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पत्रकार विजय मनोहर तिवारी की यह छठीं किताब है। अखबार और टीवी चैनल के लिए रिपोर्टिंग करते समय उन्होंने अपनी अलग दृष्टि विकसित की। यह किताब उनकी पुरानी किताबों से अलग हटकर है। इस किताब में उन्होेंने अपने अखबार के लिए की गई यात्राओं को आधार बनाया है। इन यात्राओं को वे समाचार के रूप में अपने अखबार के लिए लिखते रहे। उन्होंने जो लिखा वह लाखों लोगों ने पढ़ा। उनकी नई किताब भारत की खोज में मेरे पांच साल अखबार की उस रिपोर्टिंग से अलग और आगे की कहानियां है। उन्होंने 8 बार लगभग भारत भ्रमण किया और उसी में से चुनकर 25 कहानियां पुस्तकाकार में पेश की। इस तरह से ये कहानियां अखबार की रिपोर्टिंग का ही विस्तार कहा जा सकता है, लेकिन उससे बढ़कर है। अखबार में रिपोर्टिंग के दौरान सीमाएं रहती है। अखबार की अपनी नीति और शब्दों की सीमाएं। अपने निजी विचार पत्रकार वहां नहीं लिख पाता, लेकिन किताब निजी उपक्रम है। इसमें उनके विचार भी है और विचारधारा भी। संस्मरणात्मक तरीके से लिखी इस किताब में कुछ अध्याय एकदम निजी किस्म के है और कुछ राजनीति का मिजाज लिये हुए। इस किताब में राजनीति भी है और इतिहास भी, धर्म भी है और परंपराएं भी। समाज की हलचल और विकास की गतिविधियों के साथ ही आंदोलन के तार भी किताब को झंकृत करते है। आठ बार भारत घूमने वाले विजय मनोहर तिवारी ने पुस्तक की भूमिका ओल्ड जेरुशलम, इजराइल में क्यों लिखी, यह बात समझ से परे है। वे यह भूमिका फैजाबाद में भी लिख सकते थे और कन्याकुमारी में भी।

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25 कहानियों की शुरुआत फैजाबाद से शुरू होती है, जहां राम जन्मभूमि विवाद पर फैसले की घड़ी वाले दिन विजय मनोहर तिवारी साक्षी थे। अयोध्या में न्यायालय के फैसले वाले दिन क्या माहौल था, इसका शब्द चित्र उन्होंने अपनी किताब के पहले अध्याय में खींचा है। साथ ही बार-बार वे अतीत के झरोखे में भी ले गए। विजय मनोहर तिवारी ने राम जन्मभूमि विवाद में लालकृष्ण आडवाणी और कल्याण सिंह के साथ ही दो महत्वपूर्ण लोगों के संदर्भ भी दिए है। ये हैं राम जन्मभूमि न्यास ट्रस्ट के पूर्व प्रमुख रामचन्द्रदास महंत और हाशिम अंसारी। एक ही रिक्शा में बैठकर अदालत के चक्कर लगाने वाले ये दोनों शख्स दो विपरीत धुरियों पर थे। एक मंदिर का पक्षधर और दूसरा मस्जिद का पैरोकार। परमहंस का देहांत हो चुका है, लेकिन उनसे जुड़े संस्मरण विजय मनोहर तिवारी ने साझा किए है। बीच-बीच में विजय मनोहर तिवारी भारतीय इतिहास के स्याह पन्नों का भी जिक्र कर देते है, जो बेचैन करने वाले है। अयोध्या में ही उनके जेहन में गोधरा में जलती हुई ट्रेन का डिब्बा भी आता है।

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उत्तराखंड की वीरान पहाड़ियों को हरा-भरा करने की बात छिड़ती है, तो लोगों के दिमाग में सबसे पहले सुंदरलाल बहुगुणा और चंडीप्रसाद भट्ट का खयाल आता है। विजय मनोहर तिवारी ने अनुपम मिश्र से जानकारियां लेकर उत्तराखंड की यात्रा की और पाठकों को सच्चिदानंद भारती से मिलवाया, जो दशकों से उत्तराखंड में पानी को सहेजकर पहाड़ों को हरा-भरा बनाने के प्रयास कर रहे है। विजय मनोहर तिवारी किसी फिल्म के फ्लैशबेक की तरह हमें 1979 तक ले जाते है और पहाड़ी ढलान पर आकाश को चूमते पेड़ों की कहानी बयां करते है। जब आप पूरी कहानी समझने लगते हैं, तब लगता है कि बात इतना सीधी-सपाट नहीं है, बल्कि उसके पीछे वन विभाग के कारिंदों और करोड़ों के बजट और भ्रष्टाचार की भी है। श्री भारती 1990 से हर साल अपनी नर्सरी में कम से कम एक लाख पौधे तैयार करते है, जो देवदार, अखरोट, पद्म, बुरांश, उतीश, काफल और बांझ आदि के होते हैं। अनुमान है कि उन्होंने चालीस लाख से ज्यादा पौधे रोपे और उन्हें पेड़ बनाया। विजय मनोहर तिवारी ने उन्हें देवभूमि के देवता सही ही लिखा।

विजय मनोहर तिवारी ने भोपाल के पास एक गृहस्थ संत गुरुशरण से भी मिलवाया है, जिन्हें पंडोखर सरकार कहा जाता है। इस पूरे अध्याय को पढ़े तो अचरज होता है कि पत्रकार लोग भी किस तरह चमत्कारों से प्रभावित होते हैं। पंडोखर का अर्थ है पांडुओं का खेड़ा, जो पंडोखर हो गया। पंडोखर के रहने वाले पंडोखर महाराज हो गए।

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दक्षिण भारत की यात्रा पर गए विजय मनोहर तिवारी ने कर्नाटक के किंग मेकर जर्नादन रेड्डी के तिलिस्म की कहानी भी बताई। किस तरह एक कम पढ़ा-लिखा नौजवान आंध्रप्रदेश से कर्नाटक आकर बस गया और कर्नाटक में किंग मेकर की भूमिका में आ गया। यहां विजय मनोहर तिवारी ने पूरी बॉलीवुड की स्क्रिप्ट तैयार कर दी है, जिसमें भूमाफिया, राजनीति, भ्रष्टाचार, संघर्ष, वैभव, मीडिया मैनेजमेंट, धनबल और बाहुबल का चिट्ठा लिखा है। बिहार यात्रा पर गए विजय मनोहर तिवारी को नालंदा याद आ जाता है और वे सम्राट कुमार गुप्त (413-455) के समय पहुंच जाते है। कहानियों से कहानियां निकलती जाती है। पृथ्वीराज चौहान की पराजय, दिल्ली पर मोहम्मद गौरी का शासन, गुलामवंश का पहला सुल्तान, कुटुबुद्दीन एबक, बख्तीयार खिलजी सारे पात्र जमा हो जाते है। बीच में ब्रिटिश हुकूमत का आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का विभाग भी आता है और फिर नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से शुरू करने का भी। विजय मनोहर तिवारी नालंदा के बहाने बिहार की शिक्षा का अतीत पेश करते है। नालंदा विश्वविद्यालय से बाद में अर्मत्य सेन का नाम भी जुड़ा और कटा।

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विजय मनोहर तिवारी इतिहास के अध्येता है। इसीलिए पुस्तक में इतिहास के संदर्भ बार-बार आ जाते है। उत्तरप्रदेश के चालीस दिन के इलेक्शन कवरेज के दौरान विजय मनोहर तिवारी ने सिर्फ वहां चुनावी गतिविधियां ही नहीं देखी, वहां की राजनीति के पाठ भी समझे। उनके अनुसार जाति के गणित हमेशा स्कोर बढ़ाते रहते है। नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव और बहनजी यानी मायावती के बारे में बाते करते-करते विजय जी मेहमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद गाजी तक पहुंच जाते है। उत्तरप्रदेश की राजनीति समझते-समझते वे पाठकों को बता देते है कि बहराइच और श्रवस्थी का इतिहास क्या है। बहराइच की जंग इतिहास में एक अलग और चमकदार जगह रखती है, जहां अफगान, मुगल और तुर्क शासकों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की लड़ाई हुई थी। तुलसीदास की विनय पत्रिका और इब्न बतूता के डायरियों का जिक्र भी निकल आता है। इमाम बुखारी, बसपा का वोट बैंक, मुस्लिम विधायकों की संख्या, विनय कटियार, ग्रामीण इलाकों का पिछड़ापन कोई भी चीज विजय मनोहर तिवारी की निगाहों से बची नहीं। उत्तरप्रदेश में मंत्री लोग अपनी घरेलू शिक्षण संस्थाओं को ही भरपूर सरकारी अनुदान देते रहे हैं। 1400 साल पुरानी इस परंपरा का जिक्र करना यहां लाजिमी है, जब लूट के माल का बंटवारा विधि सम्मत तरीके से होता था। इसी के साथ पुस्तक में मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह जैसे नेताओं की खूबियां भी बहुत सलीखे से पेश की गई है।

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विजय मनोहर तिवारी अपनी यात्राओं में प्रसिद्ध मंदिरों में भी जाते रहे हैं। आंध्रप्रदेश गए, तो तिरुपति भी चले गए। चेन्नई गए, तो बैंगलोर भी, कांचीपुरम,मदुराई, श्रीरंगम्, तंजाबुर, रामेश्वरम् और कन्याकुमारी के मंदिरों में भी वे गए। एक गुमनाम से गांव तिरुमलाईकोडि केसरीपुरम तीर्थ का भी उन्होंने वर्णन किया। मंदिरों का वैभव, सफाई, पर्यावरण प्रेम कोई भी पहलू उनसे छूटा नहीं। वेल्लोर के लक्ष्मी मंदिर में डेढ़ हजार किलो सोने की कारीगरी है। चिदंबरम और त्रिची के मंदिरों का वर्णन भी है। शिर्डी के सांई बाबा मंदिर और मथुरा के कृष्ण मंदिरों का भी वर्णन है। वृंदावन जाते ही लेखक भावुक हो उठता है। कोलकाता से सवा सौ किलोमीटर दूर मायापुर के मंदिरों का भी जिक्र उन्होंने किया है और इस्कॉन के मंदिरों के वैभव का भी। मुंबई के लालबाग का राजा भी इसमें शामिल है और बंगाल के दुर्गा पूजा के पंडाल भी। खास बात यह है कि इन मंदिरों के साथ-साथ उस इलाके के इतिहास और राजनैतिक घटनाक्रम पर कमेंट्री भी देखने को मिलती है। विजय मनोहर जी का मानना है कि भारत की आत्मा इन्हीं मंदिरों में बसती है, चाहे रामेश्वरम और धनुषकोडि के मंदिर हो या केरल के पद्मनाथ स्वामी मंदिर।

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भगवान के मंदिरों के अलावा आधुनिक तीर्थों की बात की जाए, तो विजय मनोहर तिवारी ने भारत के नवनिर्माण के लिए देखे गए सपनों का भी जिक्र किया है, चाहे वह रालेगढ़ सिद्धी हो या बिहार के जयप्रकाश नारायण के खादी ग्राम। विनोबा और जेपी के बिना बिहार की बात नहीं हो सकती। भूदान का जिक्र किए बिना भारत के मनोविज्ञान को नहीं समझा जा सकता और किसानों की स्थिति को भी।

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विकास के नाम पर जिन इलाकों में कुछ काम नहीं हुआ, उन इलाकों की चर्चा भी पुस्तक में विस्तार से की गई है। उत्तरप्रदेश का फैजाबाद और श्रावस्ती हो या हरियाणा का झज्जर। मध्यप्रदेश का आलिराजपुर हो या बिहार में अरबल। पिछड़ेपन की दास्तान लगभग एक जैसी है। लेखक ने इसे माथे पर कलंक करार दिया है।

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ऐसा नहीं है कि पूरी किताब में निराशाजनक कहानियां ही है। इतिहास के पन्ने आशा-निराशा में डूबते-चढ़ते रहते है। धुंधलाते अतीत की चमकीली कहानियों के बहाने अटल बिहारी वाजपेयी, जाज फर्नांडीस, के.एस. सुदर्शन और दिलीप कुमार की जिंदगियों के भूले-बिसरे किस्से भी इस किताब में है। इंदिरा सागर बांध से होने वाले विस्थापन की कहानी भी इस किताब के साथ-साथ चलती है, जो हरसूूद के जलप्लावन पर जाकर भी नहीं रुकती।

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विजय मनोहर तिवारी ने ओशो, अरबिन्दो और विवेकानंद को तीन बेचैन आत्माएं बताया और लिखा है कि ये एक पुराने देश का नया परिचय देने वाली शख्सियतें हैं। प्रयाग के महाकुंभ का जीवंत वर्णन इस पुस्तक में है, जो अनेक फिल्मी कहानियों से भी बढ़कर लगती है। महाकुंभ को एक विराट रहस्य बताते हुए विजय मनोहर तिवारी बनारस के घाटों पर पहुंचा देते है और उत्तराखंड को देवभूमि के बजाय बांध भूमि कहना पसंद करते है।

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विजय मनोहर तिवारी ने इंदौर के एक परिवार की कहानी भी किताब में संजोई है, जिसमें अंतरजातीय विवाह की कहानी रोमांटिक अंदाज में बयां की गई है। यह कहानी पुस्तक से साभार लेकर एक वेबसाइट ने प्रकाशित की है। जिसमें ग्लैमर का तड़का भी है और नए भारत की झलक भी। विजयनगर की यात्रा का वर्णन बाखूबी किया गया है और मोदी के बारे में भी एक अध्याय लिखा गया है। किताब में कुछ व्यक्तिगत कहानियां भी है, जो लोगों ने अपनी हिम्मत और साहस से गढ़ी है। विजय मनोहर तिवारी ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नाकामियों का नेता निरूपित किया है। उत्तरप्रदेश की राजनीति में बढ़ते सांप्रदायिक विवाद को वे इसका कारण बताते है। चीन और म्यांमार से सटे अनोखे अरुणाचल प्रदेश की घाटियों में भी विजय मनोहर तिवारी पाठकों को लेकर जाते है। भारत के इस अनूठे राज्य में हिन्दी भाषी पत्रकार आमतौर पर नहीं जाते है।

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इस किताब में 65 रंगीन चित्र भी हैं, जो विभिन्न स्थानों पर लेखक के होने की गवाही देते हैं। पुस्तक के अंत में विजय मनोहर तिवारी ने एक इच्छा जाहिर की है कि यदि नियति उन्हें मौका दें, तो वे जिंदगी में एक बार और भारत का चक्कर लगाकर उन जगहों पर जाना चाहेंगे, जिसका जिक्र इस पुस्तक में है। वे उन किरदारों से मिलने की भी इच्छा रखते है, जिनसे वे इन पांच साल में मिले। तथास्तु!

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किताब : भारत की खोज में मेरे पांच साल

लेखक : विजय मनोहर तिवारी

प्रकाशक : इरा पब्लिकेशन, भोपाल

आईएसबीएन : 978-93-84056-02-5

पृष्ठ : 506

कीमत : 550 रुपए मात्र

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