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मध्यप्रदेश में बिहार जैसी अराजकता नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसा आतंक नहीं है। पं. बंगाल जैसी श्रम संगठनों की दादागिरी नहीं है। उत्तरप्रदेश जैसी विशाल आबादी नहीं हैं, लेकिन फिर भी जब उद्योगों के क्षेत्र में कुछ क्रांति कर दिखाने की बात होती है, तब महाराष्ट्र और गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु हमसे आगे निकल जाते हैं। गोआ जैसा छोटा-सा राज्य मध्यप्रदेश की बराबरी करता नजर आता है। फिर भी जब मध्यप्रदेश को सबसे आगे ले जाने का दावा किया जाता है, तब लगता है कि कोई दिवास्वप्न तो नहीं दिखाया जा रहा है? अतिश्योक्ति तो नहीं हो रही?


जब भी मध्यप्रदेश के विकास की बात होती है, यह बात हमें

आश्वस्त करती है कि प्रकृति हमारे साथ है। कोई बड़ा अन्याय प्रकृति ने मध्य्रदेश के साथ नहीं किया है। देश के ह्रदयस्थह में है यह राज्य। हर ्राकृतिक सम्पदा से भरापूरा। बाढ़ यहां की स्थायी समस्या नहीं, न सूखा स्थायी है। सीमा से दूर होने से सैन्य सुरक्षा की भी जरुरत नहीं। बांग्लादेशी, नेपाली, श्रीलंकाई या पाकिस्तानी यहां सीधे-सीधे नहीं घुसते। भूवंâप का खतरा कम है। ज्वालामुखी नहीं फट पड़ते, लेकिन फिर भी हम उद्योगों के क्षेत्र में, विकास के मामले में देश के पहले नंबर के राज्य नहीं हैं।

मध्यप्रदेश में बिहार जैसी अराजकता नहीं है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसा आतंक नहीं है। पं. बंगाल जैसी श्रम संगठनों की दादागिरी नहीं है। उत्तरप्रदेश जैसी विशाल आबादी नहीं है, लेकिन फिर भी जब उद्योगों के क्षेत्र में कुछ क्रांति कर दिखाने की बात होती है, तब महाराष्ट्र और गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु हमसे आगे निकल जाते हैं। गोआ जैसा छोटा-सा राज्य मध्यप्रदेश की बराबरी करता नजर आता है। फिर भी जब मध्यप्रदेश को सबसे आगे ले जाने का दावा किया जाता है, तब लगता है कि कोई दिवास्वप्न तो नहीं दिखाया जा रहा? अतिश्योक्ति तो नहीं हो रही?

सम्पूर्ण औद्योगिकी विकास के लिए जरूरी ढांचा मध्यप्रदेश मेंं अभी पूरी तरह तैयार नहीं कहा जा सकता। जितनी सुविधाएं महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में उद्योगों की स्थापना के लिए उपलब्ध हैं, उतनी मध्यप्रदेश में नहीं। समुद्री तट से दूर होने का नुकसान भी मध्यप्रदेश को है और केन्द्र में मध्यप्रदेश का उचित नेतृत्व भी मध्यप्रदेश के अपेक्षाकृत पिछड़े रहने का कारण है। आजादी के बाद मध्यप्रदेश के नेताओं ने राज्य के विकास के लिए वैसा संघर्ष भी शायद नहीं किया, जैसा कि अन्य राज्यों में होता रहा है। सस्ता श्रम यहां जरूर उपलब्ध रहा है, लेकिन उस श्रम की गुणवत्ता वह नहीं रही, जो अपेक्षित थी। कुशल श्रमिकों का पलायन होता गया और न ही उद्योगों के लिए जरूरी भौतिक संसाधन आसान दर पर उपलब्ध कराए जा सके।

बिजली की ही बात लें। जुलाई १९९५ से जून १९९६ तक ११ महीनों के भीतर बिजली की दरें करीब २५ प्रतिशत बढ़ाई जा चुकी हैं। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल की आय का ७५ प्रतिशत हिस्सा उच्च दाव उपभोक्ताओं से मिलता हैं, लेकिन उन्हें केवल आठ घंटे ही बिजली प्रदाय की जाती हैं। राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली सप्लाय की दशा बेहद खराब है।

मध्यप्रदेश में उद्योगों को रोजाना ६-७ घंटे ही बिजली दी जा रही है। वह भी रात के १२ बजे के बाद। महाराष्ट्र में जो उद्योग रात को १२ बजे के बाद बिजली का उपयोग करते हैं, उन्हें २० प्रतिशत छूट दी जा रही है। मध्यप्रदेश में पिछले ६ साल में एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जबकि उद्योगों को पूरे एक दिन बिजली प्रदाय की गई हो। गुजरात ने बिजली के प्रदाय में होने वाली दिक्कतों का सामना करने के लिए सप्ताह में चार दिन और पांच दिन बिजली देने की व्यवस्था की है, ताकि श्रम शक्ति बर्बाद न हो। मध्यप्रदेश में आज आधे इस्पात कारखाने बिजली की कमी के कारण बंद पड़े हैं। बिजली की क्वालिटी भी मध्यप्रदेश में समस्या है। उसमें लगातार उतार-चढ़ाव होते रहते हैं।

हाल ही में एक पत्रिका और एक सर्वेक्षण वंâपनी ने इस बात की पड़ताह की कि उद्योगों की स्थापना करने के लिहाज से अभी देश का कौन सा राज्य बेहतर है। सर्वे में मध्यप्रदेश को उद्योग लगाने के लिहाज से पांचवां आदर्श राज्य कहा गया। यह बात तो सुखकर लगती है, लेकिन जब हर राज्य में उद्योग लगाने की खूबियों के नंबर दिए गए, तब प्रथम स्थान पाने वाले महाराष्ट्र को ११९.९४ अंक मिले और मध्यप्रदेश को मात्र २.८५ अंक ही। जब आधारभूत आवश्यकताओं, श्रमिकों की मौजूदगी, कानून व्यवस्था, प्रशासन का प्रभावी होना, बिजली की उपलब्धता और क्वालिटी, श्रम संबंधों, कार्य संस्कृति आदि की बातें होती हैं, तब मध्यप्रदेश को कोई भी प्रमुख स्थान प्राप्त नहीं होता। अर्थात कोई भी व्यक्ति यह बात दावे से नहीं कह सकता कि मध्यप्रदेश में कोई एक चीज जो सघन उद्योगों के लिए जरुरी है, बहुत आसानी से उपलब्ध है।

आज जबकि उदारीकरण का लाभ उठाने में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु सबसे आगे हैं, मध्यप्रदेश पिछड़-सा गया है। इतने बड़े राज्य की व्यवस्था भी एक ऐसा कार्य हैं, जिसमें सरकार और प्रशासन को भारी शक्ति लगानी पड़ रही है। बंदरगाह तो यहां है ही नहीं, कोई आधुनिकतम हवाई को हवाई पट्टी से जोड़ने जा रहा है, मध्यप्रदेश के सभी संभाग भी हवाई उड़ानों से नियमित नहीं जुड़ पाए हैं।

सर्वेक्षण में पाया गया कि मध्यप्रदेश में आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या का प्रतिशत कई राज्यों से ज्यादा है। इस कारण उन क्षेत्रों में व्यवस्था पर शासकीय खर्च ज्यादा होता है। आदिवासी इलाकों में सरकारी सुविधाएं राजनीतिक कारणों से भी मुहैया कराई जा रही हैं। जिनका खर्च भी कुल मिलाकर सभी उद्योगों को भुगतना पड़ रहा है। पत्रिका के सर्वे के मुताबिक यहां के उद्योगों को सरकारी संरक्षण और सहयोग में पांचवां स्थान है। राजनीतिक स्थिरता में मध्यप्रदेश देश का सातवें नंबर का राज्य है और बिजली के प्रदाय में इक्कीसवें नंबर पर है।

मध्यप्रदेश सरकार उद्योगों को बढ़ाने में जो प्रोत्साहन दे रही हैं, वे भी दूसरे कई राज्यों की तुलना में कम प्रतीत होते हैं। महाराष्ट्र ने बीसी जैन और डी औद्योगिक क्षेत्रों में उद्योगों की स्थाना के लिए नकदी प्रोत्साहन की व्यवस्था अब तक जारी रखी है। कई क्षेत्रों में आक्ट्राय वापसी की भी व्यवस्था महाराष्ट्र में है, जबकि मध्यप्रदेश में ये व्यवस्थाएं छितराई हुई-सी हैं। मध्यप्रदेश में कृषि आयातित उद्योग, ऑटोमोबाइल उद्योग इलेक्ट्रॉनिक, पूâड प्रोसेसिंग, पेट्रोकेमिकल्स और दूरसंचार क्षेत्र के उद्योगों की अनंत संभावनाएं हैं, लेकिन वे संभावनाएं अभी पूरी तरह भुनाई हीं जा रही हैं।

मध्यप्रदेश में पर्यटन के विकास की संभावनाएं भी प्रबल हैं, लेकिन सरकार उतनी सतर्वâ नहीं है। तभी तो होटलों पर बिजली की दरें ज्यादा थोपी गई हैं। होलों से २४ प्रतिशत स्टेट ड्यूटी के नाम पर वसूले जा रहे हैं। ऐसी अव्यवस्था में होटल उद्योग का विस्तार आसान नहीं लगता।

मध्यप्रदेश को आगे आना ही होगा और इसके लिए उसे दूरगामी नीति नियोजन करना होगा। सरकारी नीतियों में सुधार तो चाहिए ही, आधारभूत ढांचा भी सुव्यवस्थित करना होगा। यह सब सरकारी मदद के बिना संभव नहीं है। अगर मध्यप्रदेश ने उद्योगों के लिए जरूरी हालात पैदा कर लिए, तो निश्चित ही हमारे नेताओं को बंबई या सिंगापुर जाकर उद्योगपतियों को आमंत्रित करने की जरुरत नहीं पड़ेगी।

-प्रकाश हिन्दुस्तानी
(कार्पोरेट विजन 2000 : दैनिक भास्कर का विशेष प्रकाशन)

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