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webdunia5sept2016

सोशल मीडिया ने एफएमसीजी सेक्टर का पूरा माहौल ही बदल दिया है। फिक्की ने इस बारे में हाल ही एक अध्ययन की रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार फेसबुक में अपने ग्राहकों को आकर्षित करने की क्षमता टीवी की तुलना में कहीं ज्यादा होने वाली है। भारत में 25 करोड़ से ज्यादा फेसबुक यूजर्स है। ये लोग कहीं भी फेसबुक से जुड़ जाते है। यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और जल्द ही वह समय आ जाएगा, जब विज्ञापनदाता टीवी पर विज्ञापन देने के बजाय फेसबुक पर विज्ञापन देने को प्राथमिकता देंगे।

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हाल ही में सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि कुछ शहरों के मॉल्स को 24 घंटे खुला रखने की छूट दी जाए। यह स्थिति इसलिए भी आई कि सोशल मीडिया पर लोग चौबीसों घंटे जुड़े रहते हैं और ऑनलाइन शॉपिंग भी करते रहते हैं। ऑनलाइन शॉपिंग का हाल यह हो गया है कि कई शहरों में मॉल्स में विजिटर्स तो आते है, लेकिन ग्राहक नहीं। यह बात भी देखी गई है कि लोग मॉल्स में जाकर अपनी पसंद का प्रॉडक्ट चुन लेते है और जब खरीदने का मौका आता है, तब वे ऑनलाइन शॉपिंग को प्राथमिकता देते हैं। हाल यह है कि कई मॉल्स में शोरूम्स के संचालकों ने ग्राहकों को ट्रॉयल देना ही बंद कर दिया है। कुछ उत्पाद तो ऐसे है, जो ऑनलाइन शॉपिंग में ग्राहक को सस्ते पड़ते हैं और कुछ प्रॉडक्ट ऐसे है, जो केवल ऑनलाइन ही उपलब्ध है।

उपभोक्ता के व्यवहार की जांच करने वाले इस अध्ययन से पता चला है कि अब ग्राहकों की पसंद बदलती जा रही है। अब ग्राहक वेलनेस उत्पाद को ज्यादा पसंद कर रहे है। ये ग्राहक अपने समय की बचत को भी महत्व देते है और सुविधा को भी। धीरे-धीरे ऐसे ग्राहकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है,जो घर का राशन और सब्जियां तक ऑनलाइन या एप की मदद से मंगवाना पसंद करते है। गुड्स और सर्विस टैक्स (जीएसटी) के आने के बाद ग्राहकों के रवैये में और भी बदलाव होने वाला है।

facebook-adsअधिकांश एफएमसीजी अपने ग्राहकों के बेस को बदलने में लगे हैं। ग्राहकों के बदलते रुझान के कारण कंपनियों के सामने नए-नए विकल्प और संभावनाएं खुलती जा रही है। ये कंपनियां अपने उत्पादों के नवाचार (इनोवेशन) में लगे हैं। कंपनियां इस ओर भी ध्यान दे रही है कि ग्राहकों की संस्कृति कुछ ऐसे बदल दी जाए कि वे अपनी शॉपिंग बिना किसी की मदद के कर सके। देश में 378 ऐसी कंपनियां है, जिनका टर्नओवर दस करोड़ से अधिक है। ये एफएमसीजी कंपनियां हर दिन अपने ग्राहक की पसंद की पड़ताल करती रहती है।

न्यूयॉर्क में इस साल मीडिया कंपनियां एक बड़ा सम्मेलन कर रही है, जिसमें वे इस बात का अध्ययन करेंगी कि फेसबुक और गूगल जैसे माध्यमों के सामने वे अपने विज्ञापनों को किस तरह प्रभावी बनाए रखे। सोशल मीडिया पर विज्ञापनों के बढ़ते प्रवाह के कारण टेलीविजन चैनलों को मिलने वाला अरबों रुपए का विज्ञापन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। सोशल मीडिया एक ऐसे अदृश्य माध्यम के रूप में आ गया है, जो विज्ञापनों को अपनी ओर तेजी से खींच रहा है। सोशल मीडिया का यह नया वर्ग टेलीविजन और प्रिंट मीडिया को पुराने जमाने का बता रहा है। फेसबुक के विज्ञापनों की बढ़ती संख्या से इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि विश्व के दो प्रमुख टीवी न्यूज चैनलों को मिलने वाले विज्ञापनों से अधिक की राशि फेसबुक के खाते में जमा हो रही है।

अमेरिका की केबल कंपनियों के सामने भी संकट के बादल मंडरा रहे है। इनको मिलने वाले विज्ञापनों में भारी कमी हो रही है। हाल यह है कि अनेक लोगों ने अपने घरों से केबल के कनेक्शन भी हटा दिए है और वे इंटरनेट के जरिये प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को अपनी टीवी चैनलों पर देख रहे है। अकेले 2016 में भी अब तक 60 हजार से अधिक लोगों ने अपने केबल कनेक्शन कटवा दिए है। ऐसा लग रहा है कि इस पूरी लड़ाई में फेसबुक और गूगल बाजी मारते जा रहे है।

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