
वे शाम के अखबार के सम्पादक हैं लेकिन मोबाइल नहीं रखते. उनके पास टीवी भी नहीं है क्योंकि वे टीवी देखना पसंद नहीं करते। वे फेसबुक पर नहीं हैं, ट्विटर पर भी नहीं। लिंक्डइन या इंस्टाग्राम पर भी उनका खाता नहीं है। मीडिया में हैं, पर सोशल मीडिया में नहीं। कार है पर सिटी बस से दफ़्तर जाते-आते हैं। कार के हॉर्न का उपयोग किये महीनों हो गये उन्हें। हॉर्न को समाज के प्रति अपराध मानते हैं; 'नो हॉर्न, ओके?' मोबाइल और टीवी के बिना उनका काम कैसे चलता है, यह पूछने पर कहते हैं कि मैं रेडियो पर ख़बरें सुनता हूँ; कम्प्यूटर पर न्यूज़ की साइट्स और ईपेपर पढ़ता हूँ।

पत्रकार विजय मनोहर तिवारी की यह छठीं किताब है। अखबार और टीवी चैनल के लिए रिपोर्टिंग करते समय उन्होंने अपनी अलग दृष्टि विकसित की। यह किताब उनकी पुरानी किताबों से अलग हटकर है। इस किताब में उन्होेंने अपने अखबार के लिए की गई यात्राओं को आधार बनाया है। इन यात्राओं को वे समाचार के रूप में अपने अखबार के लिए लिखते रहे। उन्होंने जो लिखा वह लाखों लोगों ने पढ़ा। उनकी नई किताब भारत की खोज में मेरे पांच साल अखबार की उस रिपोर्टिंग से अलग और आगे की कहानियां है। उन्होंने 8 बार लगभग भारत भ्रमण किया और उसी में से चुनकर 25 कहानियां पुस्तकाकार में पेश की। इस तरह से ये कहानियां अखबार की रिपोर्टिंग का ही विस्तार कहा जा सकता है, लेकिन उससे बढ़कर है। अखबार में रिपोर्टिंग के दौरान सीमाएं रहती है। अखबार की अपनी नीति और शब्दों की सीमाएं। अपने निजी विचार पत्रकार वहां नहीं लिख पाता, लेकिन किताब निजी उपक्रम है। इसमें उनके विचार भी है और विचारधारा भी। संस्मरणात्मक तरीके से लिखी इस किताब में कुछ अध्याय एकदम निजी किस्म के है और कुछ राजनीति का मिजाज लिये हुए। इस किताब में राजनीति भी है और इतिहास भी, धर्म भी है और परंपराएं भी। समाज की हलचल और विकास की गतिविधियों के साथ ही आंदोलन के तार भी किताब को झंकृत करते है। आठ बार भारत घूमने वाले विजय मनोहर तिवारी ने पुस्तक की भूमिका ओल्ड जेरुशलम, इजराइल में क्यों लिखी, यह बात समझ से परे है। वे यह भूमिका फैजाबाद में भी लिख सकते थे और कन्याकुमारी में भी।

(डॉ. शिव शर्मा हिन्दी साहित्य की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उज्जैन में निवास करने वाले डॉ. शिव शर्मा का यह छठा सिंहस्थ था। उन्होंने इस सिंहस्थ में क्या देखा, इसी की झलकियां- साभार)
यह मेरी आँखों देखी छठा सिंहस्थ था | इतनी तड़क भड़क ,इतनी चकाचौंध पहले कभी नहीं देखी | प्रदेश सरकार ने चार हजार करोड़ रु खर्च कर तीन हजार एकड़ भूमि पर नया स्मार्ट शहर बसा दिया था | यहाँ कभी छोटे –मोटे टेंट तंबुओं में लंगोटी लगाकर तपस्वी कठोर साधना करते थे वहां अब महलनुमा आकृति के करोड़ों के पांच सितारा महामंडलेश्वरों ने अपने वातानुकूलित पंडाल बना डाले जहाँ डीजे पर प्रवचनकारों के धुंआधार प्रवचन होते रहे | नागा साधुओं और निर्धन साधुओं के फटे हाल छोटे मोटे डेरे भी इस सिंहस्थ में दिखे |

पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार ने पिछले दिनों एक विदेशी चैनल के टिप्पणीकार को उद्घृत करते हुए लिखा कि सीएनएन पत्रकारिता के विरुद्ध अपराध है और फॉक्स न्यूज विफल पत्रकारिता। डॉ. मुकेश कुमार ने इसी संदर्भ में भारतीय मीडिया को भी दो भागों में बांटा है। टीवी चैनलों के बारे में उन्होंने लिखा कि अगर भारत में इसकी बात करें, तो ज़ी न्यूज पत्रकारिता के विरुद्ध अपराध है और इंडिया टीवी विफल पत्रकारिता। करीब सौ लोगों ने मुकेश कुमार की इस टिप्पणी से सहमति जताई और अनेक ने उसे सटीक करार दिया। एक पोस्ट में तो लिखा गया था कि भारत में चैनलों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है-
- भाट-चारण चैनल, चमचा चैनल, भक्त चैनल, भड़भड़िया चैनल, छू लगाने वाला चैनल, अंग्रेजी का भौ-भौ चैनल, हुआ-हुआ चैनल, मिस इन्फॉर्म चैनल, बेगैरत चैनल।
यह दौर वाट्सएप पत्रकारिता का है। प्रिंट, रेडियो, टीवी और इंटरनेट पत्रकारिता शायद पुराने दौर के माध्यम हो गए है। इंटरनेट के आने के बाद टेली प्रिंटर वाली न्यूज एजेंसियों का पूरा कारोबार ठप पड़ गया है। न्यूज एजेंसियों ने भी टेली प्रिंटर की जगह इंटरनेट को अपना लिया है। वाट्सएप अब न्यूज गेदरिंग का सबसे सस्ता, आसान और सुलभ टूल बन गया हैं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस तो 21 जून को है, लेकिन उसके दो दिन पहले 19 जून से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजन शुरू हो रहे हैं। 19 जून को रविवार है और यह सुविधाजनक हैं कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस रविवार को मना लिया जाए। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की तैयारियां दुनियाभर में हो रही है और न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वेयर से लेकर चंडीगढ़ तक विशेष आयोजनों की धूम रहेगी। कछ संस्थाएं तो इसके बाद भी आयोजन जारी रखेंगी। गत वर्ष 31 जून को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया था। तब दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ 35 हजार 985 लोगों ने दिल्ली में एक साथ योग करके रेकॉर्ड बनाया था। इस बार भारत का मुख्य आयोजन दिल्ली की जगह चंडीगढ़ में होने वाला है। प्रधानमंत्री चंडीगढ़ में ही योग करेंगे।

समय 25 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर मेरी पुस्तक का विमोचन इंदौर प्रेस क्लब में हो रहा था, तब इस बात का पूरा अंदाज था कि जिस तूफानी गति से नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया है, उसी तूफानी गति से वे सरकार भी चलाएंगे। ‘चाय वाले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी : एक तिलिस्म’ शीर्षक से प्रकाशित मेरी यह किताब 25 मई को ही विमोचित हो गई थी, जबकि नरेन्द्र मोदी उसके एक दिन बाद 26 मई को शपथ लेने वाले थे। इस किताब में नरेन्द्र मोदी की चुनावी रणनीति का वर्णन था। हिन्दी में अपने वर्ग की यह बेस्ट सेलर किताब साबित हुई और इसके बाद अनेक भाषाओं में नरेन्द्र मोदी पर सैकड़ों किताबें प्रकाशित हुई। इस किताब के कारण कई लोगों को लगा कि मैं नरेन्द्र मोदी के प्रचार के लिए कार्य करता हूं, जो बिलकुल भी सही नहीं था। वास्तव में किताब पढ़े बिना ही कई लोगों की आदत होती है कि वे लेखक के बारे में धारणाएं बना लेते हैं। मेरी यह किताब पत्रकारीय नजरिये से लिखी गई थी, जिसे अच्छी सराहना प्राप्त हुई।

‘दाग अच्छे हैं’ यह एक वाशिंग पावडर का विज्ञापन कहता है। दुर्भाग्य से इसे पत्रकारों ने भी अपना लिया है। अब दागदार होना पत्रकारिता में कोई बुरी बात नहीं मानी जाती। हद तो यह है कि अब दागदार लोग अपने दागदार होने पर फख करते हैं। दागदारों को विशेष सम्मान देने की कोशिश की जा रही है। ताजा उदाहरण है तरुण तेजपाल का।

19 मई को पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद मीडिया में जिस तरह की रिपोर्टिंग हो रही है, उससे लगता है कि मीडिया ने निष्पक्षता से सोचना ही बंद कर दिया है। अब तो मीडिया भी जुमलेबाजी करने लगा है। तथ्यों को मनचाहे तरीके से विश्लेषित करके ऐसे परोसा जा रहा है, मानो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नामो-निशान मिट गया है।

उज्जैन में सिंहस्थ का मेला 21 मई को सम्पन्न हो गया। इस मेले में अनेक साधु-महात्माओं ने आकर क्षिप्रा स्नान किया और धर्म-पताकाएं फहरार्इं। अधिकांश साधु-संत उज्जैन आकर बिना प्रचार के अपने अनुष्ठान सम्पन्न करके वापस अपने-अपने आश्रमों में जा चुके हैं। इस बार सिंहस्थ में कुछ ऐसे साधु भी आए, जिन्होंने अपने वैभव का अश्लील प्रदर्शन किया। इनमें से कई तो ऐसे थे, जो पहले ही तमाम स्कैंडल्स के कारण कुख्यात थे। इस सिंहस्थ में उन्होंने अपने कुख्याति का झंडा गाड़ा।

विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढ़ाई बाबा आदम के जमाने की शैली में हो रही है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को मीडिया के ग्लैमर का झांसा देकर फंसाया जा रहा है। पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद जब वे विद्यार्थी पेशे में जाते है, तब उन्हें निराशा हाथ लगती है। बेहतर वेतन और आत्म संतुष्टि वाली नौकरियां तो शायद ही कहीं बची हो। वर्षों तक पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम सैद्धांतिक ज्यादा होता है और व्यावहारिक कम। विद्यार्थियोें को तकनीकी ज्ञान के नाम पर अधिकांश जगह केवल खानापूर्ति हो रही है। तकनीक के सही ज्ञान के बिना भारत के अधिकांश पत्रकार पनामा लीक्स या विकिलीक्स जैसा कोई खुलासा नहीं कर सकते।