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'सम्पादक' की मौत हो गई है!

साफ कर दूँ- 'सम्पादक' नामक संस्था की मौत हो चुकी है। उस सम्पादक की, जिसके बारे में पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था- 'सम्पादक बनकर हम अपने गाँव, समाज, प्रदेश और देश की सेवा का व्रत लेते हैं' उस सम्पादक की भी, जिसके बारे में पं. विष्णु दत्त शुक्ल ने कहा था -'सम्पादक का कार्य प्रधान सेनापति के जैसा है, जो अपनी सेनायानी रिपोर्टर, उपसंपादक आदि सिपाहियों का नेतृत्व करता है और उनकी सुख-सुविधा और हथियारों का ध्यान भी रखता है।'

कौन हैं आज सम्पादक कौन होता है आज सम्पादक क्या काम होता है उसका म.जाक में कहें तो सम्पादक का काम यह देखना होता है कि कहीं कुछ प्रकाशन योग्य छप तो नहीं रहा! गोया सम्पादक का काम है प्रकाशन योग्य खबरों को हटाना! इस म.जाक के पीछे निश्चित ही यह भावना है कि एक सम्पादक को केवल वही प्रकाश्य सामग्री नहीं छाप देना है, जो उसके हाथ में आ गई है। उसे आजकल अपना, अपने प्रकाशन का और उससे भी बढकर अपने प्रकाशन समूह के अन्य उपक्रमों के हितों का ध्यान रखना होता है। भले ही इसमें प्रकाशन योग्य समाचारों का 'कत्ल' ही क्यों न करना पडे!

असली मालिक पाठक हैं÷समाचार पत्रों और मीडिया हाउस के मालिक भले ही व्यापारी, फर्म, कम्पनी या संगठन हों, उसका असली मालिक तो उसका पाठक/दर्शक/यू.जर ही है। पाठक ही है, जो अखबार को जिन्दा या मुर्दा रखता है। वही कई अखबारों को अर्श से फर्श पर ला पटकता है और वही पाठक है, जो एक छोटे से अखबार को बडा मीडिया साम्राज्य बना देता है। वही पाठक अखबार पढता और खरीदता है, जो विज्ञापन कम्पनियाँ इश्तहार देती हैं, बडे-छोटे उत्पादों का प्रचार होता है। पाठक वर्ग ही वर्गीकृत विज्ञापनों में खरीदना/बेचना से लेकर मैट्रिमोनियल्स तक के बारे में जानकारी लेता है और देता है। पाठक ही है, जो विज्ञापनों का रिस्पांस देता है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूरी इकॉनॉमी को संचालित करता है।'मालिकी' का संशययह सब जानते हैं कि किसी भी मीडिया हाउस का असली मालिक उसका पाठक/दर्शक/यू.जर है, लेकिन फिर भी कई संस्थानों में प्रबंधकों/मालिकों को यह गलतफहमी है कि उनके असली मालिक पाठक नहीं, बल्कि विज्ञापनदाता हैं। यहीं से गलतफहमियों की शुरूआत होती है। विज्ञापनदाता की दी हुई विज्ञापनी जानकारी 'खबर' के रूप में न केवल छपती है, बल्कि असली खबर का कत्ल भी कर देती है। मालिकों को यह पागलपन सवार हो जाता है कि विज्ञापन बडा है और खबर छोटी। विज्ञापन लानेवाला रूपया ला रहा है और पत्रकार रूपया खर्च कर रहा है। एड एज्युक्यूटिव महत्वपूर्ण है और रिपोर्टर उसकी तुलना में कम महत्वपूर्ण!अगर वास्तव में ऐसा है, तो सभी अखबारों में आठों कॉलम में, सभी पेज पर विज्ञापन ही क्यों नहीं छापते÷ अगर विज्ञापन कम हो तो पेज भी 4, 6, 8, 10 या 12 कर दो।

क्या आपने कभी देखा है कि विमान उडाने वाले पायलट से बुकिंग क्लर्क की तनख्वाह ज्यादा हो÷ क्या आपने किसी बैंक के मैनेजर की तनख्वाह कम और केशियर की तनख्वाह ज्यादा होने की बात सुनी है÷ दरअसल हमारे मीडिया मुगल अभी कई भ्रमजालों में फँसे हैं। वर्तमान मीडिया पर दो दबाववर्तमान में मीडिया जगत पर दो भारी दबाव है। (1) टेक्नॉलाजी का दबाव और (2) मीडिया के ही दूसरे माध्यम का दबाव।पहले टेक्नॉलाजी की बात! एक दौर था जब 15-20 हजार प्रतियाँ छपना और बिकना बडी बात थी। अखबार 8 पेज का हो गया तो समझो बहुत हो गया। पाठकों की प्रतिबद्धता थी और सरकार का समर्थन! न्यूजप्रिंट भी सस्ता था। लगभग हर जगह सरकारी सहायता थी- जमीन, बिजली, ट्रांसपोर्टेशन, डाक व्यवस्था- पत्रकार या प्रेस यानी रियायत का दौर! पत्रकार भी सेवाभावी थे, कम वेतन पर मिलते थे।नतीजा था, कुल मिलाकर कास्ट कम थी। आज रियायतों का दौर खत्म हो चुका है। न्यू.जप्रिंट इम्पोर्ट करना पड रहा है। टेक्नॉलॉजी महँगी है, न्यू.ज गैदरिंग का खर्चा अनापशनाप है। इस पर भी बा.जार की माँग है गति और क्वालिटी। ब्लैक एण्ड व्हाइट पेपर के दिन लद गए। अखबारों में ग्राफिक्स, फोटोग्राफ्स और डि.जाइन के विशेषज्ञ भी शामिल हुए और अखबार एक प्रॉडक्ट में तब्दील हो गया, जिसका लक्ष्य ज्यादा पाठक तैयार करने से बढकर ज्यादा टर्नओवर करना हो गया।दूसरा दबाव एक मीडिया का दूसरे मीडिया पर प्रभाव को लेकर कहा जा सकता है।

आज सारे अखबार टी.वी. चैनल की तरह और तमाम टीवी चैनल अखबार की तरह होना चाहते हैं। टीवी की न्यू.ज के कारण अखबारों के पाठकों के मन में खबरों की प्याज बढी है और अखबारों की सुर्खियों ने टीवी चैनल को लोकप्रिय बनाया है। इसी का असर है कि कुल विज्ञापन व्यय का एक बडा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जाने के बावजूद दोनों ही माध्यम खूब फल फूल रहे हैं, क्योंकि टोटल वाल्यूम में इजाफा हो गया है।नये नेतृत्व का उदयबदले हालात में सम्पूर्ण मीडिया जगत में नये नेतृत्व का उदय हुआ है। यह नया नेतृत्व प्रबंधन, संपादन, टेक्नॉलॉजी, फाइनेंस, कोआर्डिनेशन का जानकार है। इसे वैसे ही लोग अब चाहिए जो सभी विधाओं में तालमेल बैठाकर बेहतर परिणाम दे सकें। जिस लीडर में अब ये सभी गुण समाहित नहीं होंगे वह लीडर अब उतना प्रभावशाली नहीं रह सकेगा। यहाँ शायद सम्पादक की तुलना सेनापति से सही लगती है, क्योंकि सैनिकों की शक्ति, हथियार, युद्धनीति, टेक्नॉलॉजी, सपोर्टिंग टीम सभी जगह बदलाव हो रहा है। इन तमाम बदलावों को अंगीकार करते हुए जो लीडर दस रुपए का अखबार एक-दो रुपए में लाखों लोगों को दिला सकता है, वही असली सम्पादक साबित होगा। यहाँ फिर दोहराना चाहक्तँगा कि अखबार का असली मालिक उसका पाठक और सिर्फ पाठक ही होता है।

- प्रकाश हिन्दुस्तानी

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