सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल. दत्तू ने कहा है कि भीख मांगने और वेश्यावृत्ति करने को अपराध मानना ठीक नहीं। इसका अर्थ यहीं हुआ कि भीख मांगना और वेश्यावृत्ति करने को कानूनी रूप से मान्यता मिल जाए और यह भी एक धंधा मान लिया जाए। कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति मजबूरी में ही यह धंधे करने के लिए बाध्य होता है। अब यह बात अलग है कि यह दोनों ही धंधे मुनापेâ के धंधे बन गए है। अच्छे खासे ह्रष्ट-पुष्ट लोग भीख मांगते या मंगवाते पाए गए है और वेश्यावृत्ति भी योग्यता से अधिक आसानी से कमाई का जरिया बन चुकी है।

मेरी निजी वेबसाइट पत्रकारिता के गुरु श्री राजेन्द्र माथुर को समर्पित। 23 साल पहले यह साइट अंग्रेजी में लांच की थी। हिन्दी के पहले वेबपोर्टल वेबदुनिया डॉट कॉम के संस्थापक कंटेंट एडीटर के रूप में भी तमन्ना थी कि साइट हिन्दी में होती तो बेहतर होता। करीब पांच साल पहले यह वेबसाइट हिन्दी में भी बनी और अब उसे नए रूप में पेश करते हुए मुझे खुशी हो रही है।
'सम्पादक' की मौत हो गई है!
साफ कर दूँ- 'सम्पादक' नामक संस्था की मौत हो चुकी है। उस सम्पादक की, जिसके बारे में पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था- 'सम्पादक बनकर हम अपने गाँव, समाज, प्रदेश और देश की सेवा का व्रत लेते हैं' उस सम्पादक की भी, जिसके बारे में पं. विष्णु दत्त शुक्ल ने कहा था -'सम्पादक का कार्य प्रधान सेनापति के जैसा है, जो अपनी सेनायानी रिपोर्टर, उपसंपादक आदि सिपाहियों का नेतृत्व करता है और उनकी सुख-सुविधा और हथियारों का ध्यान भी रखता है।'
इंदौर वह शहर है जहां से हिन्दी पत्रकारिता पुष्पित-पल्लवित हुई है। इंदौर से आज हिन्दी के नईदुनिया, दैनिक भास्कर, चौथा संसार, नवभारत टाइम्स, इंदौर समाचार, स्वदेश, विश्वभ्रमण, अवंतिका, दस्तक, प्रभातकिरण (सांध्य दैनिक), अग्निबाण (सांध्य दैनिक) और अंग्रेजी दैनिक प्रâी प्रेस और गढ़ा क्रानिकल के अलावा करीब दो सौ से भी अधिक साप्ताहिक अखबार निकलते हैं। दैनिक भास्कर का पूरे देश में विस्तार इंदौर आगमन के बाद ही हुआ। नईदुनिया ऑफसेट प्रिंटिंग के जरिए छापा जाने वाला तो पहला हिन्दी दैनिक है ही, नईदुनिया ने ही सबसे पहले कम्पोजिंग की कम्प्य्टूर आधारित पद्धति अपनाई थी। नईदुनिया ही इंदौर का पहला दैनिक है, जो इंटरनेट पर पाठकों को उपलब्ध हुआ।
३६ साल पहले हम गांधीजी से बिछुड़ गए थे। वह देश के बापू थे, पर जो लोग उनसे खून का रिश्ता रखते थे या रखते हैं, आजकल वे क्या कर रहे हैं? वे क्या-क्या हैं, यह पूरे तौर पर जानना तो मुश्किल है, लेकिन जितना हम जान पाए, वह दिलचस् जरूरी है। गांधीजी के चार बेटे थे- हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास। गांधीजी खुद भले ही राष्ट्रभाषा या क्षेत्रीय भाषाओं की वकालत करते रहे हों- उनके सभी बेटों की अनौपचारिक या औपचारिक तालीम अंग्रेजी में हुई।
मध्यप्रदेश में बिहार जैसी अराजकता नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसा आतंक नहीं है। पं. बंगाल जैसी श्रम संगठनों की दादागिरी नहीं है। उत्तरप्रदेश जैसी विशाल आबादी नहीं हैं, लेकिन फिर भी जब उद्योगों के क्षेत्र में कुछ क्रांति कर दिखाने की बात होती है, तब महाराष्ट्र और गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु हमसे आगे निकल जाते हैं। गोआ जैसा छोटा-सा राज्य मध्यप्रदेश की बराबरी करता नजर आता है। फिर भी जब मध्यप्रदेश को सबसे आगे ले जाने का दावा किया जाता है, तब लगता है कि कोई दिवास्वप्न तो नहीं दिखाया जा रहा है? अतिश्योक्ति तो नहीं हो रही?
आदरणीय नंदनजी,
आपने ठाकुरप्रसाद सिंह का लेख ‘हिन्दी पत्रकारिता’ पर छापा है। यह बहस की शुरुआत है। मैं भी इसमें हिस्सा लेना चाहता हूं। मेरा ख्याल है कि हिन्दी पत्रकारिता में सम्पादक नदारत है। कितने अखबार या पत्रिकाएं पढ़ते वक्त आपको यह महसूस होता है कि इसकी एक-एक पंक्ति पर किसी की चौकन्नी निगाहें हैं।
पुराने अखबारनवीसों की शिकायत है कि इन दिनों अच्छे, नए लोग पत्रकारिता में नहीं आ रहे हैं।
हालांकि उसका जवाब यह नहीं है, लेकिन यह है भी कि क्या पत्रकारिता में आए सारे पुराने लोग योग्य थे? क्या भारतीय पत्रकारिता का बेड़ा गर्वâ करवाने में उनका कोई योगदान नहीं है?
अधिकांश पुराने पत्रकार इस पेशे में क्यों आए? शौक से या फिर मजबूरी से। दोनों ही स्थितियों में पत्रकारिता का भला मुश्किल है। पत्रकारिता अब शौक या पेशा नहीं है। अब यह सामाजिक तर्वâ है, जिसके सहारे जवाबदार विचारक एक सुपरिभाषित जीवनदर्शन का निर्माण करते हैं। इसीलिए नए लोग पत्रकारिता में हैं और उत्साह से काम कर रहे हैं। वे चाहते तो पीआरओ बन सकते थे, आकाशवाणी से चिपक सकते थे, मुदर्रिसी कर सकते थे।