
श्री श्री रविशंकर और उनकी संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के सदस्य सोशल मीडिया का जितना अच्छा इस्तेमाल कर रहे है, शायद ही कोई कर पा रहा हो। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में बुधवार की शाम विश्व संस्कृति महोत्सव के मामले में अपना क्लीयरेंस देने के साथ ही जैसे ही पांच करोड़ रुपए के जुर्माने का फैसला सुनाया, उसके कुछ ही मिनट में श्री श्री रविशंकर ने ट्वीट किया ‘‘हम इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। हम अपील करेंगे। सत्यमेव जयते!’’ देखते ही देखते यह संदेश दुनियाभर में फैले उनके करोड़ों भक्तों तक पहुंच गया और इस संदेश को हजारों लोगों ने रि-ट्वीट और लाइक किया। शाम होते-होते सभी प्रमुख न्यूज चैनल्स पर श्री श्री रविशंकर का पक्ष ब्रेकिंग न्यूूज में चल रहा था।

इसके ठीक पहले श्री श्री रविशंकर का ट्वीट था- ‘‘दिल से हमने दिल्ली वालों से कहा, यमुना के किनारे थोड़ी सी जमीन दो; झा़ड़ू लगाएंगे, जादू दिखाएंगे, दुनिया को बुलाएंगे, जन्नत उतारेंगे।’’ इसी से आगे का ट्वीट था- ‘‘कुछ लोगों ने कहा यह जुल्म है, आपको जुर्माना करेंगे। हमने हंसकर कहा, हम जुनून है उसके, जिसके आप हो।’’ स्पष्ट है कि श्री श्री रविशंकर सोशल मीडिया की शक्ति बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं और उनकी टीम इसका उपयोग मास मीडिया के लिए कंटेंट उपलब्ध कराने के लिए करते रहे हैं।
ट्विटर पर जो बातें श्री श्री रविशंकर लिखते रहे हैं, उन्हें ही मास मीडिया में प्रचारित करते रहे हैं। चाहे वह विश्व संस्कृति महोत्सव के आयोजन स्थल की बात हो या राजनैतिक प्रश्रय की। यमुना को प्रदूषित करने के मुद्दे पर आलोचना के जवाब में वे शुरू से ही यह कहते आ रहे हैं कि यह ‘जोक ऑफ द ईयर’ है। हम लोग तो यमुना को साफ करने के अभियान में लगे हैं। हम यमुना को गंदा कैसे होने देंगे? हमने यमुना से हजारों टन कचरा बाहर निकाला हैं और अब उसके पानी को शुद्ध करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।
श्री श्री रविशंकर के दुनिया में करोड़ों भक्त है और वे अलग-अलग फील्ड के लोग हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि उनके भक्तों में प्रभावशाली वर्ग के लोग हैं। बड़े-बड़े उद्योगपति, सांसद, मीडिया टायकून, खिलाड़ी, फिल्म कलाकार, लेखक और प्रमुख अधिकारी उनके शिष्य हैं। बाबा रामदेव की तरह उनकी भी अपनी यूनिक मार्केटिंग स्ट्रेटजी हैं। बाबा रामदेव जहां थोड़े डाउन मार्केट है, वहीं श्री श्री रविशंकर ने अपनी ब्रांडिंग अप मार्केट गुरू के रूप में की है।

विश्व संस्कृति महोत्सव के लिए उन्होंने अपनी अप मार्केट वाली इमेज को थोड़ा सा डाउन भी किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीब जाने के अवसर भी उन्होंने खोए नहीं। पद्म विभूषण सम्मान भी उन्होंने सादर स्वीकार किया, जबकि बाबा रामदेव ने इस सम्मान को लेने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था। श्री श्री रविशंकर का कहना था कि सम्मान लौटाने वाले एक वर्ग विशेष के लोग हैं और वे पद्म विभूषण से इनकार करके उस वर्ग में शामिल नहीं होना चाहते।
ट्विटर पर अपने 14 लाख से अधिक फॉलोअर्स को उन्होंने शुरू से ही यह संदेश दिया था कि आर्ट ऑफ लिविंग के विश्व संस्कृति महोत्सव को राजनैतिक रंग में न ढलने दें। यह एक सांस्कृतिक महोत्सव है और सांस्कृतिक महोत्सव का एक मात्र मकसद दो संस्कृतियों को करीब लाना होता हैं। यह कोई आंकड़ों का खेल नहीं है कि हमने इतना टार्गेट अचीव कर लिया। हम विश्व संस्कृति महोत्सव के बहाने मानवता की सेवा में लगे आर्ट ऑफ लिविंग के 35 साल का जश्न मना रहे हैं और पूरी दुनिया के लोग इसमें शामिल हो रहे हैं। भारत के भी गांव-गांव से लोग यहां आएंगे।
आर्ट ऑफ लिविंग और श्री श्री रविशंकर के प्रभामंडल का ही असर है कि आमतौर पर राजनैतिक दल इस आयोजन के खिलाफ खुलकर बोलने में संकोच करते नजर आए। राज्यसभा में वामपंथी सदस्यों ने और कुछ एनजीओ ने ही इस आयोजन के खिलाफ आवाज उठाई। अरविंद केजरीवाल ने श्री श्री रविशंकर से कहा था कि खुशी है कि आप यह आयोजन दिल्ली में कर रहे हैं। केजरीवाल के एक मंत्री ने ही आयोजन स्थल के पास यमुना में तैरता पुल बनाने का अनुरोध रक्षा विभाग से किया था। तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चाहती थीं कि यह आयोजन कोलकाता में हो, क्योंकि कोलकाता को भारत की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता हैं। श्री श्री रविशंकर ने उनसे कहा कि हम दिल्ली में आयोजन का निर्णय कर चुके हैं, लेकिन अगला आयोजन निश्चित ही कोलकाता में करेंगे।

सोशल मीडिया पर इस आयोजन के विरोध में भी आवाजें उठीं। इस मंच से एनजीओ, वामपंथी कार्यकर्ताओं और कुछ पत्रकारों ने पर्यावरण की दुहाई और नियमों की अवहेलना की बातें लिखीं, लेकिन यहां मामला पूरी तरह एकतरफा होता नजर आया। अभी तो आयोजन चल ही रहा है। सोशल मीडिया पर इस आयोजन के बारे में लंंबे समय तक कमेंट्स और वीडियो देखने को मिलते रहेंगे।
12 march 2016
11.45 am