
मंदसौर में पिछले दिनों हुई हिंसक वारदातों के बाद मंदसौर और उससे जुड़े जिलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन कर दिए गए। वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर सब बंद। इसके कुछ समय बाद इंटरनेट पर ही पाबंदी लगा दी गई। प्रशासन फिर भी संतुष्ट नहीं हुआ, तो कुछ इलाकों में 2जी और 3जी सेवाएं भी बंद कर दी गई। सहारनपुर में भी दंगों के दौरान यही व्यवस्था की गई। न सोशल मीडिया, न इंटरनेट, न मोबाइल। कश्मीर में तो यह आए दिन होता रहता है।
इंटरनेट और मोबाइल पर बैन करने के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है। पिछले पांच साल में 80 बार से ज्यादा इंटरनेट सेवाएं बाधित की गई। सुरक्षा बलों को जानकारी मिली थी कि कश्मीर में वाट्सएप का उपयोग आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, वहां करीब 300 वाट्सएप ग्रुप है, जो हिंसक वारदातों के लिए समन्वयक की भूमिका में रहते है, इसी कारण पूरे प्रदेश में एक साथ कई जगह हिंसक प्रदर्शन होते है। पिछले दिनों सैन्य बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया एक आतंकी भी अपने मोबाइल से पत्थरबाजों को बुलावा दे रहा था, लेकिन आधी रात के बाद उसे इन संदेशों पर सकारात्मक जवाब नहीं मिल पाया। चिंताजनक बात यह है कि कश्मीर के कई वाट्सएप ग्रुप के सदस्य हिंसक गतिविधियों के लिए सीमा पार बैठे पाकिस्तानी आकाओं से मार्गदर्शन लेते है।
इंटरनेट पर बैन लगने से आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होती है। ऑनलाइन भुगतान जैसी सेवाएं भी इसकी चपेट में आ जाती है। सहारनपुर में जातीय दंगे भड़काने में सोशल मीडिया का उपयोग किया गया है। स्मार्ट फोन आने के बाद होने वाली हिंसक वारदातों और आगजनी की घटनाओं की वीडियो बनाना आसान हो गया है और उन वीडियो को प्रचारित-प्रसारित करना भी।

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नहीं लगाने और उस पर सख्त निगरानी करने के अपने फायदे है, जैसे पिछले दिनों मारे गए एक दुर्दांत आतंकवादी तक सुरक्षा बल उसके इंटरनेट कनेक्शन के कारण ही पहुंच पाए। जब उस आतंकवादी को लगा कि वह घेरा जा चुका है, तब उसने सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ के बजाय वाट्सएप ग्रुप पर पत्थरबाजों को संदेश भेजना शुरू किए। वह लगातार दस घंटे तक पत्थरबाजों को संदेश भेजता रहा और सैन्य बलों के सामने रुकावट डालने की आशा में समय व्यतीत करता रहा। सुरक्षा बलों की गोलीबारी का उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसे लगता था कि ऐसा करने से सुरक्षा बलों को यह भ्रम हो सकता है कि वह आतंकवादी छुपा हुआ नहीं है, लेकिन उसके सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के कारण उस तक पहुंच पाना आसान हुआ।
इंटरनेट पर बैन करने के मामले में भारत के अलावा कई देश है। इथियोपिया में तो वहां की सरकार ने परीक्षा के दिनों में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया था। इथियोपियाई सरकार को लगता था कि परीक्षाओं की दौरान नकल का उपयोग करने के लिए लोग वाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसी सेवाओं का उपयोग धड़ल्ले से करते है। अलजीरिया में भी परीक्षाओं में नकल करने के लिए इंटरनेट की मदद ली जाती है। इसके अलावा परीक्षा का पेपर लीक करने के लिए भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग जमकर होता है। अलजीरिया में कुछ छात्रों ने सोशल मीडिया पर परीक्षा का पेपर लीक कर दिया, तो ग्रेजुएशन की सभी परीक्षाएं रद्द कर दी गई।
कश्मीर में एक महीने का इंटरनेट और मोबाइल बैन हटा ही था कि आतंकवादी सबजार की मौत के बाद उसे फिर लागू कर दिया गया। सहारनपुर में भी वहां जातीय हिंसा भड़कने के बाद इंटरनेट बाधित कर दिया गया। वहां तो लोग मोबाइल पर भी बात नहीं कर पा रहे है, क्योंकि मोबाइल सेवाएं भी ठप कर दी गई है। हिंसक वारदातों में सोशल मीडिया का उपयोग रोकने के लिए सरकार को सोशल मीडिया और इंटरनेट पर अपनी निगरानी के तरीके बदलने चाहिए और ज्यादा चुस्ती-फुरती दिखानी चाहिए। भारतीय सैन्य बलों से जुड़े सभी जवानों और अधिकारियों के लिए सोशल मीडिया पर उपस्थित होने पर रोक है, लेकिन फिर भी उनके परिवार वाले किसी न किसी तरीके से सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते है।