
रवीश कुमार ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा कि मैं न्यूज चैनल नहीं देखता और न ही अखबार पढ़ता हूं। हो सकता है कुछ दिन बाद वे यह भी कहने लगे कि मैं सोशल मीडिया पर भी नहीं जाता। जिस तरह से अखबार और टीवी मूल मुद्दों से हटकर संदर्भहीन समाचारों और कार्यक्रमों के कारण अपना अर्थ खोते जा रहे है। उसी तरह सोशल मीडिया भी लोगों के व्यक्तित्व का नाश करता जा रहा है।
सोशल मीडिया पर जिस तरह के पोस्ट लोकप्रिय हो रहे है। उनमें मौलिकता का अभाव साफ-साफ नजर आता है। कंट्रोल कॉपी पेस्ट का चलन बहुत ज्यादा हो गया है और लोग मूल पोस्ट की कॉपी करके अपने नाम पर चिपकाना पसंद करते है। इसमें मेहनत नहीं लगती, समय भी नहीं लगता और न ही कोई कॉपीराइट के झमेले में उलझाने की कोशिश करता है। इंस्टेंट चीजों के जमाने में सोशल मीडिया भी बहुत इंस्टेंट हो गया है।
आप देख सकते है कि सोशल मीडिया पर कुछ लतीफे 15 मिनिट में ही चर्चित हो जाते है और कुछ घंटे के बाद उन्हें कोई पूछता नहीं। नए तरीके के मुहावरे और हैशटैग आते-जाते रहते है। कुछ दिनों बाद आप देखते है कि अचानक वही हैशटैग और मुहावरे वापस चलन में आ गए है। एक जैसे कमेंट्स, एक जैसे इमोजी और एक जैसे मुहावरे।
ट्विटर पर हर कोई बिग बी या नरेन्द्र मोदी है। वहीं स्टाइल और वैसी ही भाषा। आमतौर पर आत्मश्लाघा। जो लोग थोड़े पैसे वाले है, उन्होंने ऐसे कर्मचारी रख रखे है, जो बुद्धि से पैदल लगते है। उनकी पोस्ट देखकर ही समझ में आ जाता है कि इसे कोई और फीड कर रहा है। अपने ही नाम के आगे श्री और जी लगाने वाले भी देखने को मिलते है, मानो पोस्ट कोई और नहीं वे खुद कर रहे हो।
फेसबुक पर देखिये- मैं, मेरा परिवार, मेरा कुत्ता, मेरा खाना, मेरी गाड़ी, मेरे बच्चे, मेरे बच्चों के खेल, मेरे बच्चों के खिलौने, मेरे बच्चों के बर्थ-डे, मेरा पेट, मेरा कैमरा, मेरे कपड़े, मेरी यात्रा, मेरा प्रिय लेखक-कवि, मेरा प्रिय हीरो, मेरी प्रिय फिल्म, मेरा प्रिय नाटक, मेरी प्रिय किताब, मेरी प्रिय जगह....... कई लोग तो दिन में कई-कई बार अपनी सेल्फी पोस्ट करते रहते हैं। ऐसा लगता है कि मानो करोड़ों लोग एक जैसा बोल रहे हो। उन्हें दुनिया से ज्यादा मतलब नहीं है।
या फिर फेसबुक पर ऐसे लोग हैं, जिन्हें केवल गालियां देना आती है। मर्दों को गाली, सरकार को गाली, दूसरी जाति और धर्म के लोगों को गाली, कई लोगों को तो भारत के इतिहास की धज्जियां उधेड़ने में मजा आता है और कई लोगों को तो भारत और भारत से जुड़ी कोई भी चीज अच्छी ही नहीं लगती, मानो वे मंगल गृह पर बैठकर भारत को देखते है। भारत के लोकतंत्र से उनको शिकायत है, यहां के लोग उन्हें गंदे लगते है, यहां का यातायात थर्ड क्लास और भारतीय खानपान कूड़ा। भारतीय महिलाओं की स्थिति पर वे खून के आंसूू बहाते दिखते हैं। पर कभी यह नहीं बताते कि उनके घर में महिलाओं की क्या स्थिति है? कई स्त्रियां है, जो केवल एक खास एंगल से ही हजारों फोटो पोस्ट करती रहती है और ऐसी स्त्रियों के दसियों फ्रेंड भी है, जो उनके काजल बिंदी पर ही मरते-मिटते नजर आते है।
वे लोग जिन्हें हम बहुत बड़ा आदमी मानते हैं, वे भी सोशल मीडिया पर बहुत बौने नजर आते हैं। बुद्धिजीवियों की टिप्पणियां, उनकी विचारधारा का प्रचार लगती है। कौन बुद्धिजीवी किस तरह के बयान देता है, वे उसी के आगे, उसी तरह के बयान देते रहते है। अगर वे केजरीवाल के विरोधी है, तो केजरीवाल की अच्छी से अच्छी बात भी उन्हें पसंद नहीं आएगी और अगर वे केजरीवाल के समर्थक है, तो उन्हें लगेगा कि केजरीवाल तो ब्रह्मा हैं। जिस तरह भक्त दूसरी बातें नहीं सोच सकते, उसी तरह अंधविरोधी भी विरोध के अलावा कुछ और नहीं देख सकते।
सोशल मीडिया पर लोग एक-दूसरे के साथ जितना अच्छा संपर्वâ बना सकते है और नए विचारों को जन्म दे सकते हैं, उसकी जगह वे एक रोबोटिक उपक्रम कर रहे हैं। अपरिमित क्षमता वाले इंसान सोशल मीडिया पर सीमित सोच और समझ का प्रदर्शन करते हैं। इसके बावजूद यह देखने में आता है कि फेसबुक पर लोग थोड़े आशावादी और सहयोगी स्वभाव के है, जबकि ट्विटर पर लोगों की पोस्ट में व्यंग और निंदा ज्यादा होती है। सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म का अपना चरित्र है और वह चरित्र अलग-अलग जातियों में बंट गया है।
11 Jan. 2016
02.25 PM