
भूमि अधिग्रहण को लेकर कानून बनाने पर लम्बी कवायद जारी है। इस मामले में राजनीति भी खुलकर हो रही है। राजनैतिक दल अपना हित साधने में लगे है। विपक्ष को लगता है कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसके जरिए वह सरकार की लोकप्रियता में सेंध लगा सकती है। सरकार को लगता है कि भूमि अधिग्रहण के जरिए वह अपने विकास के कार्यक्रमों को खुलकर आगे बढ़ा सकेगी।

भारत में अधिसंख्य आबादी खेती पर निर्भर है। खेती ही है जो उन्हें पूर्णकालीक या अंशकालीन रोजगार देती है। जोत चाहे छोटी हो या बड़ी, हमारे किसानों के लिए दुखती रग होती है। जमीन को लेकर हिंसक वारदातें भी होती है। बढ़ती आबादी के साथ जमीन के मालिक बनने की चाह और भी तेज हो गई है। बड़े-बड़े व्यवसायिक घरानों में येन-केन प्रकारेण भूमियां हड़पकर भूमि बैंक बना लिए है। वे इस भूमि बैंक का उपयोग बाजार भाव पर करना चाहते है। इस भूमि बैंक को उन्होंने कम दामों पर किसी तरह हथिया लिया था। इन जमीनों के आवंटन में सरकारों की भी भूमिका बड़ी होती है। इसलिए इसमें राजनीति ही बहत आ गई है।
किसानों के लिए जमीन केवल रोजगार का साधन ही नहीं है। जमीन उनके लिए इससे बहुत ज्यादा मायने रखती है, एक हद तक तो जमीन का महत्व किसान अपनी जिंदगी से भी ज्यादा समझता है। बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण खेत छोटे होते जा रहे है और खेती योग्य जमीन दूसरे कामों में उपयोग में लाए जाने लगी है। एक दौर था जब मकान बनाने में जमीन की कीमत गौण थी और निर्माण की लागत ज्यादा। अब स्थिति इसके ठीक उल्टी हो गई।
जमीनों के इस संघर्ष में अगर हम छह-साढ़े छह दशक पहले जाए तो यह चीज आश्चर्य करने वाली है कि लोगों ने अपनी बेशकीमती जमीनें भूमिहीनों को दे दी थी। गांव के वे मजदूर जिनके पास मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं था, जमीनों के मालिक बन गए। वह भी किसी कानून के जरिए नहीं बल्कि एक आंदोलन के जरिए। इस आंदोलन के जरिए करीब 45 लाख एकड़ जमीन लोगों ने दान में दे दी थी। इस जमीन में से लगभग एक चौथाई जमीन गरीबों और भूमिहीनों को भी बांट दी गई। यह था भू-दान आंदोलन। दुनिया का सबसे बड़ा रचनात्मक भूमि सुधार अभियान। जिसके प्रणेता थे महात्मा गांधी के सहयोगी रहे आचार्य विनोबा भावे। विनोबा जी का मानना था कि ‘सबै भूमि गोपाल की’ अर्थात सम्पूर्ण जमीन ईश्वर की है और उस पर सभी का बराबर-बराबर अधिकार है। यह अभियान इतना महत्वपूर्ण था कि पूरे के पूरे गांव ही जमींदारों ने दान में दे दिए थे। इसे ग्राम दान नाम दिया गया। ऐसे गांव की संख्या 8500 थी।

तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव से शुरू हुआ यह भू-दान आंदोलन इतिहास बन चुका है। विनोबा भावे उन दिनों पदयात्राएं कर रहे थे। पोचमपल्ली गांव में उन्होंने देखा कि कुछ भूमिहीन कष्टप्रद जीवन जी रहे है। उन्होंने जब उन भूमिहीनों से बात की तब यह निष्कर्ष निकला कि अगर उनके पास थोड़ी भी जमीन होती तो वे अपना जीवन अच्छी तरह चला सकते थे। आचार्य विनोबा भावे ने इस बात को समझा और उन्होंने बड़े जमींदारों से अपील की कि वे अपनी जमीन का छठवां हिस्सा अगर गरीबों को दे दें, तो समाज में काफी बदलाव आ सकता है। दो जमींदार सामने आए और उन्होंने एक-एक एकड़ दान देने की घोषणा की। जमीन का यह दान बिना किसी खून खराबे या हिंसा के हुआ। विनोबा भावे ने कहा कि यह गांधी जी का ही मार्ग है कि लोग प्राकृतिक संपदा पर सामूहिक मिल्कियत रखें। उनके अनुसार यह गांधीजी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत का ही दूसरा रूप था। विनोबा भावे तेलंगाना क्षेत्र के दो सौ गांवों में घूमे और दो साल में उन्हें करीब-करीब 12200 एकड़ जमीन दान में मिली। जब वे यूपी (युनाइटेड प्रॉविन्स) में घूमे तब वहां भी उन्हें अच्छा समर्थन मिला। सबसे अच्छा समर्थन उन्हें ओडिशा से मिला। जहां 1946 गांव दान में मिले थे। उसके बाद महाराष्ट्र में 603 गांव लोगों ने दान दे दिए थे। विनोबा भावे चाहते थे कि भू-दान आंदोलन में करीब ५ करोड़ एकड़ जमीन दान में मिले। जो संभव नहीं हो पाया।
भू-दान में मिली जमीनों को लेकर नकारात्मक खबरें भी आती रही। लोगों ने बंजर जमीनें दान दे दी थी। अनेक भूखण्ड ऐसे थे जो कानूनी विवादों में पंâसे थे। अनेक में उत्तराधिकार को लेकर लड़ाइया चल रही थी। इन सब बातों को भी देखें, तब भी भू-दान आंदोलन अपने आप में एक महान क्रांतिकारी घटना थी। विनोबा भावे को इसका श्रेय जाता है। आज के दौर में जब जमीन को लेकर इतने विवाद आए दिन होते है तब यह कल्पना भी मुश्किल है कि इसी धरती पर कोई ऐसा शख्स भी हुआ था जिसके कहने पर लोगों ने अपनी बेशकीमती जमीनें दान दे दी थी। बिना किसी लालच के।
-प्रकाश हिन्दुस्तानी