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थाईलैण्ड के फुकेट में रहने वाले एक निर्दयी बाप ने अपनी 11 महीने की बेटी को एक पुरानी खाली पड़ी बिल्डिंग की छत से फांसी पर लटकाकर मार डाला और उसका फेसबुक पर सीधा प्रसारण भी कर दिया। बाद में उस निर्दयी बाप का शव भी बेटी के शव के पास ही मिला। फेसबुक पर यह सारा घटनाक्रम 24 घंटे तक देखा जाता रहा। बाद में फेसबुक के प्रवक्ता ने एक समाचार एजेंसी को ई-मेल पर खेद प्रकट किया और लिखा कि यह एक भयावह हादसा था। फेसबुक पर इस तरह के कंटेंट के लिए कोई जगह नहीं है। पिछले हफ्ते ही फेसबुक पर अमेरिका के क्लीवलैंड का एक लाइव स्ट्रीमिंग वीडियो जारी हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गोली से निशाना बना रहा था। फेसबुक वाले कहते रह गए कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर हिंसक और वीभत्स पोस्ट तथा लाइव स्ट्रीमिंग को रोकने की तैयारी कर रहे हैं और दुनिया ने फेसबुक पर वह सब देखा, जो देखना नहीं चाहिए था।

जिस हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार को पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1924 में घनश्याम दास बिड़ला से 50 हजार रुपए चंदा लेकर डूबने से बचाया था, चर्चा है कि उसे 2017 में उद्योगपति मुकेश अंबानी ने पांच हजार करोड़ में खरीद लिया है। यह भी कहा जा रहा है कि 1 अप्रैल 2017 से हिन्दुस्तान टाइम्स का ‘जियोकरण’ हो रहा है। यानी अखबार कुछ दिनों के लिए फोकट में बंटेगा। विज्ञापनों से जो आय होगी, उसी में अंबानी गुजारा कर लेंगे। साथ ही वे पांच हजार करोड़ को 25 हजार करोड़ बनाने की जुगत में भिड़ेंगे।

श्योपुर (ग्वालियर) में एक दैनिक अखबार के संवाददाता दशरथ सिंह के साथ स्थानीय एडीएम ने जो बर्ताव किया, वह आंचलिक पत्रकारों की समस्याओं को उजागर करता है। दशरथ सिंह श्योपुर में जन समस्याओं को अपने अखबार में उजागर करते रहे हैं। इन जन समस्याओं के उजागर होने से स्थानीय अधिकारियों के लिए वे एक चुनौती बन गए। स्थानीय अधिकारियों को उस वक्त बहुत अच्छा लगता है, जब पत्रकार उनके द्वारा किए गए कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर अपने अखबार में स्थान देते रहते हैं, लेकिन जैसे ही पत्रकार उनकी नाकामियों के बारे में लिखते हैं, स्थानीय अधिकारी बदले की भावना पर उतर आते है। ये अधिकारी इतने निरंकुश हो चुके है कि वे अपने आगे कानून को भी कुछ नहीं समझते है और मानते है कि आजकल के बादशाह वहीं है।

शाहरुख खान और रईस फिल्म की हीरोइन माहिरा खान को पाकिस्तान से बड़ी उम्मीदें थी। एक से बढ़कर एक भारतीय हीरोइनों को दरकिनार कर पाकिस्तान की माहिरा खान को इस फिल्म में लेने का एक मकसद यह भी था कि माहिरा के नाम पर ही फिल्म पाकिस्तान में अच्छा कारोबार कर जाएगी। भारत में पाक कलाकारों के विरोध के कारण माहिरा का रोल छोटा करना पड़ा और वह भारत में रईस के प्रमोशन में भी शामिल नहीं हो सकी। पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर लगा बैन हटा ही था और काबिल रिलीज हुई ही थी और 5 फरवरी को रईस भी पाकिस्तान में रिलीज होने की आशा थी, लेकिन पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को पाकिस्तान के सिनेमाघरों में दिखाने की अनुमति नहीं दी। अगर पाकिस्तान के अखबार डॉन की खबर को सही मानें, तो पाकिस्तान सेंसर बोर्ड ने रईस का प्रदर्शन रोकने के तीन कारण बताए है। पहला फिल्म की कहानी में इस्लाम को कमतर दिखाने की कोशिश की गई है। फिल्म में मुसलमानों को अपराधी के रूप में दिखाया गया है और तीसरी बात फिल्म में मुस्लिम पात्र को दंगाई और आतंकवादी के रूप में दिखाने की कोशिश की गई है।

श्री रमेशचन्द्र अग्रवाल बेहद व्यावसायिक बुद्धि के धनी व्यक्ति तो थे ही, लेकिन इसके साथ ही वे बेहद सहज और सरल व्यक्तित्व के धनी भी थे। उनसे मिलने पर जिस सहजता से वे बातें करते थे, उससे यह कभी एहसास नहीं होता था कि वे फोर्ब्स की सूची में भारत के 100 सबसे धनी और शक्तिशाली लोगों में से एक है। एक प्रसिद्ध भारतीय पत्रिका ने उन्हें भारत के 50 सबसे ताकतवर लोगों में शामिल किया था। इसके बाद भी वे अपने समाचार पत्र समूह के लोगों से बेहद सादगी से मिलते थे। सैकड़ों कर्मचारियों को वे उनके नाम से जानते थे और उनके निजी सुख-दुख में भी शामिल होते थे। अग्रवाल महासभा के प्रमुख आधार स्तम्भ होने के नाते उन्होंने अपने समाज के लोगों के लिए भी बहुत से कल्याण के कार्य किए। इन कल्याण के कार्यों में समाज की लड़कियों को आगे ले जाने का काम प्रमुख है।

भारतीय विद्या भवन की पत्रिका नवनीत का जनवरी 2017 अंक बहुत ही विशेष लगा। नए साल के पहले अंक को उपहार अंक बनाने की परंपरा के तहत इसे साहित्य का विशेष उपहार बनाया गया है। आलेखों के अलावा धारावाहिक उपन्यास-अंश कहानियां, कविताएं, व्यंग्य और सांस्कृतिक समाचार का भी समावेश है। देश के जाने-माने साहित्यकारों को इसमें जगह मिली है और उपयोगी सामग्री को बहुत ही पठनीय तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

पुण्य तिथि ( 9 अप्रैल )
(श्री राजेन्द्र माथुर का यह फोटो 1982 का है और यह उन्होंने नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बनने पर बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी के एच आर विभाग के आग्रह पर दफ्तर में जमा करने के लिए खिंचवाया था.)
मैंने राजेन्द्र माथुर जी के साथ दो पारियों में काम किया। पहले नईदुनिया और बाद में नवभारत टाइम्स में। आज उनके बिना हिन्दी पत्रकारिता को 31 साल हो गए हैं।जब राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता के संसार से विदा हुए, तब इंटरनेट और मोबाइल चलन में नहीं थे। सोशल मीडिया और वाट्सएप मीडिया भी नहीं था। टीवी के इतने प्राइवेट चैनल भी नहीं थे। पत्रकारिता मूल रूप से प्रिंट तक ही सीमित थी और प्रिंट में भी पत्रकारिता की अलग-अलग शाखाएं थी। राजेन्द्र माथुर के दौर में पत्रकारिता में जिस तरह के बदलाव हो रहे थे, अब उससे अलग तरह के बदलाव हो रहे है। ये बदलाव तेज गति वाले है, किसी आंधी या तूफान की तरह। जिस बात को हम हिन्दी पत्रकारिता में दस साल पहले सत्य मानते थे, अब वह कहीं नजर नहीं आती और आज हम जिस पत्रकारिता को देख रहे है, वह पांच साल बाद अलग होगी।

अगर आप निकट भविष्य में अमेरिका जाना चाहते है, तो सोशल मीडिया पर सोच-समझकर कमेंट कीजिए। यह नहीं कि जो मन में आया फेसबुक पर पोस्ट कर दिया या ट्विटर पर शेयर कर दिया। ट्रम्प प्रशासन को लगता है कि सोशल मीडिया पर कमेंट्स के जरिए भी लोग गोपनीय सूचनाएं जेहादियों तक पहुंचा रहे है। इसी के साथ ही अमेरिकी एयरपोर्ट पर अब वहां के आव्रजन अधिकारी आपके मोबाइल में दर्ज फोन नंबर की जानकारी भी पूछ सकते हैं। आपने जिन-जिन के नाम सेव किए हो, भले ही उन से बात हुई हो या ना हो, उन लोगों के बारे में भी पूछताछ की जा सकती है।

पता नहीं सुभाष चंद्रा रूपर्ट मर्डोक को अपना आदर्श मानते हैं या नहीं, लेकिन यह बात तय है कि उनका काम करने का तरीका रूपर्ट मर्डोक से काफी मिलता-जुलता है। दोनों ही मीडिया के महारथी है और मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया पर छा जाना चाहते हैं। दोनों का काम करने का तरीका ऐसा है कि वे आकाश के मार्ग से किसी भी देश में प्रवेश करते है और वहां के टेलीविजन चैनलों और दूसरे माध्यमोें पर शिकंजा कस लेते है। दोनों की जिंदगी की कई बातें समान है। सुभाष चंद्रा रूपर्ट मर्डोक की तुलना में 19 बैठते है, तो इसका कारण यह है कि वे कारोबार के मैदान में बाद में आए। हो सकता है कि मर्डोक की उम्र तक आते-आते वे उससे काफी आगे निकल जाएं।

दीवालियेपन की कगार पर खड़ी मध्यप्रदेश सरकार नशाबंदी का कदम उठाती नाटक करती नजर आ रही है। नर्मदा किनारे के शराब के ठेके रद्द करना और राजमार्गों के पास से शराब की दुकानें हटाना इसकी शुरूआत है। मध्यप्रदेश सरकार की आय का एक प्रमुख स्त्रोत है आबकारी से होने वाली आय। पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश सरकार वैसे ही आर्थिक दीवालियेपन की कगार पर है। जनकल्याण के कामों पर खर्च करने के लिए उसके पास धन नहीं है। कर्ज पर कर्ज, ओवरड्राफ्ट पर ओवरड्राफ्ट, टैक्स वृद्धि पर टैक्स वृद्धि और फिर भी सरकार की घोषणाओं पर अमल का पैसा नहीं। ऐसे में शराबबंदी का रास्ता चुनना मध्यप्रदेश के लिए मुश्किल नजर आ रहा है। शराब व्यावसायियों की लॉबी भी मध्यप्रदेश की राजनीति में प्रमुख रोल निभा रही है, लेकिन अगर बीजेपी और आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को यह लगेगा कि शराबबंदी से मध्यप्रदेश में चुनाव जीता जा सकता है, तो यह सरकार इस बारे में फैसला लेने में हिचकेगी नहीं। हो सकता है कि गुजरात, बिहार, नागालैंड और मणिपुर के अलावा मध्यप्रदेश वह राज्य बन जाए, जहां शराबबंदी हो।