
फेसबुक पर लाइव वीडियो का दौर शुरू होने के बाद बहुत से ऐसे नकारात्मक वीडियो प्रचलन में आ रहे है, जिनका असर समाज के लिए घातक है। हालात इतने बदतर है कि बच्चे और किशोरवय के लोग आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठाने की कोशिश के वीडियो भी शेयर कर रहे है। जिसके कारण दूसरे बच्चों के मन में नकारात्मक भाव बढ़ते जा रहे है। खुद को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे वीडियो को लेकर पश्चिम का समाज बेहद चिंतित भी है।
इसका सबसे दुखद भाग यह है कि इन दुर्घटनाओं के बारे में फेसबुक जैसी कंपनी कोई जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं। इस बारे में जब एक पत्रकार ने फेसबुक को इसकी शिकायत की और लिखा कि इस तरह के आत्मघाती वीडियो का चलन हर हाल में रोका जाना चाहिए, तब उन्हें जवाब मिला कि हमें आपकी शिकायत मिली, हमने उस पर विचार किया और यह पाया कि इस तरह के वीडियो हमारे कम्प्युनिटी स्टैण्डर्ड के नियमों का उल्लंघन नहीं करते।
अब यह क्या बात हुई, जिस तरह की घातक वारदातों को फेसबुक प्रचारित कर रहा है, उसके लिए जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। फेसबुक का कहना है कि जो वीडियो दिखाया गया, उसकी विश्वसनीयता की परख नहीं की जा सकी। इस आत्मघाती कदम के बारे में फेसबुक शिकायत करने वाले की बात को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं था और वह घटना भी कोई ऐसे-वैसी नहीं, किसी की जिंदगी की सबसे खतरनाक वारदात।
न्यूजीलैंड में इस तरह के कानून है कि अगर आपको किसी की आत्महत्या की जानकारी भी हो, तब भी आप वहां के स्थानीय विधि अधिकारी की अनुमति के बिना इस बारे में चर्चा नहीं कर सकते कि उस व्यक्ति ने आत्महत्या की है। वहां के मीडिया में भी इस तरह की खबरों को प्रकाशित या प्रसारित करने के पहले उसकी पड़ताल और अनुमति की कार्रवाई की जाती है।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब भी किसी व्यक्ति द्वारा की गई आत्महत्या के विवरण प्रकाशित या प्रचारित होते है और यह बताया जाता है कि किसी व्यक्ति ने किस तरह से आत्महत्या की, उसके तत्काल बाद उसी तरीके को अपनाकर आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ जाती है। किसी की भी आत्महत्या कोई साधारण घटना नहीं है और जब भी इस तरह के वीडियो दिखाए जाते है, तब उत्सुकता से लोग उसे देखना चाहते हैं। आत्महत्या के ऐसे वीडियो देखते-देखते नकारात्मकता का जोर बढ़ जाता है और कई लोग आत्महत्या की कोशिश की नकल करने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आत्महत्या किसी भी तरह की समस्या का कोई समाधान नहीं है। अधिकांश आत्महत्याएं मूर्खतापूर्ण कारणों से होती है। जीवन अमूल्य है और उसे कोई वापस लौटा नहीं सकता। ऐसे में आत्महत्या का विकल्प कायराना ही कहा जा सकता है। परेशानियों और समस्याओं से घबराकर जिंदगी से ही पलायन करना समस्या का समाधान नहीं है।
अनेक शिकायतों के बाद फेसबुक ने इस बारे में अपनी नीति थोड़ी सी बदली है। किसी न किसी तरीके से लोग ऐसे वीडियो देख ही लेते है। मौके को भुनाने के लिए फेसबुक ऐसी आत्महत्या करने वालों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त कर देता है और अपने यूजर्स से अपील करता है कि वे भी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए आगे आए। भारत सहित दुनिया के कई देशों में आत्महत्या की भावना विकसित होने पर सहयोग देने वाले मनोचिकित्सक और उनसे जुड़ी संस्थाएं सक्रिय है, जो निराशा में डूबे लोगों की मदद करती है। इसी तरह सड़क दुर्घटनाओं और अन्य मानवीय भूलों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में हो रही असामयिक मौतों को रोकने के लिए भी पूरी दुनिया में प्रयास जारी है। होना तो यह चाहिए कि सोशल मीडिया के माध्यम से आम लोग भी सामने आए और इस तरह की अकाल मृत्यु के खिलाफ अभियान चलाए।