
(डॉ. शिव शर्मा हिन्दी साहित्य की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उज्जैन में निवास करने वाले डॉ. शिव शर्मा का यह छठा सिंहस्थ था। उन्होंने इस सिंहस्थ में क्या देखा, इसी की झलकियां- साभार)
यह मेरी आँखों देखी छठा सिंहस्थ था | इतनी तड़क भड़क ,इतनी चकाचौंध पहले कभी नहीं देखी | प्रदेश सरकार ने चार हजार करोड़ रु खर्च कर तीन हजार एकड़ भूमि पर नया स्मार्ट शहर बसा दिया था | यहाँ कभी छोटे –मोटे टेंट तंबुओं में लंगोटी लगाकर तपस्वी कठोर साधना करते थे वहां अब महलनुमा आकृति के करोड़ों के पांच सितारा महामंडलेश्वरों ने अपने वातानुकूलित पंडाल बना डाले जहाँ डीजे पर प्रवचनकारों के धुंआधार प्रवचन होते रहे | नागा साधुओं और निर्धन साधुओं के फटे हाल छोटे मोटे डेरे भी इस सिंहस्थ में दिखे |
सिंहस्थ में इस बार ग्लैमर का विशेष तडका नजर आया | वैसे तो पेशवाई सभी अखाड़ों की धूमधाम से निकली | हाथी, घोड़े, रथ, ऊंट और सुमधुर धुन बजाते बीस से अधिक बैडों की टोली पेशवाइयों में दिखी | पूरा शहर ही साधुमय एवं सिंहस्थमय दिखाई दिया | इस सिंहस्थ में विशेष रूप से दक्षिण भारत के स्वामी नित्यानंद, जो कि विवादों के कारण सदैव चर्चित रहे हैं, पहली बार सिंहस्थ में अपने पांच हजार देशी-विदेशी भक्तों के साथ उज्जैन में आये | उनकी पेशवाई में जब विदेशी भक्तों की टोली नाचते-गाते सड़कों से गुज़री तो लोगों में कौतुहल बढ़ा |
हमने भी सोचा कि गुपचुप रूप से जाकर उनके आश्रम की टोह लें | जिस रात्रि को हम उनके आश्रम गए, सूत्रों से पता चला कि दिन भर में एक लाख लोगों ने आश्रम में पैंतालीस देशों से लाई गयी मूर्तियों की प्रदर्शनी का अवलोकन किया है | स्वामीजी दिन भर अपने वातानुकूलित हाल में लगभग पांच हजार भक्तों के साथ योग एवं ध्यान में मग्न रहे | स्मरणीय है कि राज्य सरकार ने अपने सिंहस्थ के प्रचार पोस्टर में स्वामी जी के चित्र के साथ सिंहस्थ में आने का निमंत्रण छपवाया था और जब अखाड़े के साधु,संतों ने इसका विरोध किया तो उसे हटा लिया गया | तीन हजार व्यवस्थापकों के साथ सारी सुख सुविधाओं से उनका आश्रम परिपूर्ण था | हमने अपना परिचय गुप्त रखा किन्तु उनके सूचना तंत्र ने हमें ढूंढ निकाला |
मारीशस की उनकी एक शिष्या डा शायला ने हमें पूरा परिसर घुमाया और अंत में हमें कथित वीआईपी पंक्ति में खड़ा कर दिया | घंटे भर बाद हम मंच पर आसीन स्वामी नित्यानंद के समक्ष थे | हमारे आगे पीछे म. प्र. सरकार के मंत्रीगण एवं विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय नेता भी थे | हमने चलते चलते जुमला उछाला -- “ स्वामी जी आप अकेले संत हैं इस सिंहस्थ में, जो चौबीस घंटे मुस्कुराते रहते हैं, इसका राज क्या है ?”
स्वामी जी ने ठहाका लगाया और कहा -- "कल अलग से मिलें और चर्चा करें" | दूसरे दिन हम पुन उनके निजी कक्ष में पहुंचे और उनसे पूछा कि आप वैदिक जीवन की शैली की बात करते हैं , फिर ईतना वैभव प्रदर्शन क्यों ? स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा “ वैदिक संस्कृति भिक्षुक शैली की नहीं है | वैभव हमारी परंपरा का हिस्सा है “ | मैंने पूछा “ आप प्रवचन नहीं करते ,संवाद नहीं करते तो अपनी बात कैसे लोगों तक पहुंचाते हैं “ | उन्होने कहा “ यहाँ वर्षों से प्रवचन चल रहे हैं , कुछ बदला क्या “ | “ आपको हिन्दी नहीं आती और इस क्षेत्र के लोगों को अंग्रेजी , फिर आपसे मिलने इतने सारे लोग क्यों आते हैं ?” उन्होंने उत्तर दिया “ यह अंडर करंट है जो सब लोगों में दौड़ता रहता है | “ जब मैंने कहा कि मैं किसी अलौकिक सत्ता में विश्वास नहीं करता तो वे भी ठहाका लगा कर बोले “ मैं भी बाहरी सत्ता में नहीं स्वयं की शक्ति एवं आतंरिक ऊर्जा में विश्वास करता हूँ “ |
सदैव मुस्कुराते हुए स्वामी नित्यानंद ने पूर्ण विश्वास के साथ उत्तर दिए | विवादों से घिरे रहने वाले संत का यह आत्मविश्वास वास्तव में अद्भुत था | सिंहस्थ में देर रात तक इसी बल पर वे आश्रम आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से मिलते रहे |

डॉ. शिव शर्मा
-सी ४२, ऋषि नगर ,उज्जैन