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कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तरप्रदेश के चुनावों का प्रचार अभियान नरेन्द्र मोदी की स्टाइल में शुरू किया है। शायद इसलिए कि वहां उनके चुनाव सलाहकार प्रशांत किशोर है, जो पहले नरेन्द्र मोदी का काम संभाल चुके है। चाय पर चर्चा की तरह अब खटिया पर चर्चा हो रही है। चर्चा करने वाले और कोई नहीं कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी हैं। राहुल गांधी के कार्यक्रम में किसान चर्चा करने के लिए आए जरूर और चर्चा खत्म होने के बाद वहां आए करीब दो हजार खटियाएं अपने साथ ले गए, जिसके हाथ जो खटिया आई, उसे ले जाने में किसी ने भी कोताही नहीं बरती। कोई साइकिल पर, कोई मोटर साइकिल पर और कोई बैलगाड़ी पर खटिया ले गया, मानो खटिया चर्चा का प्रसाद हो। बीते कुछ समय से ऐसी ही राजनैतिक परिपाटी शुरू हो चुकी है। दिल्ली में राजपद पर योग दिवस मनाया गया, तो वहां योगाभ्यास में शामिल होने वाले सभी लोगों को योगा मैट ले जाने की छूट दे दी गई थी। इससे नेता भी खुश होते है और साझेदार भी। योगा मैट हो या खटिया इस बहाने लोग अपने नेता को याद तो कर ही लेते हैं, लेकिन इस पर लतीफे चल निकलते है।

राहुल गांधी के इस कार्यक्रम पर खटिया को लेकर जितने भी मुहावरे और फिल्मी गाने हैं, वे सभी किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया पर आ रहे है। चुहलबाजी का एक नया विषय लोगों को मिल गया है। अब आगे से ऐसी किसी भी चर्चा के लिए कांग्रेस को नए सिरे से खटिया आर्डर देनी होगी। लिखने वाले तो यह भी लिख रहे है कि खटिया पर चर्चा करने आए राहुल गांधी की खटिया लोगों ने गायब कर दी। खटिया खड़ी करना तो अब पुरानी बात हो गई। ट्विटर पर किसानों का राहुल, गरीबों का राहुल, राहुल की खटिया, यूपी में राहुल जैसे कई हैशटैग से लोगों ने अपनी भावनाएं व्यक्त की।

कांग्रेस समर्थकों ने इस बात पर बेहद संतोष और खुशी जताई कि राहुल गांधी की खटिया पर हुई चर्चा को किसानों ने बड़े उत्साह से लिया। वे राहुल गांधी के साथ अपने विचार भी शेयर करने आए। यहां तक कि कई ने तो इसे वर्तमान समय का सबसे अच्छा और उत्साहजनक चुनाव अभियान भी करार दे दिया। यह दावा भी किया गया कि यह राहुल गांधी के कारण ही संभव हो पाया कि किसानों की जमीन बड़े-बड़े पूंजीपति घरानों के हाथों में जाने से बच गई। राहुल गांधी के कारण ही भूमि अधिग्रहण बिल उसके मूलरूप में पेश नहीं हो सका। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं से यह बात साफ है कि अभी किसानों की दशा बेहद खराब है।

राहुल गांधी खटिया पर चर्चा करने के अलावा गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में भर्ती किसानों से भी मिलने गए। कांग्रेस समर्थकों ने लगे हाथ कांग्रेस के विकल्प की बात भी दोहराई, लेकिन विरोधी कहां चुप रहने वाले है? उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की कांग्रेस के कारण ही तो किसानों की इतनी बुरी हालत हुई है। राहुल गांधी यहीं बात दोहराते रहे कि सूट-बूट की सरकार केवल बड़े पूंजीपति घरानों के कर्ज ही माफ कर रही है। किसानों के कर्ज माफ क्यों नहीं किए जाते? राहुल गांधी ने किसानों से चर्चा में जो बाते कही, वे सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर फैलाई जा रही है, जैसे कांग्रेस के राज में ही किसानों का 70 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ किया गया था। राहुल गांधी ने कहा है कि हम अब फिर सरकार पर दबाव डालेंगे कि वह किसानों के कर्जे भी माफ करें।

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नरेन्द्र मोदी की तरह ही कांग्रेस भी सोशल मीडिया के उपयोग में जुटी है। राहुल गांधी के किसानों से मिलने के कार्यक्रम को सोशल मीडिया पर ही जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है, क्योंकि मास मीडिया में उसे इतना महत्व नहीं मिला, जितनी अपेक्षा थी। मास मीडिया में राहुल की चर्चा को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया गया। कई लोगों ने लिखा कि राहुल गांधी किसानों के मन की बात सुन रहे है और सुनना चाहते हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी किसानों पर अपने मन की बात थोपना चाहते हैं।

ऐसा नहीं है कि सब जगह राहुल गांधी की प्रशंसा ही हो रही हो। लोग यह भी लिख रहे है कि क्या राहुल गांधी रॉबर्ट वाड्रा को किसान समझते है, उनके लिए तो रॉबर्ट वाड्रा ही किसान का रूप है। आजादी के 70वें साल में अगर आपको किसानों की समस्याएं सुनने के लिए खटिया बिछानी पड़ रही है, तो अब तक क्या कर रहे थे? राहुल गांधी से चर्चा के बाद में किसानों को मिलना क्या है? राहुल गांधी किसानों की भावनाओं से खेलने के लिए आए है। उत्तरप्रदेश के चुनाव होने तक कांग्रेस भी उसी अंदाज में चुनाव प्रचार करने वाली है, जिस अंदाज में नरेन्द्र मोदी ने किया है। लोकसभा चुनाव के बाद उत्तरप्रदेश विधानसभा का चुनाव सबसे बड़ी चुनावी घटना होगी।

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