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गुस्से और शर्मिंदगी के अलावा हमारे पास है क्या? हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या बेहद अफसोसजनक है। इससे भी बढ़कर दुख की बात यह है कि लोग जिस तरह की छींटाकशी कर रहे हैं, मीडिया और सोशल मीडिया में जो कवरेज हो रहा है, वह समाज में बढ़ते जा रहे विभाजन की और इशारा कर रहा है। न तो किसानों की आत्महत्या को गंभीरता से लिया जा रहा है, न विद्यार्थियोंं की। हत्या के मामले में कोई व्यक्ति दूसरे की जान ले लेता है और आत्महत्या में खुद की। आत्महत्या भी हत्या ही है। फर्क बस इतना है कि आत्महत्या करने वाले को कोई सजा नहीं दी जा सकती। यहांं सजा पाता है पीड़ित का परिवार।

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मास मीडिया में रोहित वेमुला की आत्महत्या पर नित नए कवरेज आ रहे है। टीवी चैनलों के लिए रोहित वेमुला टीआरपी की भट्टी का र्इंधन है। विरोधियों के लिए रोहित सरकार को नीचा दिखाने का मुद्दा। इस बीच रोहित की आत्महत्या के लिए मंत्रियों और कुलपति को दोषी बताए जाने वाले आरोप-प्रत्यारोप भी हो रहे है। इसके ठीक उलट रोहित के जीवन पर भी जमकर छीछालेदार की जा रही है। यह सभी शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर एक ऐसा वर्ग है, जो खुलेआम कह रहा है कि रोहित की आत्महत्या कोई आत्महत्या नहीं है, बल्कि सीधी-सीधी हत्या है। हत्यारों के नाम पर एक विचारधारा को दोषी बताया जा रहा है। दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि मृतक गैरजिम्मेदार, अवसरवादी और अवसाद का शिकार था। अगर अवसाद का शिकार नहीं होता, तो आत्महत्या क्यों करता?

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सोशल मीडिया पर एक वर्ग मानता है कि रोहित वेमुुला प्रतिभावान विद्यार्थी था, वह विज्ञान लेखक बनना चाहता था। छात्रों में वह लोकप्रिय था। उसके विचार प्रगतिशील थे। विश्वविद्यालय में ही उसने आम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन बनाया था, जो अनेक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखता था। अगर उसने कोई अनुशासनहीनता की थी, तो उसे विश्वविद्यालय और होस्टल से बाहर निकालकर प्रताड़ित नहीं किया जाना था। विश्वविद्यालय में अनुशासन के बारे में इन लोगों की राय अलग है और इनका कहना है कि अनुशासन थोपने काम नहीं किया जाना चाहिए था।

सोशल मीडिया पर ही एक वर्ग जिस तरह से रोहित के खिलाफ विश्ववमन कर रहा है, वह चिंता का विषय है। एबीवीपी से जुड़े लोग लिख रहे है कि रोहित दलित नहीं था, बल्कि ओबीसी था। वह विवेकानंद को गाली देता था। वह कहता था कि जहां भी मुझे भगवा दिखेगा, मैं फाड़ डालूंगा। रोहित ने गौ-मांस पर पाबंदी के खिलाफ विश्वविद्यालय में गौ-मांस पार्टी का आयोजन किया था। जब याकूब मेमन को फांसी हुई थी, तब भी उसने अपने कुछ दोस्तों के साथ प्रदर्शन किया था और कहा था कि एक याकूब को फांसी पर लटकाओगे तो कई याकूब पैदा होंगे। वह मानता था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद याकूब मेमन की फांसी गलत थी। ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ नामक फिल्म के प्रदर्शन को लेकर भी रोहित काफी गंभीर था और फिल्म का प्रदर्शन उसके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था। फिल्म के प्रदर्शन के दौरान हुए हमले का उसने विरोध किया था और जुलूस भी निकाला था। रोहित को विश्वविद्यालय से निष्कासित करने का फैसला कुलपति ने विश्वविद्यालय की कार्य परिसर के साथ मिलकर किया था।

रोहित की आत्महत्या के विरोध में पूरे देश में एक तरह की लहर उठी। अशोक वाजपेयी जैसे साहित्यकार ने हैदराबाद विश्वविद्यालय द्वारा दी गई मानद डी.लिट. उपाधि लौटाने का ऐलान किया। विश्वविद्यालय के दलित छात्रों ने इस मामले में बड़ा आंदोलन किया है और वह जारी है। दिल्ली में भी इस आत्महत्या को लेकर गहमागहमी है। पूरे प्रकरण को दलित छात्रों की अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत और हिन्दू समाज में मृतकों के बारे में कुछ भी कहने के पहले सोचा जाता है। नकारात्मक बातें नहीं कहीं जाती, लेकिन सोशल मीडिया पर रोहित की आत्महत्या को लेकर जिस तरह की पोस्ट आ रही हैं, वे शर्मनाक है। तथाकथित हिन्दू क्रांति सेना के लोग लिख रहे है कि रोहित का ब्रेनवाश हो चुका था, वह ईसाई मिशनरियों और मुल्लों की कठपुतली बन गया था। उसका सारा खेल दलितों के हितों के लिए नहीं बल्कि अलगाववादियों के समर्थन को लेकर था। वह मुफ्तखोर था और उसकी मां कपड़े सी कर उसकी विलासिता की व्यवस्था करती थी। रोहित वेमुला कुंठित भटका हुआ और अवसरवादी छात्र नेता था।

सोशल मीडिया की शर्मनाक टिप्पणियों के बावजूद बहुजन समाज पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अनेक राजनैतिक संगठनों ने इस आत्महत्या को मुद्दा बनाकर अपनी रोटियां सेकना शुरू कर दिया था। इस मामले में किसी मंत्री को नहीं हटाया जा रहा है और न ही कुलपति को। दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे गंभीर मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। यहां तक कि उन्होंने कोई ट्वीट तक नहीं किया।

रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या किए जाने से पहले लिखे गए पत्र का अनुवाद..:

गुड मॉर्निंग

जब आप यह खत पढ़ रहे होंगे, तब मैं आपके पास नहीं होऊंगा। मुझसे नाराज मत होइएगा। मैं जानता हूं, आप में से कई लोग मुझे दिल से चाहते हैं, प्यार करते हैं और मेरा ख्याल रखते रहे हैं। मुझे किसी से शिकायत नहीं है। मुझे हमेशा खुद से समस्याएं रही हैं। मैं अपनी आत्मा और अपने शरीर के बीच के फासले को बढ़ता हुआ महसूस कर रहा हूं। मैं एक राक्षस बन गया हूं। मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था। कार्ल सेगन जैसा विज्ञान का लेखक। हालांकि अंत में, मैं सिर्फ यह खत ही लिख पा रहा हूं।

मैंने विज्ञान से, सितारों से और प्रकृति से प्यार किया, लेकिन यह जाने बगैर कि लोग कब का प्रकृति का साथ छोड़ चुके हैं। हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हैं। हमारा प्यार बनावटी है। हमारी मान्यताएं झूठी हैं। हमारी मौलिकताएं कृत्रिम हैं। वास्तव में अब यह असंभव हो गया कि बिना दुख पहुंचाए‌ किसी को प्यार किया जा सके।

एक इंसान की कीमत उसकी पहचान एक वोट… एक संख्या… एक वस्तु तक सिमट कर रह गई है। कोई भी क्षेत्र हो, अध्ययन में, राजनीति में, मरने में, जीने में, कभी भी एक व्यक्‍ति को उसकी बुद्धिमत्ता से नहीं आंका गया।

इस तरह का खत मैं पहली दफा लिख रहा हूं। आखिरी खत लिखने का यह मेरा पहला अनुभव है। अगर यह कदम सार्थक न हो पाए तो मुझे माफ कीजिएगा।

हो सकता है इस दुनिया, प्यार, दर्द, जिंदगी और मौत को समझ पाने में, मैं गलत था। कोई जल्दी नहीं थी, लेकिन मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता था। एक जिंदगी शुरू करने की हड़बड़ी में था। इसी क्षण में, कुछ लोगों के लिए जिंदगी अभिशाप है। मेरा जन्म मेरे लिए एक घातक हादसा है। अपने बचपन के अकेलेपन से मैं कभी उबर नहीं सका। अतीत का एक क्षुद्र बच्चा।

इस वक्त मैं आहत नहीं हूं… दुखी नहीं हूं, मैं बस खाली हो गया हूं। अपने लिए भी बेपरवाह। यह दुखद है और इसी वजह से मैं ऐसा कर रहा हूं। लोग मुझे कायर कह सकते हैं और जब मैं चला जाऊंगा तो स्वार्थी, या मूर्ख भी समझ सकते हैं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे क्या कहा जा रहा है। मैं मौत के बाद की कहानियों… भूतों या आत्माओं पर विश्वास नहीं करता। अगर किसी बात पर मैं विश्वास करता हूं तो वह यह है कि मैं अब सितारों तक का सफर कर सकता हूं। और दूसरी दुनिया के बारे में जान सकता हूं।

जो भी इस खत का पढ़ रहे हैं, अगर आप मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, तो मुझे सात महीने की फेलोशिप‌ मिलनी बाकी है जो एक लाख और 75 हजार रुपये है, कृपया ये कोशिश करें कि वह मेरे परिवार को मिल जाए। मुझे 40 हजार रुपये के करीब रामजी को देना है। उसने कभी इन पैसों को मुझसे नहीं मांगा, मगर कृपा करके ये पैसे उसे दे दिए जाएं।

मेरी अंतिम यात्रा को शांतिपूर्ण और सहज रहने दें। ऐसा व्यवहार करें कि लगे जैसे मैं आया और चला गया। मेरे लिए आंसू न बहाएं। यह समझ लें कि जिंदा रहने की बजाय मैं मरने से खुश हूं।

‘परछाइयों से सितारों तक’

उमा अन्ना, मुझे माफ कीजिएगा कि ऐसा करने के लिए मैंने आपके कमरे का इस्तेमाल कर रहा हूं।

एएसए (आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन) परिवार के लिए, माफ करना मैं आप सबको निराश कर रहा हूं। आपने मुझे बेहद प्यार किया। मैं उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं दे रहा हूं।

आखिर बार के लिए

जयभीम

मैं औपचारिकताएं पूरी करना भूल गया। मेरी खुदकुशी के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है।

किसी ने ऐसा करने के लिए मुझे उकसाया नहीं किया, न तो अपने शब्दों से और न ही अपने काम से।

यह मेरा फैसला है और मैं अकेला व्यक्ति हूं, जो इस सबके लिए जिम्मेदार है।

कृपया मेरे जाने के बाद, इसके लिए मेरे मित्रों और शत्रुओं को परेशान न किया जाए ।

21 Jan. 2016

02.37 PM

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