चला कि अरे, आप उसमें आमंत्रित नहीं थे। ऐसा भी होता है कि आपका कोई फेसबुक फ्रेंड आपके शहर में हो और आपसे न मिला हो, लेकिन उसकी पोस्ट से आपको पता चलता है कि उसने आपके शहर में अच्छा वक्त गुजारा। आपको यह बात नागवार गुजरती है कि आपके बिना आपका करीबी कैसे अच्छा वक्त गुजार सकता है।

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अध्ययन से पता चला है कि फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया से हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। हर बार यह असर सकारात्मक हो, यह जरूरी नहीं। इसलिए जब आप अच्छे मूड में हो, तब सोशल मीडिया पर जाए।

डिप्रेशन के मरीजों के बारे में कहा जाता है कि डिप्रेशन का शिकार एकाकी रहना चाहता है। उसे अकेले रहने में ही आनंद आता है। सोशल मीडिया उसे भीड़ लगता है। लोगों से बातचीत और संवाद वह नापसंद करता है। सोशल मीडिया एक तरह का संवाद है। पुरानी यादों को कुरेदने का तरीका भी। अगर कभी आप अपने आप को डिप्रेशन में महसूस करें, तब सोशल मीडिया के बजाय मित्रों से टेलीफोन पर बात कर लेना ज्यादा अच्छा है या फिर आप पार्क में जाकर चहलकदमी कर लें या फिर पान और चाय की गुमटी पर भी वक्त बिता लें।

डिप्रेशन की अवस्था में दूसरे लोगों की उपलब्धियां आपमें ईष्र्या का भाव जगा सकती है। आपके किसी जूनियर साथी ने कार खरीद ली और वह कार का फोटो शेयर कर रहा है। आप मन ही मन कहेंगे कि अरे, उसकी यह औकात हो गई, लेकिन अगर आप अच्छे मूड में हो, तो उसकी वहीं तस्वीर आपमें ऊर्जा भरेगी और आप उसे बधाई देना चाहेंगे।

किसी की भी फेसबुक पोस्ट को उसकी संपूर्ण सच्चाई न मानें। किसी ने कार खरीद ली और तस्वीर शेयर की। यह उस पूरी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा है। आपको पता नहीं, उस कार को खरीदने के पीछे उसने कितने कर्ज लिए होंगे या फिर अपने परिवार के लोगों की ही लानतें झेली होगी। आपको क्या पता उस कार के डाउन पेमेंट के लिए उसने कहां से धन जुटाया होगा। ऐसे में बेहतर है कि पूरी कहानी को समझने की कोशिश न करें। आपका मित्र जो बताना चाहता है, उसे ही पूरी कहानी मानें और तनाव से बचें।

सोशल मीडिया भी आंकड़ों का खेल बन गया है। आप डिप्रेशन में हो, तो आपका डिप्रेशन इस बात से भी बढ़ सकता है कि आपने इतनी अच्छी पोस्ट लिखी, लेकिन उसे इतने कम लाइक्स और कमेंट्स मिले है। ऐसे में आप अपने उन दोस्तों से तुलना करने लगेंगे, जिन्हें छोटी-छोटी पोस्ट पर बहुत ज्यादा कमेंट्स और लाइक्स मिलते है। यह बात अच्छी तरह समझ लीजिए कि कमेंट्स और लाइक्स मिलना, किसी पोस्ट की कसौटी नहीं हो सकती। बहुत सारे मापदंड है, जिनसे कोई भी पोस्ट वायरल हो जाती है।

इसलिए हमेशा खुश रहे। सोशल मीडिया पर अगर कुछ शेयर करना हो, तो केवल सकारात्मक पोस्ट शेयर करें। आपकी पोस्ट से कभी यह न झलके कि आप एक निराश, हताश, परेशान व्यक्ति हैं। अगर आप निराश, हताश, परेशान हो, तब भी किसी को इस बात का एहसास मत होने दीजिए। अगर ऐसा हुआ, तो यह और बढ़ेगा ही। सोशल मीडिया पर दूसरो की अच्छी बातों की सराहना करने की नियम बना लीजिए। चाहे वह पोस्ट किसी बेहद करीबी की हो या अनजान व्यक्ति की।

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