
ब्रजेश कानूनगो ने व्यंग्य के साथ कविताएं और लघु कहानियां भी लिखी हैं। बाल गीतों और बाल कथाओं के लेखन में भी उनका हस्तक्षेप है। वैसे तो यह उनकी नौवीं किताब है, लेकिन व्यंग्य संग्रह तीसरा ही है। पुस्तक की भूमिका में ब्रजेश कानूनगो ने लिखा है कि जिन बातों को व्यंग्यकार मूल्यहीनता और विसंगति मानता है, दरअसल अब नई संस्कृति और नए मूल्य के कारण ये विसंगतियां अजब रूप लेने लगी है। ब्रजेश कानूनगो ने यह बात स्वीकार की है कि उनके व्यंग्य लेखन के मूल में अखबारों में प्रकाशित होने वाले लोकप्रिय स्तंभों की भूमिका रही है। उनके व्यंग्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होते रहे है। वे मानते है कि अगर मेरे लिखे से किसी का मन बहल जाए। आंसु की कुछ बूंदे झलक पड़े, दिल में कोई छोटी सी टीस उठ जाए या कोई ठहाका लगा दें, तो उनका लिखना सार्थक है। साहित्य के ५६ पकवानों में इसीलिए उन्होंने मेथी की भाजी भी परोस दी है। इस तरह यह किताब मेथी पर करेला हो गई है।
ब्रजेश कानूनगो ने एक बड़ा ही दिलचस्प व्यंग्य लिखा है ‘वॉट्सएप पर साहित्य’। इस व्यंग्य में उन्होेंने लिखा कि लोग किस तरह फेसबुक पर ताजा स्टेटस पोस्ट करने के बाद लाइक करने वाले मित्रों की संख्या और नामों की गिनती करते है और वाट्सएप पर समूह बनाकर अपनी रचनाओं का प्रचार-प्रसार करते हैं। व्यंग्यकार ने ‘डिजिटल भरोसा नामक’ एक व्यंग्य में डिजिटल हो जाने की घटनाओं के बारे में भी विस्तार से लिखा है। उनके अधिकांश व्यंग्य में साधुराम नामक एक पात्र है, जो हर हालात का मजा लेते है, चिढ़ते है और प्रतिक्रिया भी देते है।
‘भौंकने और काटने पर एक विमर्श’ शीर्षक व्यंग्य में उन्होंने एक जोरदार बात लिखी है कि कलेक्टर भौंकता है और एसपी काटता है। अखबारों में छपने वाले श्रद्धांजलि वाले पृष्ठ पर प्रकाशित होने वाले मोटाभाई काला की याद में भी उन्होंने व्यंग्य लिखा है, जो हंसाता और गुदगुदाता है। ‘पीटना, बजाना, ठोकना, कूटना, वगैरह...!’ शीर्षक व्यंग्य में उन्होंने लिखा है कि दीवाली या शुभ अवसर पर लोग घर आकर ताली कूटते है, वह ताली बजाना नहीं होता, तालियां जनसभा में बजाई जाती है। संगीत को सम्मान देने वाले ताली नहीं बजाते, वह करतल ध्वनी करते है। स्कूल में बच्चे माट साब के आने के पहले टेबलें पीटा करते थे, गुरूजी जिस छात्र को ऐसा करते पकड़ लेते, वे उसे ही पीट देते। पीटने के इस लोकाचार में कूटना और लोकभाषा में इसे बजाना कहा जाता है। ढोल पीटा जाता है और नगाडा बजाया जाता है। अपनी-अपनी बांसुरी सभी लोग बजाते रहते है।
ब्रजेश कानूनगो सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय है और सोशल मीडिया पर आने वाले व्यंग्य के विषय भी उनकी इस संग्रह में झलक गए है। प्रधानमंत्री पर निबंध, रात के आतंकवादी, आलू की पैâक्ट्री का सपना, स्मार्टनेस और इमोजी, कविता में अलंकार, पथभ्रष्ट जूता, बस्ती में मगरमच्छ जैसे लोकप्रिय विषयों को भी उन्होंने छुआ है। साथ ही बढ़ते शहरीकरण के कारण जगह-जगह बनाए जाने वाले बायपास को भी उन्होंने अपने व्यंग्य का विषय बनाया है। ‘हंगामें का संस्कार’ व्यंग्य में उनकी लिखी एक बात बहुत ही अर्थपूर्ण है। यह बात है - दरअसल व्यापमं संस्था नहीं, संस्कार है।
पुस्तक : मेथी की भाजी और लोकतंत्र (व्यंग्य संग्रह)
लेखक : ब्रजेश कानूनगो
प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
मूल्य : 100 रुपए