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भूटान यात्रा की डायरी (3)

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भूटान में तम्बाकू और सिगरेट पर पूर्ण प्रतिबंध है, लेकिन यह प्रतिबंध शराब पर नहीं है। शराब को लेकर लोगों के मन में आग्रह या दुराग्रह नहीं है। न सरकार शराब बनाने में रूचि लेती है, न बनवाने में। शराब की बिक्री में भी सरकार की विशेष रूचि कहीं नजर नहीं आती। भूटान में शराब बेचने के लिए अलग से दुकानें भी नहीं है। राशन की दुकानों पर दूसरी चीजों की तरह शराब भी बिकती है। थिम्पू में हम लोग एक कॉफी हाउस में गए और कॉफी का आर्डर दिया। हमारे पड़ोस की टेबल पर चार नौजवानों का समूह आया और उन्होंने वहां की वेट्रेस को शराब लाने के लिए कहा। कॉफी हाउस में शराब मिलना हमारे देश में संभव नहीं है। हमारे यहांं बियर बार में कॉफी भी नहीं मिलती। एक ही कॉफी हाउस में बैठकर हम लोग कॉफी पी रहे थे और दूसरे लोग शराब।

राशन की दुकानों पर पुरुष ग्राहकों की तरह महिला ग्राहक भी सामान के साथ शराब की बोतलें खरीदती देखी जा सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद वहां सड़कों पर बैठकर शराब पीने वाले लोग नजर नहीं आए। थिम्पू के फुटपाथ पर कुछ लोग गिलास में कोई गर्म पेय पी रहे थे। ठंड के मारे हमारा बुरा हाल था, हमने वहां जाकर दुकानदार से कॉफी मांगी, तो उसने कहा कि हम कॉफी नहीं बेच रहे। उसने उस पेय का नाम कुछ अजीब सा बताया।

जब हमने पूछा कि यह क्या है, तब उसने कहा कि यह सूप है। हमने कहा कि हमें भी पीना है। हमें भारतीय देख उसने पूछा कि क्या हम नॉनवेज खाते है? हमारे ना कहने पर उसने कहा कि आप यह सूप पीये तो बेहतर क्योंकि यह बीफ (गौमांस) का सूप है। नेपाल में तो गाय की हत्या पर पूर्ण रोक है, लेकिन ऐसी रोक भूटान में नहीं है। वहां राशन की दुकानों पर भी गौमांस से बने पदार्थ खुलेआम मिल जाते है।

थिम्पू और पारो में हम साधारण थ्री स्टार होटल में रुके थे। उन होटलों में हमारे लिए शाकाहारी भोजन की व्यवस्था की गई थी। थ्री स्टार होने के बावजूद होटलों में सभी व्यवस्थाएं बहुुत शानदार थी। जनवरी की कड़कड़ाती ठंड में जब रात का तापमान -15 से -20 डिग्री तक हो जाता था, तब भी हमें होटल में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। होटल के अंदर हीटर लगे हुए थे। 24 घंटे गर्म पानी की व्यवस्था थी और जिन बिस्तरों पर हम सोते थे उन बिस्तरों पर चादर के नीचे बिजली से गर्म होने वाला एक गद्दा बिछा था। उसकी गर्मी स्विच से कंट्रोल की जा सकती थी।

हम अपने बिस्तर पर तो ठंड से कुड़कुड़ाते हुए पहुंचे थे, लेकिन आधी रात को उठकर बिस्तर का हीटर बंद करना पड़ा। बाथरूम में गर्म पानी से भरा बाथ टब सुबह ताजगी का एहसास दे गया। कभी सोचा नहीं था कि इतनी ठंड में भी हम इतने आराम से नहा सकेंगे। भूटान में बिजली की कोई कमी नहीं है। भूटान की जल विद्युत परियोजनाओं से भरपूर बिजली पैदा होती है। यह बिजली इतनी ज्यादा है कि वे भारत को बिजली निर्यात भी करते है। पहाड़ों से होती हुई बिजली के तारों की लाइन सीमावर्ती भारत में देखी जा सकती है। पहले हमें लगा कि शायद भारत से भूटान में बिजली जाती है, लेकिन हालात विपरीत है।

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थिम्पू में घूमने की जगहों के बारे में पूछने पर हमारे गाइड ने कहा कि आप नेशनल जूू घूमने जा सकते है। हम लोग उत्साह से नेशनल जू गए। काफी लम्बी चढ़ाई के बाद पहाड़ी पर बसे उस जू में जाने पर हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि वहां जानवरों के नाम पर केवल तीन जानवर ही मौजूद थे। हमें बहुत हंसी आई। हमने गाइड से कहा कि यह आपका नेशनल जू है या किसी का पर्सनल जू। गाइड ने कहा कि यह हमारा राष्ट्रीय चिड़ियाघर है।

यहां आप वह प्राणी देख पा रहे है जो कहीं और आप नहीं देख सकते थे। इस पशु का नाम ताकिन बताया गया। यह भूटान का राष्ट्रीय पशु है। इसका शरीर गाय की तरह और मुंह बकरी की तरह होता है। ताकिन के बारे में हमें एक कहानी बताई गई। सन् 1455 के आसपास की घटना है। एक चमत्कारी लामा (बौद्ध साधु) भूटान में विहार कर रहे थे। उनसे लोगों ने कहा कि वे कोई चमत्कार दिखाए। लामा ने वहां आसपास बिखरी कुछ हड्डियां इकट्ठा की। यह हड्डियां गाय और बकरी की थीं। लामा ने उन सभी हड्डियों को एक जगह रखा और मंत्र से उसमें प्राण फूंक दिए। ऐसा कहा जाता है कि थोड़ी देर बाद ही वह प्राणी जीवित हो गया, जिसका शरीर गाय का और मुंह बकरी का था। जीवित होते ही वह जंगलों की ओर चला गया।

भूटान में अब जो भी प्राणी बचे है वे उसी टाकिन के वंशज है। नेशनल जू में हमें वहां के राष्ट्रीय पक्षी और एक दुर्लभ प्रजाति की भेड़ भी देखने को मिली। जीवन में इससे छोटा चिड़ियाघर हमने कहीं नहीं देखा। जबकि यह नेशनल जू था। भारत में रहने के कारण हमें बड़ी-बड़ी जगह देखने की आदत पड़ गई है। ज्यादा भीड़, बड़ी बिल्डिंग्स, चौड़ी सड़कें, बड़े-बड़े मॉल- यह सब भूटान में नहीं है। भूटान का चीन से कोई व्यापारिक रिश्ता नहीं है। न ही भूटान में चीनी सामान बिकता है। जो भी सामान चीन से आता है, वह तस्करी के जरिये ही आता है।

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जैसे चीन में नदी को पू कहा जाता है, वैसे ही उससे मिलता-जुलता नाम भूटान में चू है। चू अर्थात नदी। पारो चू यानि पारो नदी। नदी के किनारे बसे शहर का नाम पारो है। भूटान की राजधानी थिम्पू के बीच से थिम्पू चू बहती है। थिम्पू नाम भी नदी के कारण ही पड़ा है। करीब आठ लाख आबादी वाले भूटान में यहीं दो प्रमुख नगर है। पहाड़ों के बीच से गुजरते हुए लोगों ने सुविधानुसार अपने घर बना लिए है।

भूटान में तीरंदाजी को राष्ट्रीय खेल की मान्यता प्राप्त है। वहां फुटबॉल भी काफी खेला जाता है। एक कॉलेज के सामने से गुजरते हुए हमने देखा कि वहां छात्र-छात्राओं की संख्या लगभग बराबर-बराबर है। हमें बताया गया कि स्कूल की पूरी पढ़ाई मुफ्त है। कॉलेज जाने वाले हर विद्यार्थी को प्रतिमाह पांच सौ रुपए दिए जाते है, ताकि विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित हो। भूटान के राजा चाहते है कि उनके देश का कोई भी नागरिक अनपढ़ न रहे। अगर कोई विद्यार्थी पढ़ाई में होशियार होता है, तो राजा उसे अपने खर्चे से भारत या ब्रिटेन भेजते है और पढ़ाई पूरी होने तक उसकी देखभाल करते है।

हमारे गाइड ने बताया कि राजा हमारे पिता के समान है और वे हमारा पूरा ख्याल रखते है। कॉलेज में लड़के और लड़कियों के होस्टल अलग-अलग होते है, लेकिन लड़कियों के होस्टल में भी लड़के आराम से आ-जा सकते है। वहां ऐसी कोई बंदिश नहीं है। हमें बताया गया कि भूटान की सभ्यता चार हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है। ईसा से दो हजार साल पहले भूटान में बस्तियां बसना शुरू हो गई थी। ऐसा कहा जाता है कि ईसा के जन्म के सात सौ साल पहले भूटान पर कूच बिहार के राजा का अधिकार था। तिब्बत से बौद्ध धर्म के अनुयायी भूटान आए और वहीं बस गए। 17वीं शताब्दी में भूटान ने बौद्ध धर्म को अपना लिया।

1865 में भूटान और ब्रिटेन में एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार भूटान को सीमा के कुछ भू-क्षेत्र के बदले अनुदान मिलने लगा। 1907 में भूटान में राजशाही की स्थापना हुई। 1910 मेंं भूटान का ब्रिटेन से एक समझौता हुआ, जिसके तहत ब्रिटेन ने यह बात मानी कि वह भूटान की अंदरुनी मामलों में कोई दखल नहीं देगा। 1947 में भारत के आजाद होने के बाद ब्रिटेन की जगह भारत ने भूटान से समझौता कर लिया। 1949 में भारत ने भूटान को उसकी वह जमीन लौटा दी, जो अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले रखी थी। इसके बदले भूटान ने भारत को यह अधिकार दिया कि वह उसकी सीमाओं की रक्षा करेगा और विदेश नीति के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

भूटान में कोई भी प्रमुख उद्योग नहीं है। वहां की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती, जंगल और पर्यटन है। भारत को बिजली बेचने से भूटान को अच्छी खासी आय हो जाती है। 90 प्रतिशत लोग खेती पर ही निर्भर है। भूटान में जो भी प्रमुख विकास कार्य हो रहे है वे भारत की मदद से ही हो रहे है। इसीलिए भारतीय नागरिकों को भूटान में विशेष सुविधाएं मिलती है। यूरोप के पर्यटकों की तरह उन्हें 160 डॉलर रोज का परमिट शुल्क नहीं देना पड़ता।

पूरे भूटान में होटल वालों को सख्त निर्देश है कि वे अपने यहां रुकने वाले हर विदेशी पर्यटक का परिचय पत्र प्रतिदिन पुलिस को ई-मेल करें। ताकि वहां की पुलिस को इस बात की जानकारी रहे कि किस होटल में किस देश का पर्यटक रुका हुआ है। भूटान में हस्तशिल्प की चीजें बहुत सुंदर उपलब्ध हैं।

हस्तशिल्प से भी वहां के लोगों को अच्छी आय हो जाती है और इसके कारोबार में महिलाओं की भूमिका ही प्रमुख है। भूटान में रहने वाली करीब 25 प्रतिशत आबादी हिन्दू है।ये वे हिन्दू है जो मूल रूप से नेपाल के निवासी है। भारत से नेपाल जाकर बसने वाले नगण्य ही होंगे। इतने बड़े भूटान में एक भी सिनेमाघर नहीं है।

2005 में एक सिनेमाघर खुला था, लेकिन वह बंद कर दिया गया। वहां के टीवी चैनलों में भारतीय चैनल देखे जा सकते है। इस कारण भूटान के लोग भारतीय फिल्मों से परिचित है और वे हिन्दी फिल्मों के गाने भी गुनगुनाते है। युवा वर्ग के शौकीन लोग सीमावर्ती भारतीय क्षेत्र में आकर सिनेमा का शौक पूरा करते है।

 

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दुनिया के सबसे खुशमिजाज लोगों का देश भूटान

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भारत के पूर्वोत्तर में सीमा से जुड़ा हुआ भूटान दुनिया के सबसे खुशमिजाज लोगों का देश माना जाता है। ग्रास हेप्पीनेस इंडेक्स में भूटान दुनिया में पहले स्थान पर रहा है। भूटान के राजा का भी यहीं कहना है कि हम जीडीपी नहीं ग्रास हेप्पीनेस इंडेक्स को मानते हैं। 

भारत के पड़ोस में बसा स्वर्ग

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दुकानों पर पोस्टरों में भूटान के राजा और रानी के पोस्टर बिकते हुए देखे जा सकते है। वहां के लोगों में राजा और रानी के प्रति खास लगाव देखने को मिला। कोई भी भूूटानी अपने राजा की बुराई नहीं सुन सकता। राजशाही के खिलाफ बोलो तो भी किसी को पसंद नहीं आता। भूटानियों का कहना है कि हमारा राजा पिता के समान है और हमारा बहुत ध्यान रखता है। राजा के साथ ही रानी भी काफी लोकप्रिय है।

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