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सायकोलॉजी टुडे नामक पत्रिका में सोशल मीडिया को लेकर तरह-तरह के रिसर्च लेख छपते रहते हैं। इन लेखों में सोशल मीडिया के लती लोगों के बारे में नए-नए तथ्य उजागर होते रहते हैं। इनमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्षों पर चर्चा होती है। रिसर्च में पता चला है कि सोशल मीडिया का अतिउपयोग एक तरह का मनोवैज्ञानिक बर्ताव है, जो यूजर की मानसिक और शारीरिक हेल्थ पर असर डालता है। यह सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी।

पहले नकारात्मक बातों की चर्चा। सोशल मीडिया का अतिरेक व्यक्ति में एकाकीपन की भावना भर देता है। यथार्थ से कटने सी कोशिश भी यूजर करने लगता है। सकारात्मक बात यह है कि सोशल मीडिया के माध्यम से व्यक्ति समाज में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाता है। यह हिस्सेदारी जन्मत के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाती है। पत्रिका में छपे लेख के अनुसार अगर आपके बच्चे किशोर उम्र के है, तो उन्हें आप कोई भी सेल्फी पोस्ट करने के पहले ये तीन सवाल और उनके जवाब खोजने के लिए प्रेरित करें।

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पहला सवाल : क्या मैं अपनी यह सेल्फी सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहा हूं कि इससे मुझमें यह एहसास आता है कि मैं अब बेहतर नजर आता हूं?

पहले सवाल के जवाब में मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह एक स्वाभाविक सी बात है। पहले सवाल का जवाब यह है कि अगर किशोर उम्र के लड़के-लड़कियां अपनी आकर्षक तस्वीरें लगातार पोस्ट करते जा रहे हैं, तो इसका अर्थ यह है कि वे अपने शरीर में आए बदलावों के प्रति सचेत है और सोशल मीडिया पर प्लेटफार्म पर उसे लगातार दिखाते रहना चाहते है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह तस्वीरें कई बार खुद के ही असंतोष का कारण बनती है, जो सेल्फी पोस्ट करने वाला यूजर अपने शरीर को लेकर चिंता जताता है। हालात यह भी हो जाती है कि खुद की ही तस्वीरें देखकर किशोर उम्र के बच्चे अपने खान-पान की आदतें बदल देते है। किसी को लगता है कि वह पुरानी तस्वीरों की तुलना में मोटा नजर आ रहा है, तो वह अपना खान-पान बदलने लगता है। कई बार इसके नकारात्मक प्रभाव भी होते है। खासकर युवा लड़कियां छरहरी काया दिखाने के चक्कर में पोष्टिक पदार्थों से ही दूर हो जाती है।

दूसरा सवाल : क्या यह सेल्फी मेरे असली व्यक्तित्व का परिचय देती है?

हर व्यक्ति की सेल्फी सही मायने में उसके व्यक्तित्व का प्रदर्शन नहीं करती। लोग उस तरह की सेल्फी पोस्ट करते है, जैसी वे औरों के सामने अपनी छवि बनाना चाहते हैं। सेल्फी पोस्ट करने वाला व्यक्ति होता कुछ और है और उसकी सेल्फी कुछ और बयां करती है। तरह-तरह के ऐप के जरिये किशोर उम्र के बच्चे सेल्फी में परिवर्तन कर लेते है। इसमें उनके सौंदर्य, त्वचा का रंग, बालों का रंग जैसी चीजें बदल जाती है। इस तरह की तस्वीर पोस्ट करने वाले अपनी तस्वीर देखकर ही खुश हो जाते है और अपने असली व्यक्तित्व में सुधार और बदलाव के बजाय सेल्फी की फोटोशॉप में ज्यादा समय लगाने लगते है। अपने नजदीकी बच्चों को सोशल मीडिया पर इस तरह की सेल्फी पोस्टिंग करने की आदत को हथोत्साहित करना चाहिए। क्योंकि यह एक तरह की मानसिक बीमारी की तरफ ले जाने वाली आदत है।

तीसरा सवाल : क्या मैं यह सेल्फी डिप्रेशन की दशा में पोस्ट कर रहा हूं?

तीसरे सवाल का जवाब यह है कि कई बार किशोर उम्र के बच्चे डिप्रेशन की अवस्था में अपने संघर्ष की तस्वीरें पोस्ट करने लगते है। यह बच्चे जीवन में कहीं नहीं पहुंचते और उनकी चिंता यही रहती है कि लोग उनके डिप्रेशन को नहीं समझे और सामान्य बच्चों की तरह ही उनको देखे और पसंद करें, लेकिन जब यह यूजर खुद की तस्वीरें देखते है, तो इनमें निराशा का भाव बढ़ता जाता है। किशोर उम्र की लड़कियों और युवतियों में यह डिप्रेशन ज्यादा पाया गया है।

सोशल मीडिया पर पोस्ट की हुई आपकी सकारात्मक सेल्फी कई बार आपमें सकारात्मक बदलाव ला सकती है। इस तरह की सेल्फी में उन सेल्फियों को शामिल किया गया, जिनमें बच्चे आपस में खेलते हुए नजर आए या सेल्फी लेने वाला किसी पालतू पक्षी या प्राणी के साथ खुशमिजाज मूड में है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसी सेल्फी बच्चों के विकास में मदद करती है। इस तरह की सेल्फी लेने वाली किशोरियां और युवतियां अपने नकली सौंदर्य के बजाय आंतरिक सौंदर्य को महत्व देती नजर आती है।

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