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मीडिया की सभी प्रमुख साइट्स पर भारतीय लोकतंत्र के बारे में कुछ न कुछ प्रमुखता से आया। ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, यू-ट्यूब, गूगल प्लस, लिंक्डइन आदि तमाम साइट्स पर जेएनयू विवाद और जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी छाई रही। छात्र नेता को निचली अदालत में पेश किए जाने के दौरान वकीलों द्वारा की गई मारपीट भी प्रमुख मुद्दा बनी। यह कहा गया कि काले कोट वाले सभी वकील और न्याय के रक्षक नहीं होते।

हद तो तब हो गई, जब लोगों ने अफजल गुरू को फांसी पर चढ़ाए जाने की अपील ठुकराने के कारण राष्ट्रपति के पुुराने आदेशों को भी फिर से शेयर कर दिया। यह कोई कानून नहीं है, लेकिन यह परंपरा है कि भारत के समाचार-पत्र और पत्रिकाएं, राष्ट्रपति का कार्टून प्रकाशित नहीं करते। सोशल मीडिया पर ऐसा कोई बंधन नहीं है, इसलिए कुछ लोगों ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के एक पुराने कार्टून को भी शेयर कर दिया। यह कार्टून अफजल गुरू की फांसी ठुकराए जाने के दौर का है और इसमें राष्ट्रपति को एक हाथ से चरखा कातते हुए और दूसरे हाथ में चरखे के धागे से बुना गया फंदा लिए हुए दिखाया गया है। इस तरह की वाहियात और शर्मनाक हरकतों को रोका जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रपति भारत के प्रतीक हैं।

जेएनयू प्रकरण में अनेक हैशटैग चलन में आए। इनमें जेएनयू, कन्हैया कुमार, डेमोक्रेसी अंडर अटैक, डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी इन इंडिया, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, न्याय व्यवस्था, खाकी, दिल्ली पुलिस आदि प्रमुख हैं। एक व्यक्ति ने तो यहां तक लिख दिया कि अच्छा हुआ भारत का संविधान तैयार करने वाली संविधान सभा के प्रमुख बाबा साहब अम्बेडकर थे, वर्ना यह जेएनयू वाले भारतीय संविधान को भी मनुवादी संविधान कहने से बाज नहीं आते।

यू-ट्यूब पर सैकड़ों वीडियो अपलोड किए जा चुके है, जिनमें जेएनयू परिसर में छात्रों के एक गुट द्वारा लगाए गए नारों को अपने-अपने हिसाब से दिखाया गया है। इनमें से अधिकांश वीडियो एडिटेड है। यहां तक कि कुछ वीडियो तो ऐसे भी अपलोड किए गए, जिनमें दिखाया गया कि कश्मीर की आजादी का नारा लगाने वाले स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया के लोग नहीं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिसर के छात्र थे। विद्यार्थी परिषद इन आरोपों को नकार चुकी है।

पटियाला कोर्ट ले जाते हुए छात्र नेता के साथ की गई मारपीट और पत्रकारों से अभद्रता भी सुर्खियों में रही। पत्रकार इस मुद्दे पर एक मत हो गए और उन्होंने मोर्चा निकाला। आरोपी वकील को वकालत करने से रोक दिया गया है और उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जा रही है। इस तरह की खबरें सबसे पहले सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही थी।

इस मामले में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर विवादों में घिर गए। आरोप लगाया गया कि उन्होंने आरोपी की सुरक्षा के इंतजाम ठीक नहीं किए और मामले को हल्के से लिया। नए कुलपति की नियुक्ति को लेकर भी सोशल मीडिया में तरह-तरह के विवाद उठते रहे। इस तरह के आरोप भी लग रहे है कि बीजेपी के नेतृत्व में सरकार आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। भाजपा की सरकार राष्ट्रीयता की परिभाषा बदलने में जुटी है, इस तरह की बातें भी कही गई। इस सरकार में पुलिस आयुक्त के नेतृत्व में अपराधियों और गुंडा तत्वों को खुला छोड़ा जा रहा है और शरीफों को दबाया जा रहा है।

भारत के एक बड़े वर्ग ने इन सब मामलों पर अपनी चिंता जाहिर की। दिल्ली के प्रेस क्लब में भी कुछ लोगों ने जेएनयू जैसा घटनाक्रम दोहराने की कोशिश की। इन लोगों ने प्रेस क्लब को कक्ष को किसी अन्य बौद्धिक कार्यक्रम के बहाने बुक किया था और वहां कुछ और ही आयोजन कर डाला। दिल्ली प्रेस क्लब वालों को मजबूरन ऐसे तत्वों को बाहर खदेड़ना पड़ा। कुल मिलाकर पूरे सोशल मीडिया में ही लोग दो खेमे में बंटे नजर आए। एक खेमा जेएनयू के समर्थकों का है और दूसरा विरोधियों का। हालात से निराश एक महिला पत्रकार ने लिखा- ‘हम न तो जेएनयू वालों जैसे प्रगतिशील है और न ही आरएसएस की विचारधारा से सहमति रखने वाले। ऐसे में हर एक देशभक्त को संघी कहना उचित नहीं।’ एक जेएनयू समर्थक की टिप्पणी थी- 'वी लव इंडिया, बट वी नॉट लव इट्स गर्वमेंट।'

subahsavere3feb202016

 

20 Feb. 2016 12.45 pm

 

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