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terror

हैफा विश्वविद्यालय (इजराइल) की तरफ से किए गए एक अध्ययन में पता चला कि 90 प्रतिशत आतंकी संगठन अपने प्रचार-प्रसार के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते है। सोशल मीडिया एक सस्ता, त्वरित और तेजी से संदेशों का प्रचार करने वाला माध्यम है। सोशल मीडिया के माध्यम से ही आतंकी समूह अपना जाल फैलाते है। नए आतंकी भर्ती करने में भी सोशल मीडिया का हाथ बहुत ज्यादा है।

आतंकी संगठन अल कायदा तो अपना 90 प्रतिशत कम्युनिकेशन सोशल मीडिया के माध्यम से ही करता है। इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक के आतंकी संगठन अपनी गतिविधियों के प्रचार के लिए सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते है। अमेरिकी सेना के रेंजर पीटर कासिग का सिर धड़ से अलग करने का दुर्दांत वीडियो पिछले साल नवंबर में यू-ट्यूब पर जारी किया गया था। उसके बाद आईएसआईएस के ऐसे ही वीडियो लगातार सोशल मीडिया पर जारी किए जाते रहे। इस बात का ध्यान रखा गया कि वीडियो की क्वालिटी एकदम अच्छी हो और उनका प्रसारण न्यूज चैनलों पर करने लायक हो। जाहिर है आतंकी संगठन सोशल मीडिया के माध्यम से मास मीडिया का उपयोग करने की प्रतिभा रखते हैं।

मई 2011 से तालिबानी नेता ट्विटर पर सक्रिय हैं। ये अपने संदेश लगभग हर घंटे जारी करते रहते हैं। सोमालिया का आतंकी संगठन अल शबाब भी दिसंबर 2011 से ट्विटर का उपयोग कर रहा है। नाइजीरिया के कोनो शहर में हुई बमबारी का मुद्दा हो या बोको हरम के वीडियो, आतंकी संगठन उनका उपयोग अपने प्रचार के लिए करते रहते है।

आतंकियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी दरिंदगी का प्रचार है। दरिंदगी के इस प्रचार के कारण ही शांतिप्रिय लोगों में डर और आतंक पैदा हो सकता है। इस डर और आतंक के चलते आम लोग आतंकियों का विरोध करने में डरते हैं। यह प्रचार मास मीडिया पर संभव नहीं, क्योंकि वहां किसी न किसी तरह के नियंत्रण होते है। सोशल मीडिया पर इस तरह के नियंत्रण नहीं होते। फिर सोशल मीडिया का उपयोग करके नए-नए युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित किया जा सकता है।

आतंकी संगठनों के संदेशों के कारण ही ट्विटर ने यह घोषणा की थी कि वह कुछ देशों से प्राप्त संदेशों को स्केन करने के बाद ही जारी करेगा। ट्विटर ने अपनी घोषणा में यह कहा था कि ट्विटर की उपलब्धता दुनिया के लगभग सभी देशों में है, उन देशों में भी, जहां अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है और उन देशों में भी, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित है। ऐसे मेंं ट्विटर पर जारी होने वाले संदेशों की छानबीन जरूरी है।

पेरिस पर हुए आतंकी हमले के बाद अब इस बात पर चर्चा जोर-शोर से हो रही है कि किस तरह आतंकी गतिविधियों का विस्तार रोका जाए। यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया आतंकी गतिविधियों को तो नहीं रोक सकता, लेकिन आतंकवाद के विस्तार को काफी हद तक रोक सकता है। रविवार, 6 दिसंबर 2015 को ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि हमें आतंकवाद पर कब्जे के लिए टेक्नोलॉजी का बेहतर उपयोग करना चाहिए, जिससे कानून व्यवस्था पर नियंत्रण रखा जा सके। अमेरिकी राष्ट्रपति पद की डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने तो यहां तक कहा है कि हमें सिलीकॉन वैली के साथ एक नया रिश्ता कायम करने की जरूरत है। बात स्पष्ट है कि सिलीकॉन वैली के दिग्गजों से अपेक्षा की जा रही है कि वे आतंकवाद के खात्मे के लिए आगे आएं।

फेसबुक और एपल ने कानून का पालन कराने वाली संस्थाओं के और नजदीक आकर काम करना शुरू कर दिया है। कोशिश यह की जा रही है कि आतंकवाद को रोकने के लिए कुछ ऐसे उपकरण बनाए जाए, जो आतंकी गतिविधियों का प्रचार रोक भी सके और उनकी पहचान भी कर सके। फेसबुक और ट्विटर ने भी ऐसी टीम बनाई है, जो उस पर आने वाले संदेशों की पड़ताल करती है और यह जानने की कोशिश करती है कि कहीं इन माध्यमों से आतंकियों की भर्ती का काम तो नहीं हो रहा है। दिक्कत यह है कि प्रतिदिन करीब 10 करोड़ यूजर फेसबुक पर आते है। ये लोग करोड़ों संदेशों का आदान-प्रदान करते है। ऐसे में आतंकी संदेशों की खोजबीन काफी दुश्वर काम है।

अमेरिकी सुरक्षा विभाग चाहता है कि सोशल मीडिया पर आने वाले तमाम संदेशों तक उनकी पहुंच बनी रहे, ताकि अपराधियों तक पहुंचा जा सके। सुरक्षा विभाग के अधिकारियों के विपरीत सिलीकॉन वैली के सीईओ इस बात का प्रचार नहीं चाहते कि उनके संबंध सुरक्षा एजेंसियों के साथ बने हुए है। उनका कहना है कि आतंकवाद को रोकने के लए पहले ही बहुत कानून है और सरकार उनका उपयोग करके आतंकवाद को नियंत्रित कर सकती है। आतंकी संगठन बार-बार इस तरह के संदेश जारी करते रहते है कि वे जिस देश में है, वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था का फायदा उठाते रहें और वहां के कानूनों का उपयोग करते हुए ही आतंकी गतिविधियों के संचालन में मदद करते रहें। जैसे हाल ही में आईएस ने अमेरिकी नागरिकों से अपील की है कि वे कानूनी रूप से बेचे-खरीदे जाने वाले हथियारों का जखीरा जमा करके रखे।

चीन ने आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए क्लोज डोर नीति अपनाई हुई है। चीन में सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग तो होत है, लेकिन चीनी सरकार के कानूनों के तहत उन पर बहुत नियंत्रण है। पश्चिमी दुनिया से सम्पर्क बनाए रखने के लिए पूरी आजादी नहीं दी गई है।

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