
जाकिर नाइक की संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन सहित अनेक संस्थाओं पर विदेश से चंदा लेने और उसका राजनैतिक उपयोग करने पर केन्द्र सरकार की सख्ती बढ़ती जा रही है। इससे विदेशों से चंदा लेकर अपना कामकाज चलाने वाले 25 एनजीओ के सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई है, क्योंकि गृह मंत्रालय ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्यूलेशन एक्ट (एफसीआरए) के तहत इन एनजीओ की फंडिंग पर रोक लगा दी है। गृह विभाग के प्रवक्ता का कहना है कि इस तरह की फंडिंग ‘राष्ट्रीय हित में नहीं है’। गृह मंत्रालय ने इन एनजीओ की सूची अभी तक जारी नहीं की है, लेकिन माना जाता है कि इनमें से कई ऐसे संगठन है, जो मानव अधिकारों के लिए कार्य करते हैं।
विदेशी चंदा लेने पर लगी रोक से ये एनजीओ वाले सरकार से नाराज हैं। इनका कहना है कि सरकार के इस फैसले से मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठनों के सामने परेशानी खड़ी होगी। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल ने आरोप लगाया है कि गृह मंत्रालय ने जो फैसला किया है, वह अनुचित और तर्कपूर्ण है। अगर सरकार ने यह रोक लगाई है, तो उसे यह बताना चाहिए कि रोक किस कारण से लगाई गई है, एनजीओ पर क्या आरोप हैं।

सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ सोशल कंसंर्स (पीपुल्स वॉच) के एक प्रवक्ता के अनुसार एफसीआरए के अंतर्गत उनका विदेशी मुद्रा में चंदा लेने का लायसेंस नवीनीकरण से रोक दिया गया है। इस लायसेंस के बिना यह संस्था विदेशों से चंदा नहीं ले सकती। उसे भी चंदा रोकने का कोई कारण नहीं बताया गया। इसके पहले 2012 और 2013 में भी इस संस्था की विदेशी फंडिंग पर तीन बार रोक लगाई गई थी। इस संस्था का बैंक खाता में फ्रीज किया गया था। 18 महीने के संघर्ष के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश पर इस लायसेंस का नवीनीकरण किया गया। कई एनजीओ को गृह मंत्रालय की तरफ से सिर्फ एक लाइन का ई-मेल संदेश मिला है, जिसमें कहा गया है कि आपकी संस्था को मिलने वाला लायसेंस रोक दिया गया है।

गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ-साफ कहा है कि हमने 11 हजार 319 एनजीओ का एफसीआरए लायसेंस रोक दिया है क्योंकि इन्होंने 30 जून की डेड लाइन बीतने के बाद भी आवेदन नहीं किया। 1736 एनजीओ ने अपने दस्तावेजों के साथ शपथ पत्र जमा नहीं किया। इन्हें 8 नवंबर तक का मौका दिया गया था कि वे अपने दस्तावेज पेश कर दे, लेकिन फिर भी इन्होंने अपने दस्तावेज पेश नहीं किए।
सरकार के इस फैसले पर एनजीओ से जुड़े संगठनों का कहना है कि वर्तमान सरकार एफसीआरए का उपयोग राजनैतिक हथियार के रूप में अपने विरोधियों को दबाने के लिए कर रही है। जवाब में यह लोग सिर्फ यहीं कहते है कि उन्होंने ‘जनहित’ अथवा ‘राष्ट्रहित’ में यह निर्णय लिया है, इसके बारे में खुलकर बातें नहीं बताते। इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर जैसे जाने-माने वकीलों से जुड़े संगठन को भी एफसीआरए के तहत प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। यह संगठन तीस्ता सितलवाड़ और प्रिया पिल्लई जैसी सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन करता है। इन कार्यकर्ताओं ने गुजरात के कथित साम्प्रदायिक दंगों के बारे में सरकार की भूमिका पर बार-बार सवाल खड़े किए।

गृह मंत्रालय के फैसले के खिलाफ एनजीओ बार-बार कोर्ट में जाते है, जहां आमतौर पर उनके पक्ष में फैसले होते है। कोर्ट बार-बार यही दोहराते है कि सरकार इस कानून का राजनैतिक उपयोग बंद करे। इन सामाजिक कार्यकर्ताओं का अधिकार है कि वे जनता से जुड़े मुद्दों के बारे में दुनियाभर को जानकारी दें। ऐसे संगठनों के कार्यकर्ताओं को विदेश जाने से रोकने की वारदातें भी हुई है। एनजीओ से जुड़े संगठनों का कहना है कि सरकार से जुड़े इस फैसले से मानव अधिकारों का हनन होता है। ये मानव अधिकार हमारे संविधान द्वारा दिए गए है और उनका हनन किसी भी दशा में नहीं होना चाहिए। गृह मंत्रालय और भारत सरकार एनजीओ निगरानी रखे और वहां भ्रष्टाचार न होने दे, इस पर तो कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सरकार अपने अधिकारों का दुरूपयोग न करें। एनजीओ लगातार एफसीआरए को रद्द करने की वकालत भी करते रहते है, लेकिन सरकार ने मार्च में ही इस कानून में बदलाव किए है और यह बदलाव पिछली तारीखों से लागू किए गए है। ताकि विदेशी संस्थाएं और लोग भारत में राजनैतिक पार्टियों को चंदा न दे सके। चुनाव में विदेशी हितों की रक्षा की कोशिशें रोकी जाना गलत बात नहीं है, लेकिन एनजीओ को परेशानी का सामना करना पड़े, यह अच्छी बात नहीं है। एक तरफ तो सरकार तमाम आधारभूत उद्योगों में विदेशी निवेश को बढ़ावा दे रही है, दूसरी तरफ मानव अधिकार जैसे क्षेत्र में विदेशी सहयोग पर अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं छोड़ती।
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