
एकाकी जीवन जी रहे लोगों को सोशल मीडिया के लाइक्स बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। ज्यादा लाइक्स का अर्थ है उनके लिए खुशी। लाइक्स का कम होना उनमें नैराश्य का भाव ला देता है। जन्मदिन पर मिले लाइक्स की संख्या तय करती है कि बर्थ-डे मना रहा व्यक्ति उस दिन कितना खुश रहता है। फेसबुक जैसे प्लेटफार्म लोगों के बर्थ-डे को खास बना देते है। उन लोगों को भी याद दिला दी जाती है कि जिसे आप भूल रहे हो, आज उसका बर्थ-डे है। इस सूचना से ऐसे भी कई लोग बधाई संदेश प्रेषित कर देते है, जिनकी याददाश्त कमजोर है और जो बधाई संदेश देने के लिए बहुत मेहनत नहीं करना चाहते। एक इमोजी भेजकर बधाई दी जा सकती है या फिर पूरा हैप्पी बर्थ-डे लिखने की बजाय केवल तीन अक्षर एचबीडी से काम चल जाता है।
कुछ ऐसा ही फेसबुक फोटो और पोस्ट के बारे में भी है। ज्यादा लाइक्स और कमेंट्स लोगों को खुशियां देते है। फेसबुक शेयर भी लोगों की लोकप्रियता का पैमाना बन चुका है। स्कूल और कॉलेज के दिनों के मित्रों के संपर्क में रहने का एक अच्छा माध्यम है सोशल मीडिया। दूर हो चुके लोगों के बारे में भी इससे यह भ्रम हो जाता है कि नजदीकियां बनी हुई है।
फेसबुक पर लाइक्स का अर्थ केवल लाइक हो, यह तो संभव है, लेकिन इसके और अर्थ भी हो सकते है। जरूरी नहीं कि आपने जो फोटो या वीडियो या टैक्स्ट पोस्ट शेयर की हो, सामने वाला उससे इत्तेफाक रखता हो। मैं अपने पांच हजार फेसबुक मित्रों की सैकड़ों पोस्ट रोज देखता हूं। उनमें से कई तो पोस्ट के बहाने पूरा निबंध ही फेसबुक पर डाल देते हैं। ऐसे तमाम लेखों को पूरा पढ़ने के बाद ही कोई लाइक करे, जरूरी नहीं। मुझे किसी लेख का विषय या फोटो पसंद आता है, तब भी लाइक का बटन दबा देता हूं। परिवार के बहुत से लोग ऐसे है, जो अपनी हर छोटी-बड़ी गतिविधि को सोशल मीडिया पर शेयर करते है। ऐसी पोस्ट को लाइक करने का मतलब मेरे लिए यह है कि मैंने यह पोस्ट देखी। कई बार मैं ऐसी पोस्ट को भी लाइक करता हूं, जो परस्पर विरोधाभासी होती है। जैसे कोई सरकार की घनघोर समर्थक टिप्पणी और कोई सरकार के एकदम खिलाफ लिखी गई बात। यहां मेरे लाइक करने का अर्थ होता है कि मुझे आपके तर्क पसंद आए और शायद विषय को उठाने का तरीका भी। यहां मेरी लाइक का अर्थ यह नहीं कि मैं पोस्ट से पूरी तरह सामर्थ हूं ही। मैं एक लोकतांत्रिक व्यक्ति हूं और मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है और हर व्यक्ति अपनी सोच के हिसाब से कोई भी धारणा बनाकर विचार व्यक्त करता है। मैं ऐसे हर एक विचार का स्वागत करता हूं, जिसमें कोई नई बात प्रस्तुत की गई हो।

लाइक्स के अलावा कई पोस्ट ऐसी होती है, जहां मैं न तो लाइक का बटन दबाना पसंद करता हूं और न ही कोई कमेंट। उसे शेयर करने का सवाल भी शायद नहीं उठता। मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं कि कई लोग केवल इसलिए विवादास्पद पोस्ट डालते है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा लाइक्स मिलें। घनघोर सांप्रदायिक या अतिमहिलावादी पोस्ट को बहुत ज्यादा लाइक्स मिलते हैं। यहां कई लोग इस तरह की पोस्ट को इसलिए लाइक करते हैं कि वे अपने आपको ऐसी जगह पाते हैं, जहां वे खुलकर अपनी बात नहीं कह सकते। ऐसे लोग भी हैं, जो अपने आप को प्रगतिशील दिखाने के लिए खास तरह की पोस्ट को लाइक करते हैं, लेकिन उनके विचार वैसे ही दकियानूस होते हैं। इसीलिए यह बात कहीं जा सकती है कि जो लोग आपकी पोस्ट को लाइक कर रहे हैं और टिप्पणी लिख रहे हैं, जरूरी नहीं कि निजी जीवन में भी वे उन्हीं बातों को मानते हो, जो सोशल मीडिया पर दिखा रहे हो।
सोशल मीडिया पर की गई अनेक शोध में यह बात बार-बार दोहराई गई है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग लोगों को आत्ममुग्ध बना देता है। इस तरह की पोस्ट में मैं, मैं और मैं के अलावा मुझसे संबंध रखने वाली बातें और लोग ही होते हैं। यह भी एक तरह की मानसिक व्याधि है। शायद इसीलिए कई लोग इस तरह के बयान देते है कि जब से मैंने सोशल मीडिया का उपयोग छोड़ा है, तब से मैं ज्यादा खुश और सुखी हूं।