
हम 2016 के आखिरी दिनों में है। सोशल मीडिया 2016 में जितने बड़े पैमाने पर पहुंच चुका है, उतना कभी पहले नहीं पहुंचा था। फेसबुुक, टि्वटर और इंस्टाग्राम जैसे तीन प्लेटफॉर्म पर अरबों लोग एक-दूसरे से जुड़े हुए है। 2016 में फेसबुक की लोकप्रियता का आलम यह रहा कि लाखों की संख्या में लोग हर सप्ताह उससे जुड़ते गए। पिछले एक महीने में ही फेसबुक के वैश्विक यूजर्स की संख्या 60 करोड़ रही है। बहुत से लोग फेसबुक पर तो है, लेकिन उसका सक्रिय उपयोग नहीं करते। 60 करोड़ लोग भी अगर फेसबुक का उपयोग सक्रिय रूप से करते है, तो यह कोई छोटी संख्या नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि फेसबुक अपने चरम पर पहुंच गया है और अब उसके सामने कोई चुनौती नहीं है।
180 करोड़ लोगों के काम आने वाला फेसबुक 2017 में नई चुनौतियों से रूबरू होगा। ये चुनौतियां कानूनी दबाव के रूप में होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव और तुर्की में रूसी राजदूत की हत्या के बाद फेसबुक और टि्वटर जैसे प्लेटफॉर्म की परेशानी बढ़ गई है। ये सोशल मीडिया समाचारों के आदान-प्रदान का काम करते है। इनकी न्यूज फीड को कोई भी पढ़ सकता है, लेकिन चुनौती यही है कि ऐसी न्यूज फीड की विश्वसनीयता क्या है? फेसबुक और टि्वटर अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि वे तो पब्लिक प्लेटफॉर्म है और वहां कोई भी व्यक्ति अपनी बात कहने को स्वतंत्र है।

फेसबुक ने चीन में अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए खुद ही सेंसरशिप के तरीके अपना लिए है। अब जर्मनी ने चेतावनी दी है और कहा है कि अगर उन्होंने जर्मनी के कानूनों का उल्लंघन किया, तो उन पर लाखों डॉलर प्रति फर्जी न्यूज फीड का जुर्माना देना पड़ेगा। जुर्माने की राशि इतनी बड़ी है कि किसी भी कंपनी की आर्थिक रीढ़ की हड्डी तोड़ सकती है। फेसबुक को ऐसी फर्जी न्यूड फीड की परेशानी का सामना पिछले दिनों करना पड़ा था, जब किसी ने फेसबुक पर एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘अमेरिका में 9/11 करने वाला डोनाल्ड ट्रम्प था’। अब डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने वाले हैं। ऐसे में वे इस तरह की फर्जी न्यूज फीड को रोकने के लिए कोई भी कदम उठाने से भला क्यों बिचकेंगे?
फेसबुक पर एक और परेशानी यह है कि वहां उसके यूजर किसी भी न्यूज के लिंक को शेयर कर देते है। उस न्यूज को प्रकाशित करने वाली वेबसाइट की विश्वसनीयता कितनी है, यह समझ पाना मुश्किल है। अफवाह फैलाने वालों ने फेसबुक को प्रचार में लाने के लिए फर्जी वेबसाइट्स बनाकर उनके लिंक शेयर करना शुरू कर दिया और यह संख्या लाखों में है। इससे बुद्धिजीवी वर्ग में यह धारणा बनी है कि फेसबुक पर अगर कोई लिंक शेयर की जा रही है और किसी बात का दावा किया जा रहा है, तो उसका अर्थ यह नहीं है कि वह बात सच ही है.

अब हालात यह है कि सोशल मीडिया पर अफवाहों झूठी खबरों ने वास्तविक घटनाओं और असली समाचारों को पीछे छोड़ दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में लोग इसकी झलक देख चुके है। पहले तो फेसबुक वाले खुद इससे पल्ला झाड़ते रहे। यह कहते हुए कि वह इस तरह के समाचार न तो तैयार करता है, न प्रसारित करता है। 2017 में इस चुनौती से निपटने के लिए फेसबुक ने अब एक अन्य न्यूज मीडिया कंपनी की सेवाएं लेने का समझौता कर लिया है। वह कंपनी इस बात की पड़ताल करेगी कि जिस तरह के लिंक शेयर किए जा रहे है, वे दुर्भावनापूर्ण और झूठे तो नहीं है। अगर लोगों ने ऐसे लिंक शेयर किए, तो इस तरह के कृत्य करने वाले लोगों को फेसबुक प्रतिबंधित कर देगा।
टि्वटर के सामने भी फेक न्यूज एक चुनौती बना हुआ है। अनेक लोग यह मानते है कि टि्वटर समाचारों को सबसे तेज गति से प्रसारित करने वाला प्लेटफॉर्म है। दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया हाउस के कर्ता-धर्ता टि्वटर पर जुटे रहते है, लेकिन यह बात भी अब समझ में आ रही है कि लोगों ने टि्वटर को परेशान करने वाली मशीन बना रखा है। हाल ही में टि्वटर ने एक ब्रिटिश ब्लॉगर को बैन कर दिया है, क्योंकि उसने एक अभिनेत्री को परेशान करने वाले ट्वीट बार-बार किए और वे सारे ट्वीट दुर्भावनापूर्ण थे और उस अभिनेत्री की बदनामी करने वाले भी।
हाल ही में टि्वटर ने घोषणा की है कि वह अपने प्लेटफॉर्म पर दो ऐसे फीचर्स जोड़ रहा है, जो बदनामी करने वाले ट्वीट से रोकने में मदद करेंगे। इसके साथ ही किसी जाति, धर्म, जेंडर या क्षेत्र के लोगों के बारे में नफरत फैलाने वाले संदेशों पर भी रोक लगाई जाएगी।