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बचपन में स्कूल में लगभग हर निबंध की शुरूआत की जाती थी- ‘‘भारत एक कृषि प्रधान देश हैं।’’ अब अगर निबंध लिखना हो तो लिखा जा सकता है कि भारत एक महोत्सव प्रधान देश है। यहां हर घटना एक महोत्सव होती हैं। बड़े से बड़े आयोजन करने की कोशिश की जाती है। आयोजक व्यक्ति हो या संस्था, राजनैतिक पार्टी हो या धार्मिक संगठन, सभी लोग गिनीस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड तोड़ने और बनाने में लगे हैं। इसमें नया नाम जुड़ रहा है श्री श्री रविशंकर का, जो 11 से 13 मार्च तक विश्व संस्कृति महोत्सव करने जा रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस 'सांस्कृतिक ओलिंपिक' महोत्सव को अनुमति दे दी है, लेकिन 5 करोड़ रुपये का जुर्माना भी किया है.

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सभी धर्म शांति और भाईचारे का संदेश देते हैं। ऐसा कहने के बाद भी कुछ ऐसी घटनाएं होती है, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसी ही एक घटना ठाणे की है, जहां एक नौजवान ने अपने ही परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी और खुद फांसी पर लटक गया। एक दूसरा मामला पाकिस्तान का है, जहां 15 साल के एक लड़के ने पैगम्बर साहब के प्रति असम्मान दिखाने वाले अपने ही हाथ को काटकर इमाम के सुपुर्द कर दिया।

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भारत मेंं समाचार-पत्र उद्योग की चर्चा समीर जैन के बिना नहीं हो सकती। इसी तरह भारत के हिन्दी समाचार-पत्रोंं की बात भी सुधीर अग्रवाल के बिना करना मुश्किल है। ऐसा लगता है कि आज जो समीर जैन हैं, सुधीर अग्रवाल वहीं बनना चाहते हैं। वैसे भी सुुधीर अग्रवाल समीर जैन के अनुयायी हैं। जो कुछ समीर जैन करते हैं, सुधीर अग्रवाल भी करते हैं। सुधीर अग्रवाल का फॉर्मूला है- फॉलो द लीडर। इस फॉर्मूले का फायदा यह है कि इसमें जोखिम नहीं  रहता और कामयाबी की गुंजाइश ज्यादा रहती है। लेकिन जितनी लंबी दाढ़ी समीर जैन के पेट में है, शायद सुधीर अग्रवाल के पेट में नहीं। लीडर की नकल करने के सारे फॉर्मूले कामयाब ही हो, जरूरी नहीं। अगर ऐसा होता, तो डीएनए मुंबई का नंबर-टू अखबार जरूर होता। डीएनए का लक्ष्य मुंबई का नंबर-वन अखबार बनना रहा होगा और कल्पना होगी कि अगर नंबर-वन नहीं बन पाए, तो कोई बात नहीं नंबर-टू तो बन ही जाएंगे।

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zeeLogoप्रिय ज़ी न्यूज़,

(मेरा इस्तीफा इस देश के लाखों-करोड़ों कन्हैयाओं और जेएनयू के उन दोस्तों को समर्पित है जो अपनी आंखों में सुंदर सपने लिए संघर्ष करते रहे हैं, कुर्बानियां देते रहे हैं.)

विश्वदीपक

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गुस्से और शर्मिंदगी के अलावा हमारे पास है क्या? हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या बेहद अफसोसजनक है। इससे भी बढ़कर दुख की बात यह है कि लोग जिस तरह की छींटाकशी कर रहे हैं, मीडिया और सोशल मीडिया में जो कवरेज हो रहा है, वह समाज में बढ़ते जा रहे विभाजन की और इशारा कर रहा है। न तो किसानों की आत्महत्या को गंभीरता से लिया जा रहा है, न विद्यार्थियोंं की। हत्या के मामले में कोई व्यक्ति दूसरे की जान ले लेता है और आत्महत्या में खुद की। आत्महत्या भी हत्या ही है। फर्क बस इतना है कि आत्महत्या करने वाले को कोई सजा नहीं दी जा सकती। यहांं सजा पाता है पीड़ित का परिवार।

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जो पाकिस्तानी मीडिया भारत की हर बात पर प्रशंसा करता रहता था, उसका रूख बदला हुआ है। जो पाकिस्तानी मीडिया कहता था कि भारत एक महाशक्ति है और पाकिस्तान उसके आगे बिल्ली का बच्चा। जो पाकिस्तानी मीडिया कहता था कि भारत की हिन्दी, बॉलीवुड, भारत का क्रिकेट, भारत की विदेश और रक्षा नीति, भारतीय प्रधानमंत्री की दुनियाभर में लोकप्रियता और एनआरआई लोगों का दुनियाभर में दबदबा बना हुआ है, वह पाकिस्तानी मीडिया अब सुर बदल रहा है। एक पाकिस्तानी अखबार में व्यंग्य छपा है- पाकिस्तान ने सात दशक पुरानी कश्मीर की मांग वापस ले ली है और अब मांग की है कि भारत कश्मीर के बजाय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय उसके हवाले कर दे।

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नौकरी के लिए जो इंटरव्यू होते है, उनमें अमूमन बेतुके सवाल पूछे जाते है। जैसे बस कंडक्टर के इंटरव्यू में पूछा जाता था- अमेरिका के विदेश मंत्री का नाम बताओ। अब अमेरिका के विदेश मंत्री का नाम जानने या न जानने से कंडक्टरी का क्या ताल्लुक? कंडक्टर का इंटरव्यू देने वाले से अगर पूछा जाता कि यात्रियों से कैसा बर्ताव होना चाहिए या इतने सारे लोगों से रूबरू होते हुए भी शांतचित्त कैसे बना रहा जा सकता है? अच्छा ही हुआ कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनेक पदों पर भर्ती के लिए इंटरव्यू की परंपरा ही खत्म कर दी। 

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 (मैं न तो 'बुद्धिजीवी' हूँ और न 'भक्त।'  मुझे न तो 'जुमले' आते हैं और न ही 'आरती।'  इन दो प्रजातियों के अलावा भी भारत में लोग हैं जो न तो गिरोहों के साथ हैं, न ही पंथ विशेष के साथ !)

मुझे जेएनयू मामले में कहना है कि हाँ, जेएनयू मामले में राजनीति हो रही है। होगी ही। यह मामला यह मामला इतना बड़ा है कि आगामी चुनाव में यह सरकार बनाने-बिगाड़ने का काम कर सकता है ! इसमें बीजेपी चारो कोने चित्त हो सकती है या उसके बल्ले बल्ले भी हो सकते हैं. जेएनयू की चिंगारियां राख के ढेर में दबी रहेंगी और चुनाव के वक़्त फिर धधकेंगी ही। इस मामले में राजनीति तो होनी ही है। इतनी नाजुक नस को दबाने वाले गुट का दांव बहुत ही सोचा समझा था। इसके पीछे कौन हैं, असली इरादा क्या रहा होगा; इस पर बहुत बयानबाजी हो चुकी है। मैं अभी इस पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ। मैं इस प्रकरण में होनेवाली राजनीति की बात कर रहा हूँ। वोट की राजनीति की। हम लोकतंत्र हैं और वोट की राजनीति ही हमारे देश में लोकतंत्र को संचालित करती है।

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लन्दन के 'द डेली टेलीग्राफ'  के पत्रकारों ने उनके डेस्क पर लगाए गए OccupEye  नामक  मोशन सेंसर एक ही दिन में हटाने पर मज़बूर कर दिया। ये सेंसर इस बात को  रेकॉर्ड करते थे कि पत्रकार अपनी डेस्क पर कितने घंटे, मिनट और सेकण्ड्स बैठे। अख़बार प्रबंधन ने यह हिमाक़त कार्यालय में एसी / बिजली की खपत का अंदाज़ लगाने  के बहाने की थी। भारी विरोध के चलते सोमवार की सुबह लगाये गए मोशन सेंसर एक ही दिन में हटा लिए गए। 1855 में शुरू हुआ था लन्दन का  'द डेली टेलीग्राफ एंड कोरियर', लेकिन उसके 'मालिकों' की मानसिकता आज भी 1855 की ही है।  अखबार के नाम, मालिक और सदियाँ बदल गईं, पर मानसिकता नहीं। 

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सुब्रत रॉय

आजादी के बाद यह पहला मौका है, जब इतनी बड़ी संख्या में ‘मीडिया’ के मालिक जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे हैं। सहारा टीवी समूह के मालिक सुब्रत रॉय सहारा जेल में हैं और जमानत की राशि के इंतजाम में लगे है। लगभग दो साल में वे जमानत की राशि इकट्ठा नहीं कर पाए। दो लाख करोड़ के साम्राज्य का मालिक होने का दंभ भरने वाले सुब्रत रॉय दस हजार करोड़ नहीं जुटा पा रहे हैं। इसी तरह पी-7 चैनल और पर्ल ग्रुप के मालिकनिर्मल सिंघ भंगू भी जेल में हैं। खबर भारती चैनल के मालिक बघेल सांई प्रसाद समूह के शशांक भापकर, महुआ ग्रुप के हिन्दी, भोजपुरी, बांग्ला भाषाओं के कई चैनलों के मालिक पी.के. तिवारी भी जेल में हैं। इसी तरह शारदा ग्रुप के चैनल-10 के मालिक सुुदीप्तो सेन भी जेल मेंहैं। समृद्ध जीवन परिवार नामक चिटफंड कंपनी के मालिक और लाइव इंडिया नाम के चैनल के मालिक महेश किसन मोतेवार जेल में बंद हैं।

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गुरदासपुर का एसपी इस लायक नहीं कि पद पर रह सके। एेसे कायराना काम करने वाले को तत्काल बर्खास्त कर देना चाहिए। पठानकोट एयर बेस पर आतंकी हमले का सबसे बड़ा नुकसान पांच जवान, एक कमांडों और एक लेफ्टिनेंट कर्नल की शहादत है। यह नुकसान कम हो सकता था, अगर गुरदासपुर का एसपी सलविंदर सिंह बहादुरी दिखाता। शहीदों पर हमें फख्र है, लेकिन ऐसे कायर आईपीएस अधिकारी पर सिर शर्म से झुक जाता है। यह अफसर चाहता तो आतंकियों से निपटने की पहल कर सकता था, पर वह तो किसी तरह जान बचाता फिरा। 

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