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ऑल इण्डिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के पूर्व चीफ विजिलेंस ऑफिसर संजीव चतुर्वेदी और एनजीओ गूंज के प्रमुख अंशु गुप्ता को 2015 का रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड दिया जाने वाला है। एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले इस पुरस्कार को पाने वालों में लाओस की एक हैंडीक्राफ्ट सहकारी संस्था की संचालक कॉमली चंटवांग, म्यांमार के एक्टर-डायरेक्टर जॉव थू और फिलीपिंस की कलाकार लीगाये फर्नान्डो को भी यह पुरस्कार दिया जाने वाला है। फिलीपिंस के तीसरे राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे की याद में यह सम्मान दिया जाता है। संजीव चतुर्वेदी ने एम्स के सीबीओ रहते हुए भ्रष्टाचार के 200 से अधिक मामले उजागर किए। इनमें से 78 मामलों में सजा दी जा चुकी है। 87 मामलों में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और करीब 20 मामलों में सीबीआई की जांच शुरू हो गई है। संजीव चतुर्वेदी के कारण सरकार की कई बार किरकिरी भी हो चुकी है। संजीव चतुर्वेदी कहते है कि वे व्यवस्था में सुधार चाहते है और उसी के लिए कार्य कर रहे है।

Award

संजीव चतुर्वेदी जाने-माने व्हीसल ब्लोअर है। एम्स में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मामले उजागर किए थे। एम्स से हटाएं जाने के बाद यह भी कहा गया था कि राजनैतिक उद्देश्य से उन्हें हटाया गया है। लगभग तीन हजार सात सौ पचास करोड़ की लागत से एम्स के विस्तार की योजनाओं में धांधली और कुछ लोगों को फायदे पहुंचाने की कोशिश के विरुद्ध संजीव चतुर्वेदी ने सवाल खड़े किए थे। जिस कारण उन्हें पद से हटना पड़ा। संजीव चतुर्वेदी भारतीय वन सेवा के अधिकारी है। अखिल भारतीय सेवाओं में रहते हुए रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड पाने वाले वे दूसरे शख्स है। उनके पहले आईपीएस किरण बेदी को पद पर रहते हुए यह सम्मान मिला था। संजीव चतुर्वेदी को मैग्सेसे अवॉर्ड दिया जा रहा है, सरकारी सेवा में उनके बेहतरीन काम के लिए और अंशु गुप्ता को सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए।

एम्स में आने के पहले संजीव चतुर्वेदी हरियाणा में तैनात थे। वहां भी उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मामले उजागर किए थे। उसके बाद वे एम्स के प्रमुख सतर्कता अधिकारी बने। रेमन मैग्सेसे फाउंडेशन में उनके बारे में कहा है कि संजीव चतुर्वेदी को उनके दायित्व के निर्वहन में प्रतिबद्धता, साहस और शासकीय सेवा में श्रेष्ठ कार्य के लिए सम्मानित करने का पैâसला किया गया। संजीव चतुर्वेदी का कहना है कि उन्हें अपने दायित्व के निर्वहन के कारण कई बार तबादलों का सामना करना पड़ता है।

अंशु गुप्ता ने 1999 में गूंज संस्था की स्थापना की थी। यह एनजीओ गरीबों के लिए वस्त्र उपलब्ध कराने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गूंज की शुरुआत और गरीबों के लिए कपड़े इकट्ठा करने की शुरुआत अंशु गुप्ता ने एक गरीब बच्ची के कहने पर की, उस बच्ची ने कहा था कि ठंड के दिनों में हमारे पास कपड़े नहीं होते, तो मैं अपने पिताजी से चिपककर सो जाती हूं, तो उनके बदन से मुझे गर्मी मिल जाती है। दिक्कत तब होती है, जब वे करवट बदलते है। अंशु गुप्ता को तब लगा कि वस्त्र हमारी कितनी बड़ी जरूरत है और यह हर एक शख्स को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होनी चाहिए। गूंज की शुरुआत अंशु गुप्ता ने अपनी पत्नी मीनाक्षी के साथ मिलकर की थी और वर्तमान में यह संस्था करीब-करीब सौ टन सामग्री जरुरतमंदों के लिए हर महीने इकट्ठा करके वितरित करती है।

अंशु गुप्ता का एनजीओ शहरी इलाकों से लोगों के गैरजरूरी कपड़े, जूते, खिलौने, फर्नीचर, किताबें और दूसरी वस्तुएं इकट्ठा करता है। उन तमाम वस्तुओं को उनके आकार, प्रकार के हिसाब से वर्गीकृत किया जाता है और फिर जरुरतमंदों की मदद के लिए ग्रामीण इलाकों में भेज दिया जाता है। ग्रामीण महिलाओं के लिए गूंज हर महीने करीब दो लाख नैप्कीन बनाती और भेजती है, ताकि महिलाओं को अपने नियमित मासिक धर्म के दौरान अस्वच्छता का सामना न करना पड़े। यह सारा सामान ग्रामीणों को नि:शुल्क नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें उसके लिए सोशल वर्क करना होता है। जैसे सड़कों के गड्ढे भरना, कुएं खोदने में मदद करना और हस्तउद्योग के छोटे-मोटे उत्पाद तैयार करना। 21 राज्यों में गूंज संस्था के सहयोगी के रूप में 250 ग्रुप काम कर रहे है। इसके 10 कार्यालय है और 150 पूर्णकालिक कर्मचारी और हजारों स्वयंसेवक।

वर्तमान में गूंज का सालाना कारोबार करीब चार करोड़ रुपए है। करीब एक लाख रुपए रोज। इसमें से आधा पैसा उन्हें संस्था द्वारा उत्पादित सामग्री से मिलता है और बाकी सहयोग राशि के रूप में। अंशु गुप्ता बिना किसी की सलाह के अपना काम करते रहते है। उनका नारा है ‘लगे रहो’।

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