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भारतीय विद्या भवन की पत्रिका नवनीत का जनवरी 2017 अंक बहुत ही विशेष लगा। नए साल के पहले अंक को उपहार अंक बनाने की परंपरा के तहत इसे साहित्य का विशेष उपहार बनाया गया है। आलेखों के अलावा धारावाहिक उपन्यास-अंश कहानियां, कविताएं, व्यंग्य और सांस्कृतिक समाचार का भी समावेश है। देश के जाने-माने साहित्यकारों को इसमें जगह मिली है और उपयोगी सामग्री को बहुत ही पठनीय तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

नवनीत के इस अंक में पूस की रात पर तीन कहानियां है। एक तो मुंशी प्रेम चंद की मशहूर कहानी ‘पूस की रात’। इसके अलावा लक्ष्मी शर्मा की ‘पूस की एक और रात’ और गंगा सहाय मीणा की ‘पूस की एक और...’। महान कथाकार प्रेमचंद की पूस की रात ग्रामीण भारतीय समाज के जीवन और मानसिकता को रेखांकित करती कहानी। हलकू और उसके कुत्ते जबरा के माध्यम से मानवीय संवेदनाएं उकेरती है। लक्ष्मी शर्मा की कहानी नगरीय पृष्ठ भूमि की है और २१वीं सदी के समाज की मानसिकता को बताती है। गंगा सहाय मीणा की कहानी पूस की सर्द रात में सर्दी से लड़ने की कहानी है, जिसमें भूरी सर्दी से लड़ती है और जीतती है, जबकि प्रेमचंद का हलकू अपने खेत गंवाकर राहत महसूस करता है कि उसे अब पूस की ठंडी रात में खेत पर नहीं सोना पड़ेगा, लेकिन प्रेमचंद ने हलकू और जबरा के रिश्तों को जिस तरह लिखा है, वह अपने आप में विलक्षण है।

नरेन्द्र कोहली के गीता पर आधारित ‘उपन्यास’ शरणम् की बारहवीं कड़ी भी इस अंक में है। इसे नरेन्द्र कोहली शुद्ध उपन्यास मानते है। नरेन्द्र कोहली को यह कला मालूम है कि कैसे भारत की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आधार बनाकर लिखा जाए। वे इतनी लोकप्रिय और चर्चित कहानियों के संदर्भ ढूंढते है कि पाठकों की जिज्ञासा अपने आप ही जागृत हो जाती है। प्रदीप सौरभ का उपन्यास-अंश ‘मुन्नी मोबाइल’, काशीनाथ सिंह का उपन्यास अंश ‘रेहन पर रग्घू’ तथा अखिलेश के उपन्यास ‘कटा हुआ चांद था कि आधा सूर्य’ के अंश भी दिलचस्प है।

राजकमल प्रकाशन हिन्दी की शब्द सम्पदा का एक अंश काल-चक्र भी नवनीत की शोभा बढ़ा रहा है, जिसमें विद्यानिवास मिश्र ने भारतीय काल गणना के बारे में लिखा है। रमेश उपाध्याय ने बदलते हुए समाज की बदली स्थितियों पर विजय कुमार ने कविता के सच पर, विनोद तिवारी ने उपन्यास के देश समाज पर प्रेम जन्मेजय में संवादहीनता और सुरेन्द्र लाल जी मेहता ने नई सृजनात्मक दिशाओं के बारे में लिखा है। सभी आलेखों के विषय सामयिक है और दिलचस्प भी।

नवनीत के इस उपहार अंक में हिन्दी के तीन शीर्षस्थ व्यंग्यकार शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी और यज्ञ शर्मा के व्यंग है और बसंत त्रिपाठी तथा सीमा आजाद की कहानियां है। यज्ञ शर्मा ने गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्र के नाम अपना संदेश दिया है। शरद जोशी ने भविष्य में चांद के इतिहास पर रोशनी डाली है और ज्ञान चतुर्वेदी 21वीं सदी की बाल भारती का वर्णन कर रहे है। चार पृष्ठों पर वाल्मीकि रामायण के अंश सरल हिन्दी अनुवाद के साथ पेश किए गए है।

गुलजार, वीरेन डंगवाल, हरीशचन्द्र पाण्डेय, अनूप सेठी, भगवत नारायण, कुंवर नारायण, राजेश जोशी, अरुण कमल, यतीन्द्र मिश्र, हरीश भदानी, अनिल जोशी और कुमार अंबुज की कविताएं इस अंक में है। ऐसा लगता है कि नवनीत का यह विशेष अंक केवल स्थापित रचनाकारों के लिए ही है। नई सदी के साहित्य पर संपादकीय के अलावा अशोक वाजपेयी, जितेन्द्र भाटिया, नंदकिशोर आचार्य और सुधा अरोड़ा के लेख हैं।

Vishvnat-Sachdeva

इतनी शानदार सामग्री के साथ ही इसमें लघुकथाएं भी हैं और सांस्कृतिक समाचार भी देखने को मिलते हैं। भारतीय विद्या भवन के संस्थापक, अध्यक्ष और कार्यकारी सचिव के संदेश पढ़कर ऐसा लगता है, मानो यह भारतीय विद्या भवन की स्मारिका हो। कविताओं की रंगीन और सचित्र प्रस्तुति मनमोहक है। 65 साल से प्रकाशित हो रही पत्रिका अभी भी अपनी सामयिकता बनाए हुए है। यह निश्चित ही उल्लेखनीय बात है, जिसका श्रेय धर्मयुग और नवभारत टाइम्स के संपादक रह चुके विश्वनाथ सचदेव को है, जो करीब 10 साल से नवनीत को लोकप्रियता के शिखर पर बनाए हुए हैं।

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