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आदरणीय नंदनजी,

आपने ठाकुरप्रसाद सिंह का लेख ‘हिन्दी पत्रकारिता’ पर छापा है। यह बहस की शुरुआत है। मैं भी इसमें हिस्सा लेना चाहता हूं। मेरा ख्याल है कि हिन्दी पत्रकारिता में सम्पादक नदारत है। कितने अखबार या पत्रिकाएं पढ़ते वक्त आपको यह महसूस होता है कि इसकी एक-एक पंक्ति पर किसी की चौकन्नी निगाहें हैं।

पुराने अखबारनवीसों की शिकायत है कि इन दिनों अच्छे, नए लोग पत्रकारिता में नहीं आ रहे हैं।

हालांकि उसका जवाब यह नहीं है, लेकिन यह है भी कि क्या पत्रकारिता में आए सारे पुराने लोग योग्य थे? क्या भारतीय पत्रकारिता का बेड़ा गर्वâ करवाने में उनका कोई योगदान नहीं है?

अधिकांश पुराने पत्रकार इस पेशे में क्यों आए? शौक से या फिर मजबूरी से। दोनों ही स्थितियों में पत्रकारिता का भला मुश्किल है। पत्रकारिता अब शौक या पेशा नहीं है। अब यह सामाजिक तर्वâ है, जिसके सहारे जवाबदार विचारक एक सुपरिभाषित जीवनदर्शन का निर्माण करते हैं। इसीलिए नए लोग पत्रकारिता में हैं और उत्साह से काम कर रहे हैं। वे चाहते तो पीआरओ बन सकते थे, आकाशवाणी से चिपक सकते थे, मुदर्रिसी कर सकते थे।

कुछ लोगों का कहना है कि नई पीढ़ी के पत्रकारों का इतिहास से न जुड़ पाना चिन्ता का विषय है। यहां ‘इतिहासों’ से क्या आशय है? कई बूढ़े पत्रकार समझते हैं कि जीवन में त्याग करने से, केवल त्याग करने से ही पत्रकारिता का उद्धार हो जाएगा। पत्रकारिता आज बिना साधनों के संभव नही है। फिर पत्रकारिता एक तकनीक के रूप में आज है। उसे त्याग की ही नहीं, अक्लमन्दी और व्यवहारकुशलता की भी ज्यादा जरूरत है। यदि त्याग और तपस्या ही करनी हो तो साधु बन जाना बेहतर है।

युवा पत्रकारों को देखकर पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों के मन में निराशा होना अस्वाभाविक नहीं है। वे पाते हैं कि नए पत्रकारों में त्याग की भावना नहीं है, जो पुराने पत्रकारों में थी। इसीलिए वे पुराने पत्रकारों का हवाला देते हैं। वे समझते हैं कि पत्रकारों के लिए इतिहास का मतलब गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद माखनलाल चतुर्वेदी, बाबू विष्णु राव पराड़कर, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सम्पूर्णानंद, अंबिकाप्रसाद वाजपेयी, जयनारायण व्यास, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामराव सिंह हगल, रूनारायण पांडेय, बेचन शर्मा ‘उग्र’, लक्ष्मण नारायण गर्दे, प्रभागचंद शर्मा, अशोकजी आदि के बारे में जानना ही है।

हमारा इतिहास कायरता और पाखंड से भरा हुआ है। शक, हूण, पठान, मुगल, अंग्रेज तभी तो हम पर राज करके चले गए और इतिहास की इसी कायरता से हमने व्रूâरता सीखी। क्योंकि कायर आदमी हमेशा व्रूâर होता है। हम कभी बहादुर नहीं रहे, व्रूâर रहे और उस व्रूâरता का उपयोग हमने अपने ही समाज के कमजोर वर्गों पर करना शुरू कर दिया। व्रूâरता की शिकार महिलाएं, हरिजन और मजदूर होते रहे।

दरअसह आजादी के बाद पत्रकारिता का कोई लक्ष्य नहीं रह गया। वह शब्द व्यवसाय बन गई। नई-नई खोजों ने कम्पोजिंग और प्रिंटिंग की दुनिया ही बदल दी। इस कारण भी पत्रकारिता का व्यवसायीकरण हुआ। बड़ा अखबार निकालना करोड़पतियों के लिए ही संभव रह गया है। इससे भारतीय भाषाओं के छोटे पत्रों पर दबाव पड़ा, जबकि अंग्रेजी के अखबार अपने लक्ष्य में ज्यादा आगे बढ़े, क्योंकि नई खोजं में, खासकर फोटो वंâपोजिंग की प्रणाली अंग्रेजी में ज्यादा सुगम, खूबसूरत और बोधगम्य है।

युवा पत्रकार यदि चाहें भी तो वे अपना स्वतंत्र अखबार नहीं निकाल सकते। जो अखबार चला रहे हैं, उनमें से अधिकांश के प्रबंधकों का मानना है कि सम्पादक होने के लिए बड़ी नहीं तो कम से कम अधेड़ उम्र होना जररी है और वह प्रसिद्ध साहित्यकार तो होना ही चाहिए। नतीजा यह होता है कि सम्पादक बने साहित्यकार को पत्रकारिता तो आती नहीं, फिर अखबार को वह साहित्यिक बना नहीं सकता।

स्टेट्समैन के अंतिम अंग्रेज सम्पादक चार्लटन ने अपने विदाई भाषण में बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था, ‘भारत में अच्छे संवाददाताओं की कमी नहीं है। कमी है तो सिर्पâ सम्पादकों की। अभी भारत में पत्रकारिता के मंच पर उस महान सम्पादक का आना शेष है, जो अपने अखबार की प्रत्येक पंक्ति में अपने महान व्यक्तित्व का परिचय दे, जो अपने अखबार के प्रत्येक कर्मचारी की निष्ठा प्राप्त करें और जो सुबह की चाय पर पति-पत्नी के बीच की तकरार को टालने के लिए उन्हें अलग-अलग प्रति खरीदने के लिए विवश करें।

हिन्दी पत्रकारिता के सामने जो प्रमुख समस्याएं हैं, उनमें एक है- संपादक की ‘अनुपस्थिति’। कई अखबार और पत्रिकाएं पढ़ते वक्त हमें यह महसूस ही नहीं होता कि इस अखबार के दफ्तर में कोई ऐसा व्यक्ति भी बैठा है, जिसका काम सम्पादन करना है। सम्पादक काम काम केवल सम्पादकीय लिख देना। अखबार में क्या छ रहा है, इसके प्रति वह पूरी तरह से लापरवाह है। लगता है कि लेखकों ने रचनाएं भेजी हैं और वह छप रही हैं। समाचार एजेंसियों ने खबरें भेजी हैं और वह छप गई हैं। खबरों और लेखों में सम्पादक की तराशने की क्षमता नजर नहीं आती।

आज के अधिकांश सम्पादक सामान्य पाठक से एक सेन्टीमीटर ऊंचा सोचते हैं, लेकिन उनके नेतृत्व में जो चीज पाठक तक जाती है, वह पाठक के बौद्धिक स्तर से दस सेन्टीमीटर नीचे होती है। पत्रकारिता की मुख्यधारा से कटे हुए इन सम्पादकों ने मान लिया है कि हिन्दी के पाठकों का बौद्धिक स्तर अभी प्रौढ़ शिक्षा से ऊर नहीं उठा है। मनोरंजक सामग्री, घरेलू रख-रखां, फिल्मी आकर्षण, यही सब बच गया है पत्रकारिता मे्ं।

प्रतिभाों को खोजना और उन्हें प्रशिक्षित करना समदक की ही जवाबदेही है, लेकिन कितने समदक यह काम कर रहे हैं? अंग्रेजी अखबारों के साथ प्राय: खबरखोजी का नाम छपता है। है हिन्दी में ऐसा प्रोत्साहन? कौन जवाबदेह है?

आपका प्रकाश हिन्दुस्तानी
दिनमान, 18-24 जुलाई, 1982

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